erer | Source: ererनई दिल्ली। दिल्ली के ऐतिहासिक जंतर-मंतर को विरोध-प्रदर्शन स्थलों की सूची से हटाने का विवाद अब सुप्रीम कोर्ट पहुंच गया है। केंद्र सरकार के इस फैसले को चुनौती देते हुए शीर्ष अदालत में एक रिट याचिका दायर की गई है। याचिका में आशंका जताई गई है कि जंतर-मंतर जैसे प्रमुख स्थान को प्रदर्शन स्थलों की सूची से हटाने और उसकी जगह दूसरे स्थान निर्धारित करने से नागरिकों के शांतिपूर्ण तरीके से एकत्र होने तथा अपनी बात रखने के मौलिक अधिकारों पर असर पड़ सकता है। याचिकाकर्ता का तर्क है कि विरोध-प्रदर्शन का अधिकार केवल किसी स्थान पर इकट्ठा होने तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके जरिए लोग सरकार और संबंधित अधिकारियों तक अपनी शिकायतें पहुंचाते हैं तथा सार्वजनिक मुद्दों पर ध्यान आकर्षित करते हैं।

11 अक्टूबर के आदेश के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में याचिका

केंद्र सरकार ने 11 अक्टूबर 2026 को जंतर-मंतर को दिल्ली में विरोध-प्रदर्शन के लिए निर्धारित स्थलों की सूची से बाहर कर दिया था। इसके स्थान पर तीन नए स्थानों को प्रदर्शन स्थल के रूप में दर्जा दिए जाने की जानकारी सामने आई है। केंद्रीय गृह मंत्रालय के इस फैसले का कांग्रेस सहित कई संगठनों ने विरोध किया है। अब इस आदेश को चुनौती देते हुए वकील स्वाति सिंह ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की है। याचिका में कहा गया है कि विरोध-प्रदर्शन के लिए स्थान बदलने का निर्णय केवल प्रशासनिक व्यवस्था से जुड़ा विषय नहीं है। इसका सीधा असर इस बात पर पड़ सकता है कि प्रदर्शनकारी अपनी आवाज कितनी प्रभावी तरीके से संबंधित संस्थानों और आम जनता तक पहुंचा पाते हैं। याचिकाकर्ता के अनुसार, यदि विरोध-प्रदर्शन के लिए लोगों को ऐसे स्थानों पर भेजा जाता है, जहां पहुंचना कठिन हो या जहां उनकी आवाज संबंधित अधिकारियों तक प्रभावी ढंग से नहीं पहुंच सके, तो शांतिपूर्ण असहमति दर्ज कराने का उद्देश्य प्रभावित हो सकता है।

विरोध-प्रदर्शन का अधिकार सिर्फ एक जगह इकट्ठा होने तक सीमित नहीं

याचिका में इस बात पर जोर दिया गया है कि शांतिपूर्ण विरोध-प्रदर्शन लोकतांत्रिक व्यवस्था में नागरिकों के विचार और असहमति व्यक्त करने का माध्यम है। इसके जरिए लोग अपनी शिकायतें सामने रखते हैं, सरकारी फैसलों पर सवाल उठाते हैं और उन मुद्दों पर कार्रवाई की मांग करते हैं, जिन्हें वे महत्वपूर्ण मानते हैं। याचिकाकर्ता का कहना है कि किसी प्रदर्शन स्थल का महत्व केवल उसके भौगोलिक स्थान से तय नहीं होता। संबंधित संस्थानों से उसकी दूरी, आम लोगों की पहुंच और प्रदर्शनकारियों की बात उन लोगों तक पहुंचने की संभावना, जिनका ध्यान आकर्षित करना उद्देश्य है, विरोध-प्रदर्शन की प्रभावशीलता को सीधे प्रभावित कर सकते हैं। इसी आधार पर याचिका में तर्क दिया गया है कि जंतर-मंतर को प्रदर्शन स्थलों की सूची से हटाने के फैसले का मूल्यांकन केवल प्रशासनिक सुविधा के आधार पर नहीं किया जाना चाहिए। यह भी देखा जाना चाहिए कि इससे शांतिपूर्ण तरीके से एकत्र होने और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के अधिकारों पर क्या प्रभाव पड़ सकता है।

नए प्रदर्शन स्थलों के लिए एसओपी जारी नहीं होने पर भी सवाल

याचिका में ‘मजदूर किसान शक्ति संगठन बनाम भारत संघ’ मामले का हवाला दिया गया है, जिस पर वर्ष 2018 में फैसला आया था। याचिकाकर्ता ने इस मामले के संदर्भ में केंद्र सरकार की कार्रवाई को मनमाना और प्रक्रिया के लिहाज से अधूरा बताया है। याचिका के अनुसार, जंतर-मंतर को सूची से हटाने के बाद जिन तीन नए स्थानों को प्रदर्शन स्थल का दर्जा दिया गया है, उनके लिए संशोधित मानक संचालन प्रक्रियाएं (एसओपी) अभी जारी नहीं की गई हैं। इससे प्रदर्शन आयोजित करने और संबंधित स्थानों तक पहुंचने की प्रक्रिया को लेकर अनिश्चितता बनी हुई है। याचिकाकर्ता का तर्क है कि यदि किसी पुराने प्रदर्शन स्थल को तत्काल प्रभाव से हटाया जाता है, लेकिन नए स्थानों पर प्रदर्शन आयोजित करने के लिए आवश्यक विस्तृत दिशा-निर्देश बाद में जारी किए जाने हैं, तो इससे मौजूदा व्यवस्था और नई व्यवस्था के बीच व्यावहारिक अंतर पैदा हो सकता है। याचिका में यह भी कहा गया है कि प्रदर्शन स्थलों को बदलने के साथ-साथ वहां पहुंचने, अनुमति लेने और कार्यक्रम आयोजित करने से संबंधित प्रक्रिया स्पष्ट होना आवश्यक है, ताकि शांतिपूर्ण विरोध-प्रदर्शन के अधिकार का इस्तेमाल करने में अनावश्यक बाधाएं न आएं।

