erer | Source: ereनई दिल्ली। भारत अब उस वैज्ञानिक तकनीक को विकसित करने की दिशा में तेजी से आगे बढ़ रहा है, जिससे भविष्य में सूरज जैसी प्रक्रिया के जरिए ऊर्जा पैदा करने की उम्मीद है। गुजरात स्थित इंस्टीट्यूट फॉर प्लाज्मा रिसर्च की प्रयोगशाला में भारतीय वैज्ञानिक नाभिकीय संलयन यानी फ्यूजन की प्रक्रिया को नियंत्रित करने पर काम कर रहे हैं। इसी क्रम में SST-1 टोकामाक में प्लाज्मा को लंबे समय तक बेहद ऊंचे तापमान पर बनाए रखने की चुनौती से निपटने की दिशा में महत्वपूर्ण प्रगति हुई है।

सूरज जैसी ऊर्जा पैदा करने की कोशिश क्यों हो रही है?

सूरज के भीतर लगातार नाभिकीय संलयन की प्रक्रिया चलती रहती है। इसी प्रक्रिया से सूरज को उसकी विशाल ऊर्जा मिलती है। वैज्ञानिक लंबे समय से इसी सिद्धांत को धरती पर नियंत्रित तरीके से दोहराने की कोशिश कर रहे हैं, ताकि भविष्य में बड़ी मात्रा में ऊर्जा पैदा की जा सके।

नाभिकीय संलयन में हल्के परमाणुओं के नाभिकों को अत्यधिक तापमान और दबाव जैसी परिस्थितियों में आपस में जोड़ा जाता है। इस प्रक्रिया के दौरान ऊर्जा निकलती है। लेकिन धरती पर सूरज जैसी परिस्थितियां तैयार करना बेहद कठिन है। खास चुनौती यह है कि अत्यधिक गर्म प्लाज्मा को नियंत्रित रखते हुए लंबे समय तक स्थिर बनाया जाए।

गुजरात की प्रयोगशाला में भारतीय वैज्ञानिकों की बड़ी प्रगति

इंडिया टुडे की रिपोर्ट के मुताबिक, गुजरात स्थित इंस्टीट्यूट फॉर प्लाज्मा रिसर्च के वैज्ञानिकों ने इस दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम उठाया है। वैज्ञानिकों ने SST-1 टोकामाक मशीन में 82.6 गीगाहर्ट्ज का शक्तिशाली जाइरोट्रॉन उपकरण चालू किया है।

यह उपकरण उच्च आवृत्ति वाली माइक्रोवेव ऊर्जा पैदा करता है। इस ऊर्जा की मदद से टोकामाक के अंदर मौजूद प्लाज्मा को बहुत अधिक तापमान पर गर्म रखने में सहायता मिलती है। प्लाज्मा को लंबे समय तक गर्म और नियंत्रित रखना संलयन अनुसंधान की सबसे महत्वपूर्ण चुनौतियों में से एक है।

क्या है SST-1 टोकामाक?

SST-1 यानी स्टेडी स्टेट सुपरकंडक्टिंग टोकामाक भारत की महत्वपूर्ण संलयन अनुसंधान मशीन है। इसे टोकामाक तकनीक के आधार पर विकसित किया गया है। इसका मुख्य उद्देश्य बेहद गर्म प्लाज्मा को शक्तिशाली चुंबकीय क्षेत्र की मदद से नियंत्रित करना और उसे निर्धारित परिस्थितियों में बनाए रखना है।

टोकामाक का आकार सामान्य तौर पर डोनट जैसा होता है। इसके भीतर पैदा होने वाले प्लाज्मा को चुंबकीय क्षेत्र की मदद से सीमित रखा जाता है, ताकि वह सीधे मशीन की दीवारों से न टकराए। संलयन ऊर्जा अनुसंधान में यह तकनीक दुनिया भर में महत्वपूर्ण मानी जाती है।

प्लाज्मा आखिर क्या होता है?

प्लाज्मा पदार्थ की चौथी अवस्था है। सामान्य तौर पर पदार्थ की तीन अवस्थाएं ठोस, द्रव और गैस मानी जाती हैं। अत्यधिक तापमान की स्थिति में पदार्थ प्लाज्मा अवस्था में पहुंच सकता है।

इस अवस्था में परमाणुओं के इलेक्ट्रॉन अलग होने लगते हैं और पदार्थ विद्युत आवेशित कणों से बना अत्यधिक गर्म माध्यम बन जाता है। संलयन अनुसंधान में वैज्ञानिक इसी अत्यधिक गर्म प्लाज्मा को नियंत्रित करने की कोशिश करते हैं।

प्लाज्मा को नियंत्रित करना इतनी बड़ी चुनौती क्यों है?

