Jamia Millia Islamia

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नई दिल्ली। जामिया मिल्लिया इस्लामिया के रजिस्ट्रार प्रो. मोहम्मद महताब आलम रिजवी के खिलाफ सोशल मीडिया और अन्य सार्वजनिक मंचों पर कथित तौर पर प्रसारित की जा रही सामग्री पर दिल्ली की सिविल अदालत ने अंतरिम रोक लगा दी है। 31 अगस्त 2026 को प्रो. रिजवी की याचिका पर सुनवाई करते हुए अदालत ने प्रथम दृष्टया मानहानिकारक मानी गई सामग्री के प्रसार पर रोक लगाते हुए संबंधित पोस्ट और प्रकाशित सामग्री को सात दिनों के भीतर हटाने का निर्देश दिया।

अदालत ने अंतरिम आदेश के लिए प्रथम दृष्टया मामला, सुविधा का संतुलन और अपूरणीय क्षति समेत निर्धारित कानूनी कसौटियों पर विचार किया। आदेश के अनुसार लगाए गए आरोप प्रो. रिजवी की पेशेवर प्रतिष्ठा और केंद्रीय विश्वविद्यालय में उनके वैधानिक पद से जुड़े हैं। अदालत ने माना कि संबंधित सामग्री के सार्वजनिक प्रसार से होने वाली क्षति की भरपाई केवल आर्थिक मुआवजे से पर्याप्त रूप से नहीं की जा सकती।

विश्वविद्यालय समुदाय से जुड़े लोगों ने कहा है कि किसी विश्वविद्यालय पदाधिकारी के खिलाफ लगाए गए गंभीर आरोपों का फैसला सोशल मीडिया पर चल रहे आरोप-प्रत्यारोप के आधार पर नहीं, बल्कि प्रमाण और उचित कानूनी प्रक्रिया के आधार पर होना चाहिए। उनका कहना है कि सोशल मीडिया पर लगाए गए अप्रमाणित आरोपों के आधार पर किसी व्यक्ति की प्रतिष्ठा या केंद्रीय विश्वविद्यालय की संस्थागत गरिमा तय नहीं की जा सकती।

अदालत के आदेश के बाद जामिया से जुड़े करीब 150–200 शिक्षकों और कर्मचारियों ने संयुक्त आवेदन पर हस्ताक्षर कर कथित अभियान पर आपत्ति जताई। इनमें डीन, विभागाध्यक्ष, शिक्षक और प्रशासनिक कर्मचारी शामिल बताए गए हैं। इसके बाद एक प्रतिनिधिमंडल जामिया नगर थाने पहुंचा और संबंधित सामग्री के स्रोत, उसे तैयार करने वालों तथा उसके प्रसार की जांच की मांग करते हुए औपचारिक शिकायत दर्ज कराई।

शिकायत में भूपेंद्रपाल सिंह चमार, इंटरनेशनल प्रेसिडेंट, वर्ल्ड दलित परिषद (World Dalit Council), हारिस-उल-हक समेत चार अन्य लोगों के नाम शामिल बताए गए हैं। शिकायतकर्ताओं का आरोप है कि प्रो. रिजवी और विश्वविद्यालय प्रशासन के खिलाफ लगातार ऐसी सामग्री प्रसारित की गई, जिससे उनकी प्रतिष्ठा को नुकसान पहुंचा और विश्वविद्यालय की प्रशासनिक व्यवस्था पर भी सवाल उठे।

पूरे घटनाक्रम के बाद विवाद सोशल मीडिया और सार्वजनिक आरोप-प्रत्यारोप से आगे बढ़कर न्यायिक और संस्थागत जांच के दायरे में पहुंच गया है। एक ओर अदालत ने प्रथम दृष्टया मानहानिकारक मानी गई सामग्री के प्रसार पर रोक लगाई है, वहीं विश्वविद्यालय समुदाय की शिकायत में सामग्री के स्रोत, लेखकों और उसके प्रसार की व्यापक जांच की मांग की गई है।

मामले में प्रतिवादी पक्षों को नए समन जारी किए गए हैं। सिविल मुकदमे की अगली सुनवाई 29 अक्टूबर 2026 को निर्धारित की गई है। अदालत का मौजूदा आदेश अंतरिम है और मामले में अंतिम न्यायिक निष्कर्ष अभी बाकी है।