
Jamia Millia Islamia
लेखक : डॉ. आसिफ़ उमर
एसोसिएट प्रोफेसर, हिंदी विभाग, जामिया मिल्लिया इस्लामिया, नई दिल्ली
जामिया मिल्लिया इस्लामिया केवल एक विश्वविद्यालय का नाम नहीं, बल्कि भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन, राष्ट्रीय शिक्षा, सांस्कृतिक समन्वय, सामाजिक प्रतिबद्धता और आधुनिक ज्ञान-परंपरा की एक जीवंत विरासत है। वर्ष 1920 में जिस संस्था का जन्म राष्ट्रीय स्वाभिमान और औपनिवेशिक शिक्षा-व्यवस्था के विकल्प के रूप में हुआ था, वह आज देश के प्रमुख केंद्रीय विश्वविद्यालयों में अपना विशिष्ट स्थान रखती है।
जामिया की इस गौरवपूर्ण यात्रा को समझने के लिए उसके कुलपतियों की परंपरा को समझना आवश्यक है। अलग-अलग दौर में कुलपतियों ने संस्था की अलग-अलग जरूरतों को पहचाना। किसी ने इसके अस्तित्व की लड़ाई लड़ी, किसी ने इसके शैक्षिक दर्शन को आकार दिया, किसी ने स्वतंत्र भारत में इसे स्थायित्व दिया, किसी ने विज्ञान और शोध को गति दी, किसी ने अकादमिक विस्तार के नए द्वार खोले और किसी ने इसे आधुनिक कौशल, नवाचार और वैश्विक शिक्षा की ओर अग्रसर किया।
इस पूरी यात्रा में मौलाना मोहम्मद अली जौहर, अब्दुल मजीद ख्वाजा और डॉ. जाकिर हुसैन की भूमिका बुनियादी महत्व रखती है। इनके बिना जामिया के वैचारिक और संस्थागत चरित्र को समझना संभव नहीं। आधुनिक काल में प्रो. मुशीरुल हसन, प्रो. तलत अहमद और वर्तमान कुलपति प्रो. मज़हर आसिफ ने जामिया को अकादमिक विस्तार, शोध, विज्ञान, नए पाठ्यक्रमों, कौशल और अंतरराष्ट्रीय दृष्टि से जोड़ने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
मौलाना मोहम्मद अली जौहर : राष्ट्रीय शिक्षा के स्वप्न की पहली मशाल
कुलपति : 1920–1923
जामिया की कुलपति परंपरा का पहला नाम मौलाना मोहम्मद अली जौहर है। वे केवल जामिया के प्रथम कुलपति ही नहीं थे, बल्कि उस राष्ट्रीय चेतना के प्रमुख वाहक थे जिसने जामिया के जन्म को संभव बनाया।
भारत उस समय ब्रिटिश शासन के अधीन था और शिक्षा का क्षेत्र भी औपनिवेशिक व्यवस्था से प्रभावित था। ऐसे समय में एक ऐसी शिक्षण संस्था की कल्पना करना, जो भारतीय मूल्यों, राष्ट्रीय स्वाभिमान और स्वतंत्र चिंतन पर आधारित हो, अपने आप में एक क्रांतिकारी विचार था।
मौलाना जौहर ने शिक्षा को स्वतंत्रता संघर्ष का अभिन्न अंग माना। उनके लिए शिक्षित होना मात्र डिग्री प्राप्त करना नहीं, बल्कि अपने देश, समाज और संस्कृति के प्रति जागरूक होना था। जामिया के जन्म के पीछे यही विचारधारा काम कर रही थी।
एक राष्ट्रवादी नेता, पत्रकार, स्वतंत्रता सेनानी और खिलाफत आंदोलन के प्रमुख व्यक्तित्व के रूप में उनका सार्वजनिक जीवन व्यापक था। उन्होंने जामिया को प्रारंभ से ही उस राष्ट्रीय आंदोलन से जोड़ा जिसमें स्वाधीनता, आत्मसम्मान, सामाजिक एकता और वैकल्पिक शिक्षा प्रमुख मूल्य थे।
