पेरिस। फ्रांस में राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों की सरकार को एक बार फिर बड़े पैमाने पर विरोध-प्रदर्शनों का सामना करना पड़ रहा है। शिक्षा व्यवस्था में बुनियादी सुविधाओं और बजट की कमी से शुरू हुआ विरोध अब महंगाई, वेतन और पेंशन जैसे मुद्दों तक पहुंच गया है। शनिवार, 24 अक्टूबर 2026 को राजधानी पेरिस समेत देश के कई शहरों में प्रदर्शन हुए। प्रदर्शनकारियों की भारी भीड़ के कारण राजधानी के कई इलाकों में जनजीवन प्रभावित हुआ। हालात को नियंत्रित करने के लिए पुलिस ने आंसू गैस और पानी की बौछार का इस्तेमाल किया। वहीं, फ्रांस सरकार ने हिंसा और तोड़फोड़ की आशंका को देखते हुए सुरक्षा व्यवस्था कड़ी कर दी।
फ्रांस में आखिर क्यों भड़का लोगों का गुस्सा?
फ्रांस में मौजूदा विरोध की शुरुआत पिछले महीने पेरिस के एक उच्च माध्यमिक विद्यालय में शिक्षकों और अन्य कर्मचारियों की कमी के मुद्दे से हुई थी। स्कूलों में बुनियादी सुविधाओं और शिक्षा के लिए पर्याप्त बजट की मांग को लेकर शुरू हुआ यह आंदोलन धीरे-धीरे दूसरे शहरों तक फैल गया। बाद में छात्र संगठनों के साथ श्रमिक संगठनों ने भी इसमें हिस्सा लेना शुरू कर दिया।
प्रदर्शनकारियों की मांगों में शिक्षा व्यवस्था में सुधार, शिक्षकों की भर्ती और वित्तीय सहायता जैसे मुद्दे शामिल हैं। वहीं, श्रमिक संगठन वेतन और पेंशन में वृद्धि की मांग कर रहे हैं। बढ़ती महंगाई ने भी लोगों की नाराजगी को बढ़ाया है। इन मुद्दों को लेकर अलग-अलग वर्गों के लोग सड़कों पर उतर रहे हैं।
छात्र संगठनों ने सरकार के सामने 10 सूत्रीय मांगें रखी हैं। इन मांगों में स्कूल प्रणाली को बेहतर बनाने, शिक्षकों की नियुक्ति और शिक्षा से जुड़ी वित्तीय सहायता की मांग प्रमुख है। प्रदर्शनकारियों का कहना है कि जब तक सरकार उनकी मांगों पर ठोस कदम नहीं उठाती, तब तक आंदोलन जारी रहेगा।
पेरिस में सुरक्षा के कड़े इंतजाम, 70 हजार पुलिसकर्मियों की तैनाती
प्रदर्शनकारियों के बड़े जमावड़े से पहले फ्रांस के गृह मंत्री लॉरेंट नुनेज ने बताया कि देशभर में लगभग 70,000 पुलिसकर्मियों को तैनात किया जाएगा। सुरक्षा व्यवस्था मजबूत करने के लिए हेलीकॉप्टर, बख्तरबंद वाहन और पानी की बौछार करने वाले वाहनों की भी व्यवस्था की गई।
इससे पहले पिछले सप्ताह हुए प्रदर्शनों के दौरान कई जगहों पर दुकानों में लूटपाट, वाहनों में आगजनी और सार्वजनिक प्रतिष्ठानों पर हमलों की घटनाएं सामने आई थीं। नकाबपोश उपद्रवियों ने पेरिस समेत कई शहरों के प्रमुख व्यावसायिक इलाकों को निशाना बनाया था। इन घटनाओं के बाद सुरक्षा व्यवस्था को लेकर सरकार पर दबाव बढ़ा।
पिछले सप्ताह की घटनाओं को देखते हुए प्रशासन ने इस बार पहले से ही सुरक्षा के व्यापक इंतजाम किए। कई शहरों में प्रदर्शन और मार्च निकालने पर प्रतिबंध भी लगाए गए, ताकि संभावित हिंसा और तोड़फोड़ को रोका जा सके।
