1 डॉ. आसिफ उमर

एसोसिएट प्रोफेसर, हिन्दी विभाग

जामिया मिल्लिया इस्लामिया, नई दिल्ली

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15 अगस्त केवल एक तारीख नहीं है। यह भारत की सामूहिक स्मृति, संघर्ष और स्वाधीन चेतना का पर्व है। आज जब हम स्वतंत्र भारत की उपलब्धियों पर गर्व करते हैं, तो उन संस्थाओं को याद करना जरूरी है जिनकी नींव स्वतंत्रता आंदोलन की वैचारिक मिट्टी में पड़ी। जामिया मिल्लिया इस्लामिया ऐसी ही संस्था है, जिसका जन्म ब्रिटिश सत्ता के विरुद्ध राष्ट्रीय शिक्षा की आकांक्षा से हुआ।

स्वतंत्रता आंदोलन की गोद में जन्म

सन् 1920 का भारत उथल-पुथल में था। गांधी के नेतृत्व में असहयोग आंदोलन और खिलाफत आंदोलन ने देश को लामबंद किया। इसी पृष्ठभूमि में अंग्रेजी शासन से मुक्त, राष्ट्रीय शिक्षा के केंद्र की आवश्यकता महसूस हुई। 29 अक्टूबर 1920 को अलीगढ़ में जामिया मिल्लिया इस्लामिया की स्थापना हुई। शेखुल हिंद मौलाना महमूद हसन, मौलाना मोहम्मद अली जौहर, हकीम अजमल खान, डॉ. मुख्तार अहमद अंसारी और अब्दुल मजीद ख्वाजा जैसे नेताओं ने इसमें निर्णायक भूमिका निभाई। ‘जामिया’ यानी विश्वविद्यालय और ‘मिल्लिया’ यानी राष्ट्रीय। नाम में ही उसकी भावना थी - राष्ट्र, समाज और मनुष्य को केंद्र में रखने वाली शिक्षा। जामिया सत्ता की कृपा से नहीं बनी थी। इसके पीछे त्याग, असहमति और वैकल्पिक शिक्षा की कल्पना थी। यह औपनिवेशिक शिक्षा के बहिष्कार का प्रतीक थी।

शिक्षा को बनाया स्वतंत्रता का हथियार

गांधी ने सरकारी शिक्षण संस्थानों के बहिष्कार का आह्वान किया था। जामिया उसी आह्वान का उत्तर थी। इसका उद्देश्य सिर्फ विरोध नहीं था, बल्कि यह सवाल भी था कि स्वतंत्र भारत कैसा होगा और उसके नागरिकों को कैसी शिक्षा मिलेगी। जामिया ने अंग्रेजी पाठ्यक्रम के स्थान पर भारतीय भाषाओं, शिल्प, चरखा-कताई और स्वावलंबन को महत्व दिया। शिक्षा को चरित्र निर्माण, श्रम और सामाजिक जिम्मेदारी से जोड़ा गया। इस तरह जामिया भारतीय शिक्षा पर एक वैचारिक हस्तक्षेप बन गई।

संकट और संकल्प

1922 में असहयोग और 1924 में खिलाफत आंदोलन के समाप्त होने के बाद जामिया आर्थिक संकट में फंस गई। चंदे बंद हो गए और भविष्य पर प्रश्नचिह्न लग गया। लेकिन जामिया ने हार नहीं मानी। 1925 में इसे अलीगढ़ से दिल्ली के करोल बाग लाया गया। हकीम अजमल खान, डॉ. अंसारी और अब्दुल मजीद ख्वाजा ने इसे बचाने के लिए अपार परिश्रम किया। गांधी ने कहा था कि यदि जरूरत पड़ी तो वे स्वयं सहायता के लिए घर-घर जाएंगे। त्याग और विश्वास ने संस्था को जीवित रखा।