जामिया की स्थापना के साथ उन्होंने यह संदेश दिया कि भारत अपनी शिक्षा-व्यवस्था के निर्माण में स्वयं अपनी राह चुन सकता है।
आज जामिया जिस राष्ट्रीय और समावेशी चरित्र के लिए जाना जाता है, उसकी वैचारिक शुरुआत में मौलाना जौहर की भूमिका को भुलाया नहीं जा सकता। उन्होंने जामिया को केवल एक शिक्षण संस्था नहीं, बल्कि राष्ट्रीय पुनर्जागरण की प्रयोगशाला के रूप में देखने की दृष्टि दी।
अब्दुल मजीद ख्वाजा : कठिन परिस्थितियों में संस्था की लौ को बचाए रखने वाले नेतृत्वकर्ता
कुलपति : 1923–1925
मौलाना जौहर के बाद अब्दुल मजीद ख्वाजा ने जामिया का नेतृत्व संभाला। जामिया का आरंभिक दौर आर्थिक और संस्थागत कठिनाइयों से भरा हुआ था। किसी नवोदित राष्ट्रीय संस्था के लिए संसाधन जुटाना और उसके अस्तित्व को बनाए रखना बड़ी चुनौती थी।
अब्दुल मजीद ख्वाजा ने ऐसे समय में नेतृत्व संभाला जब जामिया को केवल शैक्षणिक संस्था के रूप में नहीं, बल्कि एक राष्ट्रीय मिशन के रूप में बचाए रखना था।
वे राष्ट्रीय आंदोलन से जुड़े हुए थे और हिंदू-मुस्लिम एकता के समर्थक थे। उनका योगदान जामिया की उस समावेशी भावना को मजबूत करने में महत्वपूर्ण रहा जिसमें शिक्षा को समाज को जोड़ने वाली शक्ति माना गया।
उनके कार्यकाल का महत्व किसी बड़े भवन या किसी विशाल अकादमिक विस्तार में नहीं, बल्कि उस संस्थागत धैर्य और प्रतिबद्धता में है जिसने जामिया को उसके नाजुक आरंभिक वर्षों में संभाला।
यदि मौलाना मोहम्मद अली जौहर ने जामिया के स्वप्न को जन्म दिया, तो अब्दुल मजीद ख्वाजा ने कठिन परिस्थितियों में उस स्वप्न की लौ को बुझने नहीं दिया।
डॉ. जाकिर हुसैन : जामिया के विचार को जीवन-पद्धति में बदलने वाले महान शिक्षाविद्
कुलपति : 1926–1948
जामिया के इतिहास में डॉ. जाकिर हुसैन का स्थान अत्यंत ऊँचा है। उनका लगभग 22 वर्षों का नेतृत्व जामिया के निर्माण का सबसे निर्णायक अध्याय माना जा सकता है।
1926 में जर्मनी से उच्च शिक्षा पूरी करने के बाद भारत लौटकर उन्होंने जामिया का नेतृत्व संभाला। उस समय संस्था आर्थिक संकट और अस्तित्व की कठिन चुनौतियों से जूझ रही थी। डॉ. जाकिर हुसैन ने इन परिस्थितियों में जामिया को केवल बचाया ही नहीं, बल्कि उसके लिए एक विशिष्ट शैक्षिक दर्शन विकसित किया।
उनकी शिक्षा-दृष्टि में श्रम, आत्मनिर्भरता, चरित्र-निर्माण, व्यावहारिक ज्ञान और सामाजिक जिम्मेदारी का विशेष महत्व था। वे शिक्षा को जीवन से अलग नहीं मानते थे।
उनका विश्वास था कि विद्यार्थी केवल किताबों से ज्ञान प्राप्त करने वाला व्यक्ति न हो, बल्कि वह अपने हाथों से काम करने, समाज को समझने और देश के निर्माण में योगदान देने वाला नागरिक बने।