पुलिस ने बदला मार्च का रास्ता, फिर भी बैस्टिल में जुटे प्रदर्शनकारी
पेरिस में प्रदर्शन के दौरान पुलिस ने मार्च के निर्धारित मार्ग में आखिरी समय पर बदलाव किया। शुरुआत में प्रदर्शनकारियों को शहर के मध्य स्थित बैस्टिल से नेशन तक मार्च निकालना था। हालांकि, बाद में मार्ग को बदलकर पोर्ट डी'इटली और पोर्ट डी विन्सेनेस के बीच के क्षेत्र तक सीमित कर दिया गया।
मार्ग में बदलाव के बावजूद कई प्रदर्शनकारी पूर्व निर्धारित कार्यक्रम के अनुसार बैस्टिल पहुंच गए। इसके बाद पुलिस ने उन्हें वहां से हटाने के लिए लाउडस्पीकर के माध्यम से चेतावनी दी। पुलिस ने कहा कि निर्देशों का पालन नहीं करने और निर्धारित क्षेत्र खाली नहीं करने पर 135 यूरो का जुर्माना लगाया जा सकता है। चेतावनी के बाद प्रदर्शनकारियों ने जगह खाली कर दी।
इस घटनाक्रम ने दिखाया कि प्रदर्शन को नियंत्रित करने के लिए प्रशासन को मार्ग और भीड़ प्रबंधन से जुड़े फैसले लेने पड़े। हालांकि, मार्ग बदले जाने के बाद भी प्रदर्शनकारियों की मौजूदगी और उनकी मांगों को लेकर आंदोलन जारी रहा।
मार्च के दौरान पुलिस और प्रदर्शनकारियों में झड़प
पेरिस में मार्च की शुरुआत शांतिपूर्ण तरीके से हुई, लेकिन अंतिम पड़ाव पोर्ट डी विन्सेनेस के पास स्थिति तनावपूर्ण हो गई। कुछ प्रदर्शनकारियों की ओर से वस्तुएं फेंके जाने के बाद पुलिस ने आंसू गैस के गोले छोड़े और भीड़ को तितर-बितर करने के लिए पानी की बौछार का इस्तेमाल किया।
प्रदर्शन के दौरान पुलिस और प्रदर्शनकारियों के बीच कई बार झड़प होने की जानकारी सामने आई। प्रशासन की ओर से व्यापक सुरक्षा इंतजाम किए जाने के बावजूद कुछ स्थानों पर तनाव की स्थिति बनी रही।
समाचार एजेंसी एएनआई ने रॉयटर्स के हवाले से पेरिस में बढ़ती महंगाई के खिलाफ प्रदर्शन कर रहे लोगों के दृश्य साझा किए। प्रदर्शन में शामिल लोगों की संख्या को लेकर फ्रांस के गृह मंत्रालय और श्रमिक संगठनों के आंकड़ों में अंतर सामने आया।
प्रदर्शन में कितने लोग शामिल हुए? सरकारी आंकड़े और यूनियन का दावा अलग
फ्रांस के गृह मंत्रालय के अनुसार, शनिवार को देशभर में लगभग 4 लाख 10 हजार लोग विरोध-प्रदर्शन में शामिल हुए। वहीं, श्रमिक यूनियन का अनुमान था कि प्रदर्शनकारियों की संख्या करीब 8 लाख रही। पेरिस में गृह मंत्रालय ने लगभग 1 लाख 10 हजार लोगों के शामिल होने का आंकड़ा दिया।
प्रशासन ने पेरिस में मार्च को शहर के केंद्रीय हिस्से से दूर दक्षिण-पूर्वी क्षेत्र तक सीमित रखा था। इसके बावजूद राजधानी में बड़ी संख्या में लोगों के जुटने से यातायात, कारोबार और आम जनजीवन प्रभावित हुआ।
दोनों पक्षों के आंकड़ों में अंतर होने के कारण प्रदर्शन में शामिल लोगों की वास्तविक संख्या को लेकर अलग-अलग दावे सामने आए। हालांकि, सरकारी आंकड़ों के मुताबिक भी देशभर में विरोध-प्रदर्शन में बड़ी संख्या में लोगों ने हिस्सा लिया।
