erer | Source: ererनई दिल्ली। मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) को लेकर जारी राजनीतिक विवाद के बीच सुप्रीम कोर्ट ने स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव को लेकर अहम टिप्पणी की है। शीर्ष अदालत ने स्पष्ट किया कि चुनाव प्रक्रिया में सामान्य तौर पर न्यायिक हस्तक्षेप से बचा जाता है, लेकिन यदि चुनाव को अवैध या असंवैधानिक तरीकों से प्रभावित करने की आशंका हो, तो संवैधानिक अदालतें मूकदर्शक बनकर नहीं रह सकतीं।

अदालत ने कहा कि स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव संविधान के मूल ढांचे का हिस्सा हैं और उनकी शुचिता बनाए रखना बेहद जरूरी है। यह टिप्पणी आंध्र प्रदेश की मुख्य विपक्षी पार्टी युवजन श्रमिक रायतू कांग्रेस पार्टी (YSRCP) की याचिका पर सुनवाई के दौरान आई। पार्टी ने आरोप लगाया था कि हिंसा और कानून-व्यवस्था से जुड़ी समस्याओं के कारण उसके उम्मीदवारों को शहरी स्थानीय निकाय चुनावों में नामांकन दाखिल करने से रोका गया। सुप्रीम कोर्ट ने मामले में अंतरिम राहत देते हुए राज्य चुनाव आयोग को नामांकन की समय-सीमा बढ़ाने की मांग पर विचार करने और उम्मीदवारों की अंतिम सूची का प्रकाशन 23 अक्टूबर 2026 तक टालने का निर्देश दिया।

‘स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव संविधान के मूल ढांचे का हिस्सा’

जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्टिस वी. मोहना की पीठ ने सुनवाई के दौरान चुनाव प्रक्रिया की निष्पक्षता और नामांकन दाखिल करने के अधिकार के महत्व पर जोर दिया। पीठ के अनुसार, स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव संवैधानिक लोकतंत्र की बुनियाद हैं। नामांकन दाखिल करना भी इसी प्रक्रिया का अभिन्न हिस्सा है। यदि किसी उम्मीदवार को अनुचित तरीके से नामांकन करने से रोका जाता है, तो इससे चुनाव प्रक्रिया की निष्पक्षता प्रभावित होने की आशंका पैदा होती है। अदालत ने यह भी कहा कि संवैधानिक मूल्यों की रक्षा करना संवैधानिक अदालतों की जिम्मेदारी है। चुनाव प्रक्रिया में जनता का विश्वास बनाए रखना लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए आवश्यक है। यदि किसी विपक्षी दल की ओर से नामांकन प्रक्रिया में बाधा डालने के आरोपों के समर्थन में सामग्री प्रस्तुत की जाती है, तो अदालत उन शिकायतों की अनदेखी नहीं कर सकती। लाइव लॉ की रिपोर्ट के अनुसार, पीठ ने विपक्षी पार्टी की ओर से पेश वीडियो क्लिप और भौतिक एवं इलेक्ट्रॉनिक ज्ञापनों का भी उल्लेख किया। अदालत की टिप्पणी का आशय था कि चुनाव प्रक्रिया की निष्पक्षता को लेकर गंभीर सवाल उठने पर न्यायिक समीक्षा की शक्ति का इस्तेमाल पूरी तरह बंद नहीं किया जा सकता।

राज्य चुनाव आयोग को नामांकन की समय-सीमा पर विचार करने का निर्देश

सुप्रीम कोर्ट ने आंध्र प्रदेश राज्य चुनाव आयोग (SEC) को निर्देश दिया कि वह YSRCP की उस मांग पर विचार करे, जिसमें नामांकन दाखिल करने की समय-सीमा बढ़ाने का अनुरोध किया गया था। पार्टी का आरोप था कि हिंसा और अन्य बाधाओं के कारण उसके बड़ी संख्या में उम्मीदवार चुनाव के लिए नामांकन दाखिल नहीं कर सके। अदालत ने स्पष्ट किया कि वह सीधे चुनाव प्रक्रिया अपने हाथ में नहीं ले रही है। इसके बजाय राज्य चुनाव आयोग को शिकायत पर विचार करने और उचित निर्णय लेने के लिए कहा गया है। पीठ ने आयोग को 21 अक्टूबर को उम्मीदवारों की अंतिम सूची जारी नहीं करने और उसका प्रकाशन 23 अक्टूबर 2026 तक टालने का निर्देश भी दिया। इस आदेश का उद्देश्य नामांकन प्रक्रिया से जुड़ी शिकायत पर विचार के लिए अवसर उपलब्ध कराना है। अदालत ने राज्य चुनाव आयोग को निर्णय लेने की जिम्मेदारी सौंपी है। इस तरह शीर्ष अदालत ने एक ओर चुनाव प्रक्रिया में सामान्य न्यायिक संयम के सिद्धांत को बनाए रखा, वहीं दूसरी ओर निष्पक्ष चुनाव सुनिश्चित करने के लिए आवश्यक हस्तक्षेप की गुंजाइश भी स्पष्ट की।