जामिया में विकसित यह दृष्टि आगे चलकर उसकी विशिष्ट पहचान का आधार बनी।
डॉ. जाकिर हुसैन ने संस्था के आर्थिक और संगठनात्मक आधार को मजबूत करने की दिशा में भी महत्वपूर्ण प्रयास किए। ‘लाइफ मेंबर्स’ की परंपरा ने जामिया के साथ दीर्घकालीन प्रतिबद्धता का भाव विकसित किया।
उनके नेतृत्व की सबसे बड़ी उपलब्धि यह थी कि उन्होंने जामिया को एक अस्थायी राष्ट्रीय प्रयोग से निकालकर एक जीवंत और टिकाऊ शैक्षिक संस्था के रूप में स्थापित किया।
बाद में वे अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के कुलपति, बिहार के राज्यपाल, भारत के उपराष्ट्रपति और देश के राष्ट्रपति बने। लेकिन जामिया के निर्माण में उनकी भूमिका उनकी सबसे स्थायी शैक्षिक विरासतों में गिनी जाती है।
जामिया की आत्मा, उसकी शैक्षिक संस्कृति और उसके सामाजिक सरोकारों पर डॉ. जाकिर हुसैन की गहरी छाप आज भी दिखाई देती है।
प्रो. मोहम्मद मुजीब : स्वतंत्र भारत में जामिया को स्थिरता देने वाला दौर
कुलपति : 1948–1973
डॉ. जाकिर हुसैन के बाद प्रो. मोहम्मद मुजीब ने लगभग 25 वर्षों तक जामिया का नेतृत्व किया। यह स्वतंत्र भारत के निर्माण और विभाजन के बाद का अत्यंत संवेदनशील समय था।
देश राजनीतिक, सामाजिक और आर्थिक पुनर्निर्माण की प्रक्रिया से गुजर रहा था। ऐसे समय में जामिया की संस्थागत निरंतरता बनाए रखना एक बड़ी चुनौती थी।
प्रो. मुजीब के लंबे कार्यकाल ने जामिया को स्थिरता प्रदान की। उन्होंने राष्ट्रीय आंदोलन की विरासत को स्वतंत्र भारत की आधुनिक उच्च शिक्षा की आवश्यकताओं से जोड़ने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
उनके दौर में जामिया ने धीरे-धीरे स्वयं को एक व्यवस्थित उच्च शिक्षण संस्था के रूप में विकसित किया। यह वह चरण था जब स्वतंत्रता आंदोलन की ऊर्जा को संस्थागत अकादमिक परंपरा में बदलने का कार्य आगे बढ़ा।
प्रो. मसूद हुसैन खान : भाषा, साहित्य और विद्वत्ता की परंपरा
कुलपति : 1973–1978
प्रख्यात भाषाविद् प्रो. मसूद हुसैन खान का नेतृत्व जामिया की भाषाई और साहित्यिक परंपरा के लिए महत्वपूर्ण रहा।
जामिया की पहचान शुरू से ही हिंदी, उर्दू और भारतीय भाषाओं की बहुलतापूर्ण संस्कृति से जुड़ी रही है। प्रो. मसूद हुसैन खान जैसे विद्वान कुलपति ने इस बौद्धिक परंपरा को आगे बढ़ाया।
उनका दौर यह प्रमाणित करता है कि जामिया की शक्ति केवल विज्ञान और आधुनिक व्यावसायिक शिक्षा में नहीं, बल्कि भाषा, साहित्य, संस्कृति और मानवीय अध्ययन में भी रही है।
अनवर जमाल किदवई : प्रशासनिक दक्षता और बदलते समय की आवश्यकताएँ
कुलपति : 1978–1983
अनवर जमाल किदवई ने व्यापक प्रशासनिक अनुभव के साथ जामिया का नेतृत्व किया। उनके कार्यकाल में संस्थागत प्रशासन और अकादमिक गतिविधियों को निरंतरता मिली।
