लेह। स्वतंत्रता दिवस से ठीक पहले लद्दाख के जाने-माने शिक्षाविद, इंजीनियर और पर्यावरण कार्यकर्ता सोनम वांगचुक ने देशवासियों के नाम एक भावुक और विचारोत्तेजक संदेश जारी किया है। लद्दाख से दिए गए अपने संदेश में उन्होंने देश की मौजूदा राजनीतिक व्यवस्था, भ्रष्टाचार, शिक्षा व्यवस्था और नेतृत्व की गुणवत्ता को लेकर गंभीर चिंता जताई। उन्होंने देश में ‘दूसरी आजादी’ और एक ‘अहिंसक क्रांति’ की जरूरत बताते हुए नागरिकों से ऐसे लोगों की पहचान करने की अपील की, जो ईमानदार, चरित्रवान, निस्वार्थ और सिद्धांतों पर चलने वाले हों।
वांगचुक ने अपने संदेश में किसी एक राजनीतिक दल को सीधे तौर पर जिम्मेदार ठहराने के बजाय मौजूदा राजनीतिक व्यवस्था और नेतृत्व चुनने की प्रक्रिया पर सवाल उठाया। उनका कहना है कि यदि देश अपने नेताओं को चुनने के तरीके में बदलाव नहीं करता है, तो 2047 तक भारत को विकसित राष्ट्र बनाने का लक्ष्य हासिल करना मुश्किल हो सकता है।
50 साल पहले बराबरी पर थे पड़ोसी, आज क्यों आगे निकल गए?
सोनम वांगचुक ने अपने वीडियो संदेश में बताया कि पिछले कुछ दिनों से अस्वस्थ होने के कारण वे बिस्तर पर थे और इसी दौरान देश के भविष्य को लेकर सोच रहे थे। उन्होंने कहा कि करीब 50 साल पहले जिन पड़ोसी देशों को भारत के बराबर या पीछे माना जाता था, वे आज प्रति व्यक्ति आय के मामले में भारत से काफी आगे निकल चुके हैं।
वांगचुक ने थाईलैंड, मलेशिया, इंडोनेशिया, श्रीलंका और बांग्लादेश का उदाहरण देते हुए सवाल उठाया कि भारत उस गति से आगे क्यों नहीं बढ़ पाया। उन्होंने चेतावनी दी कि यदि देश में मौजूदा व्यवस्था इसी तरह चलती रही, तो 2047 में स्वतंत्रता के 100 वर्ष पूरे होने पर भारत के लिए खुद को विकसित राष्ट्र के रूप में प्रस्तुत करना चुनौतीपूर्ण हो सकता है।
शिक्षा व्यवस्था को लेकर भी जताई चिंता
वांगचुक ने देश की शिक्षा व्यवस्था पर भी सवाल उठाए। उन्होंने हाल के जन-आंदोलनों और उनके बाद हुए राजनीतिक बदलावों का जिक्र करते हुए कहा कि केवल शिक्षा मंत्री बदलने से शिक्षा व्यवस्था में किसी बड़े चमत्कार की उम्मीद नहीं की जा सकती।
उनके अनुसार, जब तक देश की शिक्षा व्यवस्था मजबूत नहीं होगी, तब तक देश के भविष्य को भी मजबूत दिशा देना मुश्किल रहेगा। उन्होंने शिक्षा को देश की प्रगति की बुनियाद बताते हुए व्यवस्था में व्यापक सुधार की जरूरत पर जोर दिया।
‘सरकार कोई भी हो, दमन का तरीका एक जैसा क्यों?’
अपने संदेश में वांगचुक ने आंदोलनों और विरोध प्रदर्शनों के प्रति सरकारों के रवैये पर भी सवाल उठाया। उन्होंने कहा कि दिल्ली में एक पार्टी की सरकार के खिलाफ उठने वाली आवाज को जिस तरह दबाया गया, दूसरे राज्यों में अलग-अलग राजनीतिक दलों की सरकारों ने भी विरोध के मामलों में वैसा ही रवैया अपनाया।
वांगचुक के अनुसार, केवल सत्ता में राजनीतिक दल बदलने से व्यवस्था की मूल समस्याएं खत्म नहीं होतीं। उन्होंने लोकतांत्रिक व्यवस्था में जनता की आवाज और असहमति को महत्व दिए जाने की जरूरत पर जोर दिया।
भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन के बाद भी क्यों नहीं बदली तस्वीर?
सोनम वांगचुक ने 2012-13 के भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन का भी उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि उस आंदोलन के बाद सरकार बदली, लेकिन करीब 12 साल बाद भी उनके अनुसार भ्रष्टाचार और अन्याय खत्म नहीं हुए हैं।
वांगचुक ने कहा कि भ्रष्टाचार और अन्याय पहले की तुलना में और गंभीर रूप में सामने दिखाई दे रहे हैं। उनके संदेश का मुख्य सवाल यही रहा कि यदि राजनीतिक चेहरे बदलने के बावजूद व्यवस्था की मूल समस्याएं बनी रहती हैं, तो वास्तविक परिवर्तन आखिर कैसे आएगा?
‘आधे सांसदों पर मुकदमे, फिर विकसित भारत कैसे बनेगा?’
