erer | Source: ererनई दिल्ली। भारत और रूस के ऊर्जा कारोबार को लेकर अमेरिका में बड़ा घटनाक्रम सामने आया है। अमेरिकी प्रतिनिधि सभा ने ऐसे विधेयक को आगे बढ़ाने के पक्ष में मतदान किया है, जिसमें रूस से तेल और गैस खरीदने वाले देशों पर 100 प्रतिशत तक टैरिफ लगाने का अधिकार अमेरिकी राष्ट्रपति को दिए जाने का प्रावधान है। भारत भी इस प्रस्ताव के दायरे में आ सकता है। हालांकि, अभी यह कहना जल्दबाजी होगी कि भारत पर वास्तव में 100 प्रतिशत टैरिफ लगाया जाएगा, क्योंकि विधेयक को अमेरिकी संसद की आगे की प्रक्रिया से गुजरना है और इसके बाद ही राष्ट्रपति के स्तर पर कोई फैसला होगा।

214-211 के वोट से आगे बढ़ा विधेयक

‘लिंडसे ओ. ग्राहम सैंक्शनिंग रूस एंड ईरान एक्ट ऑफ 2026’ से जुड़े प्रस्ताव को अमेरिकी प्रतिनिधि सभा में 214-211 के अंतर से आगे बढ़ाया गया। इससे विधेयक को अंतिम मतदान की दिशा में बढ़ने का रास्ता मिला है। इससे पहले अमेरिकी सीनेट इस विधेयक को 86-11 के वोट से पारित कर चुकी है।

इस विधेयक का अगला महत्वपूर्ण चरण प्रतिनिधि सभा में अंतिम मतदान है। इसके बाद ही यह राष्ट्रपति के हस्ताक्षर के लिए आगे बढ़ सकता है। इसलिए फिलहाल भारत पर 100 प्रतिशत टैरिफ लागू नहीं हुआ है।

भारत का नाम भी प्रस्तावित सूची में

इस मामले में भारत के लिए सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि प्रतिनिधि सभा में पेश एक संशोधन में भारत समेत 10 देशों को उन देशों की सूची में रखने का प्रस्ताव दिया गया है, जिन पर रूस से कच्चा तेल या प्राकृतिक गैस खरीदने की स्थिति में 100 प्रतिशत तक शुल्क लगाया जा सकता है।

प्रस्तावित सूची में भारत के अलावा चीन, तुर्किये, अजरबैजान, हंगरी, स्लोवाकिया, संयुक्त अरब अमीरात, सिंगापुर, कजाखस्तान और किर्गिज गणराज्य के नाम शामिल हैं। हालांकि अमेरिकी प्रतिनिधि सभा की नियम समिति के दस्तावेज के अनुसार यह संशोधन विचार के लिए प्रस्तुत हुआ था और उसे आगे बढ़ाने का प्रयास समिति स्तर पर खारिज किया गया।

अमेरिका का असली निशाना रूस की ऊर्जा कमाई

विधेयक के पीछे मुख्य उद्देश्य रूस के ऊर्जा क्षेत्र पर आर्थिक दबाव बढ़ाना है। प्रस्ताव में रूस के नेताओं और ऊर्जा क्षेत्र से जुड़े लोगों पर प्रतिबंधों के साथ उन जहाजों के खिलाफ भी कार्रवाई का प्रावधान है, जिन्हें प्रतिबंधों से बचकर रूसी तेल पहुंचाने वाले ‘शैडो फ्लीट’ का हिस्सा माना जाता है।

अमेरिकी सांसदों के बीच इस बात को लेकर मतभेद भी हैं कि राष्ट्रपति को दूसरे देशों पर इतना ऊंचा टैरिफ लगाने का अधिकार दिया जाना चाहिए या नहीं। कुछ सांसदों ने टैरिफ संबंधी प्रावधान हटाने अथवा राष्ट्रपति के अधिकारों को सीमित करने के लिए संशोधन पेश किए हैं।

भारत के लिए क्यों महत्वपूर्ण है यह घटनाक्रम?

भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए बड़े पैमाने पर कच्चे तेल का आयात करता है और पिछले वर्षों में रूस भारतीय रिफाइनरियों के लिए महत्वपूर्ण आपूर्तिकर्ता बना है। ऐसे में यदि भविष्य में अमेरिकी कानून के तहत भारत पर अतिरिक्त टैरिफ लगाया जाता है, तो इसका असर भारत-अमेरिका व्यापार और रूसी ऊर्जा से जुड़े कारोबार पर पड़ सकता है। हालांकि वास्तविक प्रभाव इस बात पर निर्भर करेगा कि कानून का अंतिम स्वरूप क्या रहता है और अमेरिकी प्रशासन इसका इस्तेमाल किस तरह करता है।

भारत के अमेरिकी निर्यात पर भी पड़ सकता है असर

टैरिफ का मामला केवल रूसी तेल की खरीद तक सीमित नहीं है। यदि भारत पर अमेरिकी व्यापार शुल्क बढ़ता है, तो अमेरिका को निर्यात करने वाले भारतीय क्षेत्रों पर भी दबाव बढ़ सकता है। इलेक्ट्रॉनिक्स, स्मार्टफोन, फार्मास्यूटिकल्स, कपड़ा, परिधान, रत्न-आभूषण और ऑटोमोबाइल पार्ट्स जैसे क्षेत्रों के लिए अमेरिकी बाजार महत्वपूर्ण है।

फिलहाल सबसे बड़ा सवाल यह है कि प्रतिनिधि सभा में अंतिम मतदान के बाद विधेयक किस रूप में आगे बढ़ता है और क्या 100 प्रतिशत तक टैरिफ वाला प्रावधान अंतिम कानून का हिस्सा रहता है। इसके बाद ही भारत पर संभावित अमेरिकी कार्रवाई की वास्तविक तस्वीर स्पष्ट होगी।