हाल ही में एक IVF क्लीनिक में कथित तौर पर बच्चे की अदला-बदली का मामला सामने आने के बाद सहायक प्रजनन तकनीक (ART) और IVF प्रक्रिया एक बार फिर चर्चा के केंद्र में आ गई है। इस घटना ने उन लाखों दंपतियों के मन में सवाल खड़े कर दिए हैं जो संतान प्राप्ति के लिए IVF का सहारा लेते हैं। आखिर IVF में भ्रूण कैसे तैयार किया जाता है, गर्भाशय के बजाय कांच की प्लेट पर जीवन की शुरुआत कैसे होती है और भारत में इसकी मांग लगातार क्यों बढ़ रही है? आइए विस्तार से समझते हैं।
IVF
क्या है IVF और कैसे होती है प्रक्रिया?
इन विट्रो फर्टिलाइजेशन (IVF) एक ऐसी आधुनिक चिकित्सा तकनीक है, जिसके जरिए महिला के अंडाणु और पुरुष के शुक्राणु को शरीर के बाहर प्रयोगशाला में निषेचित कराया जाता है। सामान्य गर्भधारण में यह प्रक्रिया महिला के शरीर के भीतर होती है, लेकिन IVF में इसे नियंत्रित वातावरण में अंजाम दिया जाता है। सबसे पहले महिला को हार्मोनल दवाएं देकर अधिक अंडाणु विकसित किए जाते हैं। इसके बाद अंडाणुओं को निकाला जाता है और पुरुष के शुक्राणुओं के साथ मिलाकर निषेचन कराया जाता है। सफल निषेचन के बाद बने भ्रूण को कुछ दिनों तक लैब में विकसित किया जाता है और फिर महिला के गर्भाशय में प्रत्यारोपित कर दिया जाता है।
गर्भाशय की जगह कांच की प्लेट पर कैसे बनता है भ्रूण?
IVF की सबसे खास और वैज्ञानिक रूप से जटिल प्रक्रिया प्रयोगशाला में होती है। निषेचन के लिए अंडाणु और शुक्राणु को विशेष कांच की डिश या प्लेट में रखा जाता है, जिसे नियंत्रित तापमान, नमी और गैसों वाले इनक्यूबेटर में सुरक्षित रखा जाता है। यह वातावरण महिला के शरीर के प्राकृतिक माहौल जैसा बनाया जाता है ताकि भ्रूण का विकास सामान्य तरीके से हो सके। निषेचन के बाद भ्रूण लगातार विभाजित होता है और 3 से 5 दिनों तक उसकी निगरानी की जाती है। विशेषज्ञ सबसे स्वस्थ भ्रूण का चयन कर उसे गर्भाशय में स्थानांतरित करते हैं। इसी कारण IVF को आम बोलचाल में ‘टेस्ट ट्यूब बेबी’ तकनीक भी कहा जाता है।
बच्चा बदली का मामला कैसे खड़ा करता है गंभीर सवाल?
IVF क्लीनिक में सामने आए कथित बच्चा बदली के मामले ने पूरी प्रक्रिया की पारदर्शिता और सुरक्षा पर सवाल खड़े कर दिए हैं। IVF के दौरान अंडाणु, शुक्राणु और भ्रूण की पहचान सुनिश्चित करने के लिए सख्त प्रोटोकॉल अपनाए जाते हैं। प्रत्येक नमूने को विशेष कोड और रिकॉर्ड के साथ सुरक्षित रखा जाता है। हालांकि किसी भी स्तर पर मानवीय भूल, रिकॉर्डिंग में त्रुटि या प्रक्रिया संबंधी लापरवाही गंभीर परिणाम पैदा कर सकती है। यही वजह है कि विशेषज्ञ लगातार डिजिटल ट्रैकिंग, बारकोड सिस्टम और डबल-वेरिफिकेशन जैसी तकनीकों को अपनाने पर जोर देते हैं ताकि ऐसी घटनाओं की संभावना को न्यूनतम किया जा सके।
भारत में तेजी से क्यों बढ़ रहा है IVF का चलन?
पिछले कुछ वर्षों में भारत में IVF उपचार की मांग तेजी से बढ़ी है। विशेषज्ञों के अनुसार बदलती जीवनशैली, देर से शादी, बढ़ता तनाव, प्रदूषण, खानपान की आदतों में बदलाव और बांझपन से जुड़ी समस्याओं में वृद्धि इसके प्रमुख कारण हैं। इसके अलावा जागरूकता बढ़ने और चिकित्सा तकनीक में सुधार के कारण भी अधिक दंपति IVF को एक प्रभावी विकल्प के रूप में स्वीकार कर रहे हैं। पहले जहां लोग सामाजिक झिझक या जानकारी के अभाव में ऐसे उपचार से दूर रहते थे, वहीं अब बड़े शहरों के साथ-साथ छोटे शहरों में भी IVF केंद्रों की संख्या बढ़ रही है।
IVF से जुड़े नियम और सुरक्षा व्यवस्था कितनी मजबूत?
भारत में IVF और अन्य सहायक प्रजनन तकनीकों को नियंत्रित करने के लिए सरकार ने ART और IVF क्लीनिकों के लिए कई नियम लागू किए हैं। इन नियमों के तहत क्लीनिकों का पंजीकरण, रिकॉर्ड का रखरखाव, मरीजों की गोपनीयता और गुणवत्ता मानकों का पालन अनिवार्य किया गया है। विशेषज्ञों का मानना है कि तकनीक जितनी उन्नत होती जा रही है, उतनी ही मजबूत निगरानी व्यवस्था की आवश्यकता भी बढ़ रही है। मरीजों को भी उपचार से पहले क्लीनिक की विश्वसनीयता, विशेषज्ञों के अनुभव और सुरक्षा प्रोटोकॉल की जानकारी अवश्य लेनी चाहिए, ताकि उपचार पूरी तरह सुरक्षित और पारदर्शी तरीके से हो सके।
IVF तकनीक ने लाखों निःसंतान दंपतियों को माता-पिता बनने का अवसर दिया है, लेकिन हाल के विवादों ने यह भी दिखाया है कि इस संवेदनशील प्रक्रिया में उच्चतम स्तर की सुरक्षा और जवाबदेही कितनी जरूरी है। आधुनिक विज्ञान की यह उपलब्धि तभी पूरी तरह भरोसेमंद बन सकती है जब तकनीकी दक्षता के साथ-साथ पारदर्शिता और सख्त निगरानी भी सुनिश्चित की जाए।