यह वह दौर था जब देश में उच्च शिक्षा का विस्तार हो रहा था और विश्वविद्यालयों को नई प्रशासनिक तथा शैक्षिक चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा था। जामिया ने भी इस परिवर्तनशील वातावरण के साथ स्वयं को ढालना जारी रखा।
प्रो. अली अशरफ : शिक्षा को सामाजिक सरोकारों से जोड़ने का प्रयास
कुलपति : 1983–1989
प्रो. अली अशरफ के नेतृत्व में जामिया की सामाजिक चेतना और शैक्षिक भूमिका को आगे बढ़ाया गया।
जामिया की स्थापना ही समाज और राष्ट्र के व्यापक प्रश्नों से जुड़ी थी। इस दृष्टि को आगे बढ़ाते हुए उनके कार्यकाल में शिक्षा को सामाजिक जिम्मेदारी और मानवीय मूल्यों से जोड़ने की परंपरा मजबूत हुई।
डॉ. सैयद ज़हूर कासिम : वैज्ञानिक चेतना का विस्तार
कुलपति : 1989–1991
देश के प्रतिष्ठित वैज्ञानिक डॉ. सैयद ज़हूर कासिम का जामिया के नेतृत्व में आना अपने आप में महत्वपूर्ण था।
उनकी वैज्ञानिक पृष्ठभूमि ने विश्वविद्यालय में विज्ञान और शोध की आवश्यकता को विशेष महत्व दिया। उनका कार्यकाल छोटा रहा, लेकिन वैज्ञानिक दृष्टि ने जामिया के भविष्य के बहुविषयी स्वरूप के लिए महत्वपूर्ण आधार तैयार किया।
प्रो. बशीरुद्दीन अहमद : अकादमिक निरंतरता
कुलपति : 1992–1996
प्रो. बशीरुद्दीन अहमद के कार्यकाल में जामिया की अकादमिक और प्रशासनिक गतिविधियों को निरंतरता मिली। विश्वविद्यालय के संस्थागत ढाँचे को मजबूत करने की प्रक्रिया आगे बढ़ती रही।
लेफ्टिनेंट जनरल एम. ए. ज़की : प्रशासनिक अनुशासन की दृष्टि
कुलपति : 1997–2000
लेफ्टिनेंट जनरल एम. ए. ज़की अपने व्यापक प्रशासनिक और संगठनात्मक अनुभव के साथ जामिया के नेतृत्व में आए।
उनके कार्यकाल में संस्थागत अनुशासन, प्रशासनिक दक्षता और व्यवस्थित संचालन पर विशेष जोर रहा। विश्वविद्यालय जैसे बड़े संस्थान के विकास में मजबूत प्रशासनिक ढाँचे की भूमिका महत्वपूर्ण होती है।
सैयद शाहिद मेहदी : प्रशासन से अकादमिक संस्थागत विकास की ओर
कुलपति : 2000–2004
सैयद शाहिद महदी को प्रशासन और अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं का व्यापक अनुभव था। उनके नेतृत्व ने जामिया को प्रशासनिक दृष्टि से नई चुनौतियों का सामना करने और आधुनिक उच्च शिक्षा के बदलते वातावरण के अनुरूप आगे बढ़ने में मदद की।
उनका कार्यकाल उस संक्रमण का हिस्सा था जिसके बाद जामिया में अकादमिक विस्तार का एक नया चरण दिखाई देता है।
प्रो. मुशीरुल हसन : जामिया के अकादमिक विस्तार के शिल्पकार
कुलपति : 2004–2009
जामिया के आधुनिक इतिहास में प्रो. मुशीरुल हसन का कार्यकाल एक महत्वपूर्ण मोड़ के रूप में देखा जा सकता है।