सोनम वांगचुक ने संसद और सांसदों को लेकर भी बड़ा सवाल उठाया। उन्होंने कहा कि संसद के लगभग आधे सांसदों पर आपराधिक मामले दर्ज हैं और करीब एक-तिहाई सांसदों पर हत्या, बलात्कार और अपहरण जैसे गंभीर आरोप हैं।
इसी आधार पर उन्होंने सवाल किया कि ऐसे राजनीतिक माहौल में भारत आखिर विकसित राष्ट्र कैसे बन सकता है। हालांकि, उन्होंने यह भी कहा कि देश में ऐसे नेता मौजूद हैं जो ईमानदारी, सच्चाई और सिद्धांतों के रास्ते पर चलते हैं और वे ऐसे नेताओं का सम्मान करते हैं।
उनके अनुसार समस्या केवल किसी एक नेता या राजनीतिक दल में नहीं है, बल्कि उस पूरी व्यवस्था में है जिसके माध्यम से देश अपना नेतृत्व चुनता है। उनका मानना है कि यदि नेतृत्व का चयन सही तरीके से नहीं होगा तो देश की दिशा भी प्रभावित होती रहेगी।
स्वतंत्रता दिवस पर देशवासियों से मांगा खास ‘तोहफा’
स्वतंत्रता दिवस से पहले अपने संदेश में सोनम वांगचुक ने देशवासियों से एक अलग तरह का ‘तोहफा’ मांगा। उन्होंने लोगों से अपील की कि वे अपने आसपास मौजूद ऐसे निस्वार्थ, चरित्रवान, बुद्धिमान और सिद्धांतों पर चलने वाले लोगों के नाम सुझाएं, जिन्हें वे देश के लिए बेहतर नेतृत्व देने योग्य मानते हैं।
वांगचुक ऐसे लोगों को एक मंच पर लाने की दिशा में काम करना चाहते हैं, ताकि देश के लिए एक नई दिशा और नया राजनीतिक नक्शा तैयार करने पर विचार किया जा सके।
देशभर में संवाद की जताई इच्छा
सोनम वांगचुक ने देश के अलग-अलग हिस्सों में जाकर लोगों से सीधे संवाद करने की इच्छा भी व्यक्त की। उन्होंने कहा कि वे विभिन्न राज्यों और शहरों में जाकर जनता तथा बुद्धिजीवियों से सुझाव लेना चाहते हैं।
उनका मानना है कि देश की समस्याओं का समाधान केवल राजनीतिक दलों और सत्ता के स्तर पर चर्चा करने से नहीं निकलेगा, बल्कि समाज के ईमानदार और सक्षम लोगों को भी इस प्रक्रिया में शामिल करना होगा।
‘दूसरी आजादी’ से क्या बदलाव चाहते हैं वांगचुक?
सोनम वांगचुक की ओर से इस्तेमाल किया गया ‘दूसरी आजादी’ का विचार मौजूदा व्यवस्था में बदलाव की उनकी मांग से जुड़ा है। उनका संदेश केवल सत्ता परिवर्तन तक सीमित नहीं है। वे भ्रष्टाचार, कमजोर शिक्षा व्यवस्था, राजनीतिक नेतृत्व की गुणवत्ता और व्यवस्था में मौजूद कमियों को दूर करने की जरूरत पर जोर दे रहे हैं।
उन्होंने ‘अहिंसक क्रांति’ की बात करते हुए बदलाव के लिए शांतिपूर्ण और लोकतांत्रिक रास्ते पर जोर दिया है। उनके संदेश में नागरिकों की भूमिका को भी महत्वपूर्ण बताया गया है और देश के लिए बेहतर नेतृत्व चुनने की जिम्मेदारी जनता से जुड़ी हुई बताई गई है।
2047 के विकसित भारत के लक्ष्य पर उठाया सवाल
भारत 2047 में स्वतंत्रता के 100 वर्ष पूरे करेगा। इसी लक्ष्य को ध्यान में रखते हुए देश को विकसित राष्ट्र बनाने की चर्चा होती रही है। सोनम वांगचुक ने इसी लक्ष्य को अपने सवालों के केंद्र में रखा है।
उनका सवाल है कि यदि भ्रष्टाचार, शिक्षा, राजनीतिक व्यवस्था और नेतृत्व से जुड़ी समस्याएं बनी रहती हैं, तो केवल आर्थिक विकास के लक्ष्य से भारत को विकसित राष्ट्र बनाने की मंजिल कैसे हासिल होगी। उनके मुताबिक, देश की प्रगति के लिए बेहतर नेतृत्व और मजबूत व्यवस्था दोनों आवश्यक हैं।
राजनीतिक दल नहीं, पूरी व्यवस्था पर सवाल
सोनम वांगचुक ने अपने संदेश में किसी एक राजनीतिक दल को पूरी समस्या के लिए जिम्मेदार ठहराने के बजाय राजनीतिक व्यवस्था की कमियों पर ध्यान केंद्रित किया। उन्होंने कहा कि देश में अच्छे और सिद्धांतवादी नेता भी हैं, लेकिन सवाल उस प्रणाली का है जिसके माध्यम से नेतृत्व चुना जाता है।
इसी वजह से उन्होंने देशवासियों से ऐसे लोगों के नाम सुझाने की अपील की है, जिन्हें वे ईमानदार, सक्षम और निस्वार्थ मानते हैं। उनके अनुसार, यदि समाज के बेहतर लोगों को नेतृत्व की प्रक्रिया से जोड़ा जाए तो देश को नई दिशा देने की संभावना बन सकती है।
