नई दिल्ली। जलवायु कार्यकर्ता सोनम वांगचुक ने विरोध-प्रदर्शन की अनुमति और सरकारों की जवाबदेही को लेकर बड़ा बयान दिया है। शनिवार, 24 अक्टूबर 2026 को आईपीएफ महोत्सव को संबोधित करते हुए उन्होंने श्रीलंका और बांग्लादेश में हुए घटनाक्रम का उदाहरण दिया। वांगचुक ने कहा कि जब लोगों को विरोध दर्ज कराने का अवसर नहीं मिलता, तो ऐसी परिस्थितियां पैदा हो सकती हैं, जिनका सामना करना सरकारों के लिए मुश्किल हो जाता है। उन्होंने विरोध-प्रदर्शन को सरकारों को बेहतर तरीके से काम करने के लिए प्रेरित करने का एक महत्वपूर्ण माध्यम बताया।
विरोध की आवाज को सरकार के लिए क्यों जरूरी मानते हैं वांगचुक?
सोनम वांगचुक के अनुसार, विरोध-प्रदर्शन लोकतांत्रिक व्यवस्था में लोगों को अपनी असहमति जाहिर करने का अवसर देते हैं। उन्होंने कहा कि दुनिया के कई देशों में संसद के सामने भी विरोध-प्रदर्शन की अनुमति दी जाती है। उनके मुताबिक, संसद के आसपास का क्षेत्र अनेक देशों में प्रदर्शनकारियों के लिए अपनी बात रखने का प्रमुख केंद्र होता है।
वांगचुक ने ब्रिटेन, नॉर्वे और स्वीडन जैसे देशों का उल्लेख करते हुए कहा कि वहां संसद के ठीक सामने विरोध-प्रदर्शन किए जा सकते हैं। उन्होंने भारत की स्थिति पर टिप्पणी करते हुए कहा कि यहां संसद के आसपास विरोध करने के बजाय प्रदर्शनकारियों को काफी दूर जाना पड़ता है। उन्होंने कहा, "भारत में विरोध प्रदर्शन संसद से काफी दूर होते हैं। जब प्रदर्शन केवल जंतर-मंतर पर होते थे, तब भी वह जगह बहुत दूर थी।"
उनकी यह टिप्पणी ऐसे समय आई है, जब विरोध-प्रदर्शन की अनुमति और उसके लिए तय स्थानों को लेकर राजनीतिक बहस जारी है। वांगचुक ने इस विषय पर अपनी चिंता जाहिर करते हुए कहा कि लोगों को अपनी बात रखने के लिए पर्याप्त अवसर मिलना चाहिए।
श्रीलंका और बांग्लादेश का उदाहरण देकर क्या बोले सोनम वांगचुक?
वांगचुक ने विरोध-प्रदर्शनों पर प्रतिबंध और उनकी अनुमति से जुड़े सवाल पर श्रीलंका और बांग्लादेश का उदाहरण दिया। उन्होंने कहा, "देखिए, जब विरोध-प्रदर्शन की अनुमति नहीं दी जाती, तो क्या होता है। श्रीलंका और बांग्लादेश इसके उदाहरण हैं।"
उन्होंने यह भी कहा कि विरोध-प्रदर्शन करने के लिए अनुमति मांगने की व्यवस्था नहीं होनी चाहिए। उनके अनुसार, अनुमति का उद्देश्य शहर में होने वाली गतिविधियों की जानकारी रखना हो सकता है, जैसे किसी त्योहार के आयोजन के दौरान व्यवस्था बनाए रखना। वांगचुक की इस टिप्पणी में विरोध के अधिकार और प्रशासनिक व्यवस्था के बीच संतुलन का सवाल प्रमुखता से सामने आया।
इस मुद्दे पर विपक्ष ने भी केंद्र सरकार की आलोचना की है। विपक्ष का आरोप है कि विरोध-प्रदर्शन की अनुमति देने में सख्ती बरती जा रही है। ऐसे में वांगचुक का बयान राजनीतिक और लोकतांत्रिक अधिकारों से जुड़ी बहस के बीच महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
जंतर-मंतर पर प्रदर्शन और केंद्र सरकार की कार्रवाई का मामला
वांगचुक की टिप्पणी उस समय सामने आई, जब कॉकरोच जनता पार्टी (कॉजपा) ने मुख्य निर्वाचन आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग को लेकर जंतर-मंतर पर प्रदर्शन का आह्वान किया था। इस घटनाक्रम के दौरान केंद्र सरकार के कदमों और प्रदर्शनकारियों के लिए की गई सुरक्षा व्यवस्था को लेकर भी सवाल उठाए गए।
इस महीने की शुरुआत में कॉजपा की ओर से विरोध-प्रदर्शन का आह्वान किए जाने के बाद अर्धसैनिक बलों की तैनाती को लेकर केंद्र की आलोचना हुई थी। वांगचुक ने इसी संदर्भ में सुरक्षा बलों की भूमिका पर सवाल उठाए और कहा कि इन बलों का इस्तेमाल अपने ही देश के लोगों और युवाओं के खिलाफ किया जा रहा है।
उन्होंने कहा, "लेकिन वे अपने ही लोगों, मेरे जैसे लोगों, हमारे युवाओं के पीछे हैं।" उनके इस बयान में आंतरिक सुरक्षा के लिए अर्धसैनिक बलों की तैनाती और नागरिकों के विरोध के अधिकार को लेकर उनकी चिंता सामने आई।