अचानक लिए गए सरकारी फैसलों के खिलाफ विरोध की जरूरत भी उठाई

याचिका का एक महत्वपूर्ण पहलू यह है कि शांतिपूर्ण विरोध-प्रदर्शन की योजना हमेशा कई दिन पहले नहीं बनाई जा सकती। याचिकाकर्ता के अनुसार, कई बार सरकार के किसी अचानक लिए गए फैसले या किसी तात्कालिक घटनाक्रम के जवाब में लोग विरोध दर्ज कराने के लिए एकत्र होते हैं। ऐसी परिस्थितियों में प्रदर्शन स्थल तक पहुंचने की प्रक्रिया और वहां कार्यक्रम आयोजित करने के नियमों का स्पष्ट होना जरूरी है। याचिका में तर्क दिया गया है कि यदि नए स्थानों के लिए मानक संचालन प्रक्रियाएं उपलब्ध नहीं हैं, तो तत्काल विरोध दर्ज कराने के इच्छुक लोगों के सामने व्यावहारिक कठिनाइयां पैदा हो सकती हैं। याचिका में संबंधित आदेश को इस आधार पर भी चुनौती दी गई है कि जंतर-मंतर को प्रशासनिक प्रभाव के साथ सूची से हटा दिया गया, जबकि नए निर्धारित स्थलों के लिए विस्तृत और संशोधित एसओपी अलग से जारी किए जाने हैं। याचिकाकर्ता के मुताबिक, इससे नई व्यवस्था के तहत प्रदर्शन आयोजित करने की पूरी प्रक्रिया स्पष्ट नहीं हो पाती।

केवल वैकल्पिक जगह तय करना पर्याप्त नहीं, व्यवस्था स्पष्ट होना भी जरूरी

याचिकाकर्ता ने दलील दी है कि किसी मौजूदा प्रदर्शन स्थल को हटाने के आदेश को सिर्फ इस आधार पर उचित नहीं माना जा सकता कि उसकी जगह दूसरे स्थान निर्धारित कर दिए गए हैं। याचिका के अनुसार, यह देखना भी जरूरी है कि वैकल्पिक स्थलों तक पहुंचने और वहां विरोध-प्रदर्शन आयोजित करने के लिए आवश्यक प्रक्रियाएं स्पष्ट तथा प्रभावी हैं या नहीं। याचिका में कहा गया है कि यदि नए स्थानों पर प्रदर्शन करने की प्रक्रिया बाद में जारी होने वाले दिशा-निर्देशों पर निर्भर है, तो केवल वैकल्पिक स्थल तय कर देना शांतिपूर्ण विरोध-प्रदर्शन के अधिकार की प्रभावी सुरक्षा के लिए पर्याप्त नहीं हो सकता। इस मामले में याचिकाकर्ता ने प्रशासनिक व्यवस्था और नागरिकों के मौलिक अधिकारों के बीच संतुलन बनाए रखने की आवश्यकता पर जोर दिया है। हालांकि, याचिका में उठाए गए तर्कों पर सुप्रीम कोर्ट का अंतिम रुख क्या होगा, यह अदालत की सुनवाई और आगे की कार्यवाही पर निर्भर करेगा।

याचिका में कई वकील शामिल, मौलिक अधिकारों पर बहस की संभावना

यह रिट याचिका लक्ष्य सैनी, वकील तुषार गुप्ता और स्वाति सिंह ने दायर की है। मामले में वरिष्ठ अधिवक्ता मुक्ता गुप्ता और वकील नंदिता राव के बहस करने की जानकारी दी गई है। जंतर-मंतर लंबे समय से विभिन्न सामाजिक, राजनीतिक और सार्वजनिक मुद्दों पर विरोध दर्ज कराने के लिए पहचाना जाता रहा है। ऐसे में इसे प्रदर्शन स्थलों की सूची से हटाने का फैसला अब कानूनी चुनौती के दायरे में आ गया है। याचिका में मुख्य रूप से यह सवाल उठाया गया है कि क्या किसी प्रमुख प्रदर्शन स्थल को हटाने और वैकल्पिक स्थानों की प्रक्रिया स्पष्ट किए बिना नई व्यवस्था लागू करने से नागरिकों के अधिकारों का प्रभावी इस्तेमाल प्रभावित हो सकता है। जंतर-मंतर विवाद में अब सुप्रीम कोर्ट की भूमिका महत्वपूर्ण जंतर-मंतर को प्रदर्शन स्थलों की सूची से हटाने के केंद्र सरकार के फैसले के खिलाफ दायर याचिका ने शांतिपूर्ण विरोध-प्रदर्शन, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और प्रशासनिक व्यवस्था से जुड़े सवालों को फिर चर्चा में ला दिया है। याचिकाकर्ता ने पुराने स्थल को हटाने, नए स्थानों के लिए एसओपी जारी नहीं होने और अचानक पैदा होने वाली परिस्थितियों में विरोध दर्ज कराने की जरूरत का हवाला दिया है। अब इस मामले में सुप्रीम कोर्ट की आगे की कार्यवाही महत्वपूर्ण होगी, क्योंकि इससे जुड़े सवाल नागरिकों के मौलिक अधिकारों और सार्वजनिक व्यवस्था के बीच संतुलन से संबंधित हैं।