प्रख्यात इतिहासकार के रूप में उनकी पहचान पहले से स्थापित थी, लेकिन कुलपति के रूप में उन्होंने जामिया के अकादमिक विस्तार को उल्लेखनीय गति प्रदान की।
उनके कार्यकाल में लगभग 250 नए शिक्षण पदों का सृजन और 12 नए केंद्रों की स्थापना हुई। यह विस्तार केवल संख्या में वृद्धि नहीं था; इसके पीछे जामिया के अकादमिक क्षितिज को व्यापक बनाने की दृष्टि थी।
नए केंद्रों के माध्यम से विश्वविद्यालय ने पारंपरिक विषयों से आगे बढ़कर स्वास्थ्य, व्यावसायिक शिक्षा और अन्य उभरते क्षेत्रों में अपनी उपस्थिति मजबूत की।
प्रो. मुशीरुल हसन का एक बड़ा योगदान यह था कि उन्होंने शोध को विश्वविद्यालय की बौद्धिक पहचान का महत्वपूर्ण आधार बनाया। इतिहासकार के रूप में वे जानते थे कि किसी विश्वविद्यालय की वास्तविक शक्ति केवल उसके भवनों और पाठ्यक्रमों में नहीं, बल्कि उसके शोध और ज्ञान-सृजन में होती है।
भारतीय राष्ट्रवाद, स्वतंत्रता आंदोलन, मुस्लिम समाज, विभाजन और आधुनिक भारत के इतिहास पर उनका अपना शोध व्यापक था। उन्होंने जामिया में भी गंभीर अकादमिक विमर्श को प्रोत्साहित किया।
उनके दौर में जामिया के सामने एक नया प्रश्न स्पष्ट हुआ—क्या एक ऐतिहासिक और मानविकी-सामाजिक विज्ञान की मजबूत परंपरा वाले विश्वविद्यालय को विज्ञान, स्वास्थ्य और नए ज्ञान क्षेत्रों में भी विस्तार करना चाहिए? प्रो. मुशीरुल हसन के नेतृत्व ने इसका उत्तर सकारात्मक अकादमिक विस्तार के रूप में दिया।
इसलिए उनका कार्यकाल जामिया को आधुनिक बहुविषयी विश्वविद्यालय की दिशा में ले जाने वाले महत्वपूर्ण चरणों में गिना जा सकता है।
नजीब जंग : प्रशासन और शासन का अनुभव
कुलपति : 2009–2013
नजीब जंग व्यापक प्रशासनिक अनुभव रखने वाले अधिकारी थे। उनके नेतृत्व में जामिया ने प्रशासनिक व्यवस्था और संस्थागत प्रबंधन को आगे बढ़ाया।
उनका अनुभव विश्वविद्यालय के संचालन और शासन संबंधी चुनौतियों से निपटने में उपयोगी रहा।
प्रो. तलत अहमद : शोध और विज्ञान को नई ऊर्जा देने वाला नेतृत्व
कुलपति : 2014–2018
जामिया की आधुनिक अकादमिक यात्रा में प्रो. तलत अहमद का कार्यकाल विशेष महत्व रखता है।
भू-विज्ञान के प्रतिष्ठित वैज्ञानिक और शिक्षाविद् के रूप में उन्होंने जामिया के नेतृत्व में विज्ञान, शोध और अकादमिक उत्कृष्टता को विशेष महत्व दिया।
जामिया की ऐतिहासिक पहचान मानविकी, सामाजिक विज्ञान और भाषाओं में अत्यंत मजबूत रही है। लेकिन 21वीं सदी के विश्वविद्यालय के सामने विज्ञान, तकनीक, शोध और नवाचार को मजबूत करने की चुनौती भी थी। प्रो. तलत अहमद का नेतृत्व इसी आवश्यकता के संदर्भ में महत्वपूर्ण दिखाई देता है।
उनकी वैज्ञानिक पृष्ठभूमि ने विश्वविद्यालय में शोध की संस्कृति को और मजबूत करने की दिशा प्रदान की। उन्होंने यह स्पष्ट किया कि आधुनिक विश्वविद्यालय की प्रतिष्ठा केवल विद्यार्थियों की संख्या या पाठ्यक्रमों की विविधता से नहीं, बल्कि ज्ञान के नए क्षेत्रों में शोध और नवाचार की क्षमता से भी तय होती है।