गांधी और जामिया का रिश्ता

गांधी के लिए शिक्षा डिग्री नहीं, चरित्र और सेवा थी। जामिया ने भी श्रम, आत्मनिर्भरता और स्वदेशी को अपनाया। चरखा यहां केवल आर्थिक साधन नहीं, स्वराज का प्रतीक था। जामिया ने साबित किया कि विश्वविद्यालय केवल इमारतें नहीं, एक विचार होता है। जामिया का विचार था - स्वतंत्र, मानवीय और राष्ट्र-निर्माण से जुड़ी शिक्षा।

हिन्दू-मुस्लिम एकता की प्रयोगशाला

जामिया की स्थापना उस दौर में हुई जब राष्ट्रीय आंदोलन को हिन्दू-मुस्लिम एकता की सबसे अधिक जरूरत थी। इसके संस्थापक कांग्रेस और खिलाफत दोनों से जुड़े थे। अब्दुल मजीद ख्वाजा जैसे लोग एकता के प्रबल समर्थक थे। जामिया की कल्पना एक ऐसे संस्थान की थी जो बहुलतावादी राष्ट्रवाद, भारतीय भाषाओं और सांस्कृतिक विविधता को महत्व दे। आज जब समाज में संवाद और सह-अस्तित्व की बात होती है, जामिया की यह विरासत और प्रासंगिक हो जाती है।

जाकिर हुसैन और नई तालीम

डॉ. जाकिर हुसैन के नेतृत्व में जामिया ने नई दिशा ली। उन्होंने जामिया को समाज की वास्तविक जरूरतों से जोड़ने का प्रयास किया। उनका जोर था कि आधुनिक शिक्षा और भारतीय अनुभव के बीच संतुलन बने। इसी दृष्टि ने जामिया को सामाजिक जिम्मेदारी से जुड़ी संस्था बनाया। शिक्षा यहां केवल नौकरी का साधन नहीं, बल्कि समाज बदलने का औजार बनी।

अलीगढ़ से जामिया नगर तक

जामिया की यात्रा स्थान परिवर्तन की भी कहानी है। अलीगढ़ से 1925 में करोल बाग और फिर 1930 के दशक में वर्तमान जामिया नगर। 1930 में यहां आधारशिला रखी गई। यह सफर एक छोटे शैक्षणिक प्रयोग के राष्ट्रीय संस्था बनने की यात्रा थी। संसाधन कम थे, पर उद्देश्य बड़ा था। संघर्ष और निर्माण साथ-साथ चले।

स्वतंत्र भारत में विस्तार

1947 के बाद जामिया के सामने नई चुनौती थी - राष्ट्र निर्माण। अब संघर्ष विदेशी सत्ता से नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक और समावेशी भारत बनाने से था। स्वतंत्रता के बाद जामिया ने शिक्षा, शोध, विज्ञान, तकनीक, मीडिया, मानविकी और सामाजिक विज्ञान में विस्तार किया। 1988 में संसद के अधिनियम से इसे केंद्रीय विश्वविद्यालय का दर्जा मिला। इस तरह स्वाधीनता की कोख से जन्मी संस्था स्वतंत्र भारत की उच्च शिक्षा का स्तंभ बन गई। आज जामिया शोध-प्रधान केंद्रीय विश्वविद्यालय है। यहां विविध पृष्ठभूमि के छात्र पढ़ते हैं और देश-विदेश में इसकी पहचान है।

विरासत : अतीत नहीं, जिम्मेदारी

15 अगस्त पर जामिया को याद करना केवल अतीत को दोहराना नहीं है। असली सवाल यह है कि उस विरासत का आज क्या अर्थ है। यदि जामिया स्वाधीनता आंदोलन से जन्मी है, तो उसकी जिम्मेदारी है - ज्ञान, लोकतांत्रिक चेतना, सामाजिक न्याय और वैज्ञानिक दृष्टिकोण को मजबूत करना। आज विश्वविद्यालयों से अपेक्षा है कि वे केवल डिग्री न दें, बल्कि ऐसे नागरिक तैयार करें जो लोकतंत्र का सम्मान करें, असहमति सुनें और विविधता को स्वीकारें। जामिया का इतिहास हमें यही प्रेरणा देता है।