पेरिस में संग्रहालय और दुकानें बंद, पर्यटन गतिविधियों पर असर
प्रदर्शन के दौरान संभावित हिंसा और तोड़फोड़ को देखते हुए पेरिस में कई प्रमुख पर्यटन स्थलों और व्यावसायिक प्रतिष्ठानों को बंद रखा गया। लूव्र संग्रहालय, ओरसे संग्रहालय और पिकासो संग्रहालय जैसे प्रमुख सांस्कृतिक स्थलों को बंद करने का फैसला लिया गया।
कई दुकानदारों ने भी पिछले सप्ताह हुई लूटपाट और आगजनी की घटनाओं से सबक लेते हुए अपनी दुकानों की सुरक्षा के लिए अतिरिक्त इंतजाम किए। कुछ दुकानों के बाहर लकड़ी के गत्तों से सुरक्षा अवरोध बनाए गए, ताकि किसी अप्रिय घटना की स्थिति में नुकसान को कम किया जा सके।
प्रदर्शन और सुरक्षा संबंधी पाबंदियों के कारण पेरिस के कई इलाकों में सामान्य गतिविधियां प्रभावित हुईं। दुकानें बंद रहने और प्रमुख पर्यटन स्थलों पर प्रवेश नहीं मिलने से स्थानीय कारोबारियों तथा शहर आने वाले पर्यटकों को भी परेशानी का सामना करना पड़ा।
मैक्रों सरकार के सामने चुनौती, छात्र और श्रमिक संगठन मांगों पर अड़े
राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों वर्ष 2017 से फ्रांस की सत्ता में हैं। उनके कार्यकाल के दौरान अलग-अलग मुद्दों पर कई बार विरोध-प्रदर्शन हो चुके हैं। मौजूदा आंदोलन में शिक्षा व्यवस्था से जुड़े सवालों के साथ महंगाई, वेतन और पेंशन के मुद्दे भी जुड़ गए हैं।
राष्ट्रपति मैक्रों ने प्रदर्शनकारियों को बड़े बदलावों का आश्वासन दिया है। हालांकि, छात्र संगठनों ने स्पष्ट किया है कि जब तक सरकार उनकी मांगों को लागू करने की दिशा में ठोस कदम नहीं उठाती, तब तक आंदोलन जारी रहेगा। श्रमिक संगठन भी वेतन और पेंशन में वृद्धि की मांग पर कायम हैं।
इस स्थिति ने सरकार के सामने एक साथ कई चुनौतियां खड़ी कर दी हैं। एक तरफ प्रशासन को सार्वजनिक व्यवस्था और सुरक्षा बनाए रखनी है, वहीं दूसरी ओर प्रदर्शनकारियों की मांगों पर जवाब भी देना है। आंदोलन का आगे क्या रुख होगा, यह सरकार के कदमों और संगठनों की प्रतिक्रिया पर निर्भर करेगा।
2027 में पूरा होगा मैक्रों का कार्यकाल
राष्ट्रपति मैक्रों का मौजूदा कार्यकाल वर्ष 2027 में समाप्त होने वाला है। फ्रांसीसी संविधान के अनुसार, कोई राष्ट्रपति लगातार दो कार्यकाल से अधिक पद पर नहीं रह सकता। मैक्रों ने भी वर्ष 2027 में अपना कार्यकाल पूरा होने के बाद राजनीति से विराम लेने की घोषणा की है।
ऐसे समय में शिक्षा, महंगाई, वेतन और पेंशन को लेकर जारी विरोध सरकार के लिए महत्वपूर्ण राजनीतिक चुनौती बन गया है। प्रदर्शनकारी अपनी मांगों पर कार्रवाई चाहते हैं, जबकि प्रशासन का जोर हिंसा और सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचाने वाली घटनाओं को रोकने पर है।