उनके दौर में जामिया की अकादमिक गतिविधियों में बहुविषयी दृष्टि को बल मिला। विज्ञान और तकनीकी क्षेत्रों के साथ सामाजिक विज्ञान तथा मानविकी के बीच संवाद की संभावनाएँ भी व्यापक हुईं।
प्रो. तलत अहमद के कार्यकाल को इसलिए जामिया के उस चरण के रूप में देखा जा सकता है जब विश्वविद्यालय ने अपनी ऐतिहासिक अकादमिक पहचान को बनाए रखते हुए शोध-प्रधान और विज्ञान समर्थित आधुनिक विश्वविद्यालय बनने की दिशा में और मजबूती से कदम बढ़ाया।
उनके योगदान का महत्व आगे आने वाले वर्षों में जामिया की राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय अकादमिक प्रतिष्ठा के विकास की पृष्ठभूमि में भी देखा जा सकता है।
प्रो. नजमा अख्तर : महिला नेतृत्व और संस्थागत उपलब्धियाँ
कुलपति : 2019–2023
प्रो. नजमा अख्तर जामिया की पहली महिला कुलपति बनीं। उनके कार्यकाल में विश्वविद्यालय को NAAC का A++ ग्रेड मिला और NIRF की विश्वविद्यालय श्रेणी में जामिया ने देश के शीर्ष संस्थानों में स्थान प्राप्त किया।
प्रो. मज़हर आसिफ : विरासत को भविष्य की शिक्षा से जोड़ता वर्तमान नेतृत्व
वर्तमान कुलपति
जामिया की वर्तमान कुलपति परंपरा का प्रतिनिधित्व प्रो. मज़हर आसिफ कर रहे हैं। उनका नेतृत्व ऐसे समय में सामने आया है जब उच्च शिक्षा की दुनिया तेजी से बदल रही है। कृत्रिम बुद्धिमत्ता, डिजिटल तकनीक, कौशल-आधारित शिक्षा, अंतर्विषयी अध्ययन, नवाचार और वैश्विक अकादमिक सहयोग ने विश्वविद्यालयों की भूमिका को नया स्वरूप दिया है।
प्रो. मज़हर आसिफ की दृष्टि का महत्वपूर्ण पक्ष यह है कि वे जामिया की ऐतिहासिक विरासत को आधुनिक शिक्षा की आवश्यकताओं से जोड़ने पर बल देते हैं।
नए पाठ्यक्रम : बदलते रोजगार संसार के अनुरूप शिक्षा
शैक्षणिक सत्र 2025–26 में जामिया ने अनेक नए पाठ्यक्रम शुरू किए। डिजाइन, कंप्यूटर साइंस, फायर सेफ्टी, ग्राफिक आर्ट, क्यूरेटोरियल प्रैक्टिस, आर्ट मैनेजमेंट, क्रिएटिव फोटोग्राफी और कॉलिग्राफी जैसे विविध क्षेत्रों का समावेश यह संकेत देता है कि विश्वविद्यालय अपने अकादमिक क्षितिज को नए ज्ञान और कौशल क्षेत्रों तक विस्तृत कर रहा है।
यह विस्तार केवल पाठ्यक्रमों की संख्या बढ़ाने का प्रयास नहीं है। इसके पीछे बदलती अर्थव्यवस्था और रोजगार बाजार की जरूरतों को समझने की दृष्टि दिखाई देती है।
आज के विद्यार्थी को विषयगत ज्ञान के साथ डिजिटल दक्षता, रचनात्मकता, व्यावहारिक कौशल और नवाचार की क्षमता भी चाहिए। इसी दिशा में प्रो. मज़हर आसिफ कौशल-आधारित शिक्षा पर बल देते हैं।
NEP 2020 और नई शिक्षा-दृष्टि