YSRCP ने लगाया था दो-तिहाई उम्मीदवारों को रोकने का आरोप

आंध्र प्रदेश की मुख्य विपक्षी पार्टी YSRCP ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दाखिल कर आरोप लगाया था कि हिंसा और विभिन्न बाधाओं के कारण उसके लगभग दो-तिहाई उम्मीदवार शहरी स्थानीय निकाय चुनावों के लिए नामांकन दाखिल नहीं कर सके। पार्टी ने इसे चुनाव प्रक्रिया की निष्पक्षता से जुड़ा गंभीर मामला बताया और नामांकन की समय-सीमा बढ़ाने की मांग की। पार्टी का कहना था कि यदि उम्मीदवारों को नामांकन दाखिल करने का पर्याप्त अवसर नहीं मिलता, तो चुनाव में उनकी भागीदारी प्रभावित हो सकती है। इसी आधार पर उसने सुप्रीम कोर्ट से हस्तक्षेप की मांग की। सुनवाई के दौरान अदालत ने प्रथम दृष्टया माना कि नामांकन प्रक्रिया की शुचिता की रक्षा के लिए निर्देश देना जरूरी हो सकता है। हालांकि, उम्मीदवारों को नामांकन से रोके जाने और हिंसा से जुड़े आरोप पार्टी की ओर से लगाए गए थे। अदालत की अंतरिम कार्रवाई का उद्देश्य इन शिकायतों पर विचार करने का अवसर देना और चुनाव प्रक्रिया की निष्पक्षता से जुड़े सवालों को संबोधित करना था।

हाईकोर्ट से नहीं मिली राहत, फिर सुप्रीम कोर्ट पहुंची पार्टी

YSRCP ने सुप्रीम कोर्ट जाने से पहले आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया था। पार्टी ने हिंसा की आशंका का हवाला देते हुए पहले से सुरक्षा और अन्य एहतियाती उपाय करने की मांग की थी। हालांकि, हाईकोर्ट ने 15 अक्टूबर 2026 को पूर्व-सुरक्षात्मक उपायों की मांग वाली याचिका खारिज कर दी थी। इसके बाद पार्टी ने नामांकन दाखिल करने की समय-सीमा बढ़ाने का अनुरोध किया, लेकिन हाईकोर्ट से इस मांग पर भी राहत नहीं मिली। इसके बाद YSRCP ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दाखिल की। सुनवाई के दौरान राज्य सरकार और राज्य चुनाव आयोग ने भी पार्टी की याचिका का विरोध किया। सुप्रीम कोर्ट ने मामले पर विचार करने के बाद राज्य चुनाव आयोग को नामांकन की समय-सीमा बढ़ाने के अनुरोध पर विचार करने का निर्देश दिया। साथ ही उम्मीदवारों की अंतिम सूची जारी करने की समय-सीमा 23 अक्टूबर तक टालने को कहा।

चुनाव में अदालतों की भूमिका पर सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा?

पीठ ने स्पष्ट किया कि चुनाव संबंधी मामलों में अदालतें आमतौर पर हस्तक्षेप करने से बचती हैं। इसका कारण यह है कि चुनाव प्रक्रिया को स्वतंत्र संवैधानिक संस्थाओं के माध्यम से तय समय-सीमा के भीतर पूरा किया जाना चाहिए। बार-बार न्यायिक हस्तक्षेप होने से चुनाव प्रक्रिया प्रभावित हो सकती है। लेकिन अदालत ने यह भी कहा कि न्यायिक संयम का अर्थ यह नहीं है कि गंभीर शिकायतों के बावजूद संवैधानिक अदालतें पूरी तरह निष्क्रिय रहें। यदि प्रथम दृष्टया ऐसा मामला सामने आता है, जिसमें नामांकन दाखिल करने की प्रक्रिया को बाधित करके चुनाव को प्रभावित किए जाने की आशंका हो, तो अदालतों को शिकायत पर विचार करना पड़ सकता है। पीठ की टिप्पणी के अनुसार, लोकतंत्र में जनता का भरोसा तभी कायम रह सकता है, जब चुनाव निष्पक्ष हों और उम्मीदवारों को निर्धारित प्रक्रिया के तहत भाग लेने का उचित अवसर मिले। अदालत ने इस बात पर जोर दिया कि चुनाव प्रक्रिया की शुचिता और संवैधानिक मूल्यों की रक्षा के बीच संतुलन बनाए रखना जरूरी है।

SIR विवाद के बीच क्यों महत्वपूर्ण है यह टिप्पणी?

देश में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) को लेकर राजनीतिक दलों के बीच विवाद जारी है। इसी पृष्ठभूमि में सुप्रीम कोर्ट की चुनाव प्रक्रिया से जुड़ी टिप्पणी महत्वपूर्ण हो गई है। हालांकि, आंध्र प्रदेश के इस मामले में अदालत के सामने मुख्य मुद्दा शहरी स्थानीय निकाय चुनावों में नामांकन दाखिल करने में कथित बाधाओं का था। इसे सीधे SIR पर अदालत का फैसला नहीं माना जाना चाहिए। अदालत ने अपने निर्देशों में नामांकन प्रक्रिया की निष्पक्षता, उम्मीदवारों की भागीदारी और चुनाव आयोग की जिम्मेदारी पर जोर दिया। इससे यह स्पष्ट हुआ कि चुनाव प्रक्रिया में आयोग की प्राथमिक भूमिका बनी रहती है, लेकिन गंभीर संवैधानिक सवाल उठने पर अदालतें न्यायिक समीक्षा कर सकती हैं।