अर्धसैनिक बलों की तैनाती पर वांगचुक ने उठाए सवाल
सोनम वांगचुक ने केंद्र सरकार की आलोचना करते हुए कहा कि अर्धसैनिक बल गृह मंत्रालय के अधीन आते हैं। उन्होंने इस बात पर सवाल उठाया कि इन बलों का इस्तेमाल देश के भीतर विरोध-प्रदर्शनों के दौरान किया जा रहा है, जबकि उनके अनुसार देश की सीमाओं की सुरक्षा को प्राथमिकता दी जानी चाहिए।
वांगचुक का कहना था कि देश की सुरक्षा व्यवस्था में सीमाओं की निगरानी और सुरक्षा का विशेष महत्व है। उन्होंने इस विषय को लद्दाख की परिस्थितियों से जोड़ते हुए कहा कि सीमा पर सतर्कता में कमी आने से गंभीर चुनौतियां पैदा हो सकती हैं। उनके बयान में आंतरिक सुरक्षा और सीमा सुरक्षा के बीच संसाधनों के इस्तेमाल को लेकर चिंता स्पष्ट दिखाई दी।
HIAL की जमीन का आवंटन रद्द होने पर भी चर्चा
वांगचुक की टिप्पणी ऐसे समय भी आई है, जब लद्दाख प्रशासन ने हिमालयन इंस्टीट्यूट ऑफ अल्टरनेटिव्स, लद्दाख (HIAL) को जमीन आवंटित करने का फैसला रद्द किए जाने का बचाव किया था। प्रशासन की ओर से कहा गया था कि कानून का पालन नहीं किए जाने के कारण आवंटन रद्द करने का निर्णय लिया गया।
प्रशासन के अनुसार, बकाया राशि का भुगतान नहीं करने और लीज डीड की शर्तें पूरी नहीं करने के कारण जमीन का आवंटन अपने आप समाप्त हो गया था। इस मामले में प्रशासन ने नियमों और शर्तों का हवाला दिया था, जबकि वांगचुक की ओर से सरकार की नीतियों और लद्दाख से जुड़े मुद्दों पर लगातार सवाल उठाए जा रहे हैं।
HIAL की जमीन से जुड़ा विवाद लद्दाख में प्रशासनिक फैसलों और वांगचुक के रुख के बीच जारी मतभेदों के संदर्भ में सामने आया है। हालांकि, जमीन आवंटन के मामले में प्रशासन की ओर से बताई गई वजहों और वांगचुक के राजनीतिक बयानों को अलग-अलग संदर्भों में देखना जरूरी है।
चीन और सीमा सुरक्षा को लेकर क्या है वांगचुक की चिंता?
सोनम वांगचुक ने देश की सुरक्षा को सरकार की सर्वोच्च प्राथमिकता बताया। उन्होंने कहा, "हमने अंदरूनी सुरक्षा के लिए अक्सर पैरामिलिट्री फोर्स का इस्तेमाल करना शुरू कर दिया है, लेकिन हमारे बॉर्डर सुरक्षित होने चाहिए। पैरामिलिट्री (फोर्स) को ही बॉर्डर की सुरक्षा करनी चाहिए।"
उन्होंने लद्दाख में चीन की गतिविधियों को लेकर भी चिंता जाहिर की। वांगचुक ने कहा, "मैंने लद्दाख में सलामी स्लाइसिंग देखी है जिसमें चीन धीरे-धीरे अंदर आ रहा है। ऐसा तब होता है जब बॉर्डर से ध्यान हट जाता है, खासकर सर्दियों में जब पैरामिलिट्री फोर्स दूसरे कामों के लिए तैनात होती हैं। जब तक वे वापस आते हैं, चीन पहले ही अंदर आ चुका होता है और फिर उन्हें पीछे धकेलना मुश्किल हो जाता है।"
वांगचुक के इस बयान में सीमा पर लगातार निगरानी बनाए रखने और सुरक्षा बलों की तैनाती को लेकर उनकी चिंता सामने आई। उन्होंने विशेष रूप से सर्दियों के दौरान सीमा सुरक्षा पर ध्यान केंद्रित करने की जरूरत बताई। हालांकि, चीन की गतिविधियों को लेकर उनके दावे को उनके बयान के रूप में ही देखा जाना चाहिए।
विरोध का अधिकार, सरकारी जवाबदेही और राष्ट्रीय सुरक्षा पर बहस
सोनम वांगचुक के बयान ने विरोध-प्रदर्शन की अनुमति, नागरिकों की असहमति, अर्धसैनिक बलों की भूमिका और सीमा सुरक्षा जैसे कई मुद्दों को एक साथ चर्चा में ला दिया है। उन्होंने श्रीलंका और बांग्लादेश का उदाहरण देकर यह तर्क रखा कि विरोध की आवाज को दबाने के बजाय उसे सुनना सरकारों के लिए जरूरी है।
उनकी टिप्पणियों का एक प्रमुख हिस्सा यह भी रहा कि देश की सुरक्षा के लिए सीमाओं की निगरानी को प्राथमिकता दी जानी चाहिए। इस तरह वांगचुक ने लोकतांत्रिक अधिकारों और राष्ट्रीय सुरक्षा, दोनों विषयों पर अपनी बात रखी। उनके बयान से विरोध-प्रदर्शन के लिए स्थान और अनुमति तय करने की नीति पर बहस फिर सामने आई है।