नई शिक्षा नीति के संदर्भ में जामिया को आधुनिक, बहुविषयी और कौशल-उन्मुख विश्वविद्यालय के रूप में विकसित करने की दिशा वर्तमान नेतृत्व की महत्वपूर्ण प्राथमिकता है।
यह जामिया की मूल शिक्षा-दृष्टि से भी जुड़ता है। डॉ. जाकिर हुसैन जिस शिक्षा को जीवन और श्रम से जोड़ना चाहते थे, आज वही भावना आधुनिक संदर्भ में कौशल, नवाचार और व्यावहारिक शिक्षा के रूप में दिखाई देती है।
प्रवेश का विस्तार
जामिया को देश के अधिक व्यापक विद्यार्थी समुदाय तक पहुँचाने की दिशा में भी महत्वपूर्ण कदम उठाए गए हैं। CUET के माध्यम से अधिक कार्यक्रमों में प्रवेश तथा विभिन्न शहरों में प्रवेश परीक्षाओं के आयोजन से विश्वविद्यालय की पहुँच को व्यापक बनाने का प्रयास किया गया है।
इसका महत्व इसलिए भी है कि जामिया की ऐतिहासिक प्रतिष्ठा देश के अलग-अलग क्षेत्रों के विद्यार्थियों को आकर्षित करती है। प्रवेश प्रक्रिया को अधिक व्यापक और सुलभ बनाना प्रतिभाशाली विद्यार्थियों के लिए अवसरों का विस्तार करता है।
अंतरराष्ट्रीयकरण की दिशा
प्रो. मज़हर आसिफ के नेतृत्व में जामिया को अधिक वैश्विक अकादमिक वातावरण से जोड़ने पर भी बल दिया जा रहा है।
विदेशी विद्यार्थियों और SAARC देशों से आने वाले विद्यार्थियों के लिए सुविधाएँ तथा विदेशी PhD अभ्यर्थियों के लिए ऑनलाइन साक्षात्कार जैसी व्यवस्थाएँ विश्वविद्यालय के अंतरराष्ट्रीय स्वरूप को मजबूत करने की दिशा में महत्वपूर्ण हैं।
शोध और नवाचार
21वीं सदी के विश्वविद्यालय की पहचान उसके शोध से होती है। प्रो. मज़हर आसिफ के नेतृत्व में जामिया के सामने चुनौती यह है कि उसकी ऐतिहासिक मानविकी एवं सामाजिक विज्ञान की शक्ति के साथ विज्ञान, तकनीक, डिजिटल अध्ययन और नए ज्ञान क्षेत्रों में शोध को भी समान गति मिले।
यदि यह संतुलन सफलतापूर्वक स्थापित होता है तो जामिया अपनी पारंपरिक विशिष्टता को बनाए रखते हुए आधुनिक वैश्विक विश्वविद्यालयों की प्रतिस्पर्धा में और मजबूत स्थिति प्राप्त कर सकता है।
अतीत से संवाद, भविष्य की तैयारी
प्रो. मज़हर आसिफ के नेतृत्व की सबसे महत्वपूर्ण विशेषता यही है कि इसमें जामिया के अतीत और भविष्य के बीच संवाद दिखाई देता है।
मौलाना मोहम्मद अली जौहर की राष्ट्रीय चेतना, अब्दुल मजीद ख्वाजा की संस्थागत प्रतिबद्धता और डॉ. जाकिर हुसैन की जीवनपरक शिक्षा-दृष्टि को आधुनिक संदर्भ में कौशल, शोध, नवाचार, तकनीक और वैश्विक शिक्षा से जोड़ना जामिया के लिए एक महत्वपूर्ण दिशा हो सकती है।
कुलपति परंपरा : एक व्यक्ति नहीं, पीढ़ियों की सामूहिक कहानी
जामिया मिल्लिया इस्लामिया की कुलपति परंपरा को किसी एक व्यक्ति की उपलब्धियों के रूप में देखना उसके व्यापक इतिहास के साथ न्याय नहीं होगा।
मौलाना मोहम्मद अली जौहर ने राष्ट्रीय शिक्षा की मशाल जलाई।
अब्दुल मजीद ख्वाजा ने कठिन परिस्थितियों में उस मशाल की रक्षा की।
डॉ. जाकिर हुसैन ने उस प्रकाश को एक विशिष्ट शैक्षिक दर्शन में बदला।
प्रो. मोहम्मद मुजीब ने स्वतंत्र भारत में जामिया की निरंतरता और स्थिरता को मजबूत किया।
प्रो. मसूद हुसैन खान ने भाषाई और साहित्यिक परंपरा को आगे बढ़ाया।
बाद के कुलपतियों ने प्रशासन, सामाजिक सरोकार, विज्ञान और संस्थागत विकास को क्रमशः मजबूत किया।
आधुनिक काल में प्रो. मुशीरुल हसन ने अकादमिक विस्तार और नए केंद्रों के माध्यम से जामिया के शैक्षिक क्षितिज को व्यापक बनाया। प्रो. तलत अहमद ने विज्ञान, शोध और अकादमिक उत्कृष्टता की दिशा को नई ऊर्जा दी। प्रो. नजमा अख्तर के कार्यकाल में संस्थागत गुणवत्ता और राष्ट्रीय रैंकिंग के क्षेत्र में महत्वपूर्ण उपलब्धियाँ दर्ज हुईं।
और वर्तमान में प्रो. मज़हर आसिफ जामिया की ऐतिहासिक विरासत को नई शिक्षा नीति, कौशल, नए पाठ्यक्रमों, शोध, नवाचार, प्रवेश-विस्तार और अंतरराष्ट्रीयकरण के साथ जोड़ने की दिशा में कार्य कर रहे हैं।
यही जामिया की असली कहानी है—एक कुलपति से दूसरे कुलपति तक केवल पद का हस्तांतरण नहीं, बल्कि एक विचार और एक शैक्षिक मिशन की निरंतरता।
आज जामिया उस मुकाम पर खड़ी है जहाँ उसके सामने अतीत की महान विरासत भी है और भविष्य की बड़ी चुनौतियाँ भी। एक ओर मौलाना मोहम्मद अली जौहर और अब्दुल मजीद ख्वाजा का राष्ट्रीय स्वप्न है, दूसरी ओर डॉ. जाकिर हुसैन की जीवनपरक शिक्षा-दृष्टि; एक ओर प्रो. मुशीरुल हसन का अकादमिक विस्तार और शोध की चेतना है, तो दूसरी ओर प्रो. तलत अहमद की वैज्ञानिक दृष्टि; और वर्तमान में प्रो. मज़हर आसिफ के नेतृत्व में कौशल, नवाचार, नई शिक्षा नीति और वैश्विक अकादमिक क्षितिज की ओर बढ़ने का प्रयास है।
इसलिए जामिया की कुलपति परंपरा को एक जलती हुई मशाल की तरह देखा जा सकता है—जिसे एक पीढ़ी ने जलाया, दूसरी ने कठिन परिस्थितियों में बचाया, तीसरी ने उसे प्रकाश में बदला और बाद की पीढ़ियों ने उस प्रकाश को नए ज्ञान क्षेत्रों तक पहुँचाया।
जामिया की यात्रा संघर्ष से उपलब्धि तक की यात्रा भर नहीं है; यह विचार से संस्था, संस्था से विश्वविद्यालय और विश्वविद्यालय से वैश्विक अकादमिक पहचान की ओर बढ़ती हुई एक सतत यात्रा है।
और इस यात्रा की सबसे बड़ी खूबी यही है कि समय बदलता रहा, नेतृत्व बदलता रहा, शिक्षा के स्वरूप बदलते रहे—लेकिन जामिया की मूल आत्मा, ज्ञान, राष्ट्रीय चेतना, सामाजिक जिम्मेदारी और मानवीय मूल्यों की प्रतिबद्धता, निरंतर बनी रही।यह संस्करण अख़बार के विशेष लेख/संपादकीय फीचर के लिए अधिक उपयुक्त है। इसमें मैंने उपलब्धियों को केवल गिनाने के बजाय प्रत्येक कुलपति के योगदान को जामिया की विकास-यात्रा से जोड़कर प्रस्तुत किया है।