नाभिकीय संलयन के लिए प्लाज्मा को अत्यधिक ऊंचे तापमान तक गर्म करना पड़ता है। इतनी गर्म अवस्था में मौजूद प्लाज्मा को यदि सीधे रिएक्टर की सतह से संपर्क हो जाए, तो मशीन को नुकसान पहुंच सकता है। इसलिए इसे रिएक्टर की दीवारों से दूर रखते हुए नियंत्रित करना आवश्यक होता है।

इसी वजह से टोकामाक मशीन में शक्तिशाली चुंबकीय क्षेत्रों का इस्तेमाल किया जाता है। चुंबकीय क्षेत्र प्लाज्मा को सीमित रखने और उसे निर्धारित क्षेत्र में नियंत्रित करने में मदद करता है। लेकिन केवल प्लाज्मा पैदा कर लेना पर्याप्त नहीं है। उसे लंबे समय तक स्थिर बनाए रखना भी उतना ही महत्वपूर्ण है।

जाइरोट्रॉन की भूमिका ने क्यों बढ़ाई उम्मीद?

SST-1 में इस्तेमाल किया जा रहा 82.6 गीगाहर्ट्ज जाइरोट्रॉन उच्च आवृत्ति वाली माइक्रोवेव ऊर्जा पैदा करता है। इस ऊर्जा को प्लाज्मा तक पहुंचाया जाता है, जिससे उसे आवश्यक अत्यधिक तापमान तक गर्म करने और गर्म बनाए रखने में मदद मिलती है।

प्लाज्मा को लंबे समय तक गर्म रखने की क्षमता संलयन अनुसंधान के लिए बेहद महत्वपूर्ण है। यदि प्लाज्मा को पर्याप्त समय तक नियंत्रित और गर्म रखा जा सके, तो वैज्ञानिक संलयन प्रक्रिया को अधिक प्रभावी तरीके से समझने और विकसित करने की दिशा में आगे बढ़ सकते हैं।

भारत सूरज के केंद्र से 20 गुना ज्यादा गर्म प्लाज्मा बना चुका है

भारत के वैज्ञानिक संलयन अनुसंधान में पहले ही 200 मिलियन डिग्री सेल्सियस से अधिक तापमान वाला प्लाज्मा हासिल कर चुके हैं। यह तापमान सूरज के केंद्र के तापमान से लगभग 20 गुना अधिक है।

हालांकि, केवल इतना अधिक तापमान हासिल कर लेना संलयन ऊर्जा के व्यावहारिक इस्तेमाल के लिए पर्याप्त नहीं है। असली चुनौती ऐसे अत्यधिक गर्म प्लाज्मा को स्थिर और सीमित रखते हुए लंबे समय तक बनाए रखना है। इसके बाद ही संलयन से पैदा होने वाली ऊर्जा को उपयोगी ऊर्जा में बदलने की दिशा में आगे बढ़ा जा सकता है।

भारत की कोशिश का अंतिम लक्ष्य क्या है?

नाभिकीय संलयन अनुसंधान का उद्देश्य सूरज की तरह होने वाली ऊर्जा पैदा करने की प्रक्रिया को धरती पर नियंत्रित रूप में दोहराना है। इसके लिए हल्के परमाणु नाभिकों को आपस में जोड़कर ऊर्जा हासिल करने की कोशिश की जाती है।

यदि वैज्ञानिक इस प्रक्रिया को स्थिर, नियंत्रित और लंबे समय तक चलाने में सफल होते हैं, तो भविष्य में संलयन ऊर्जा ऊर्जा उत्पादन का एक महत्वपूर्ण स्रोत बन सकती है। फिलहाल दुनिया भर में वैज्ञानिक इस तकनीक से जुड़ी विभिन्न चुनौतियों को हल करने पर काम कर रहे हैं।

चीन की उपलब्धि के बीच भारत की प्रगति भी महत्वपूर्ण

हाल ही में चीन को लेकर भी कृत्रिम सूरज से जुड़ी एक बड़ी वैज्ञानिक उपलब्धि की खबर सामने आई थी। चीन ने कृत्रिम सूरज से संबंधित अपने अनुसंधान के लिए दुनिया का सबसे बड़ा सुपरकंडक्टिंग चुंबक तैयार करने की जानकारी दी थी।

इसी वैश्विक वैज्ञानिक प्रयास के बीच भारत भी अपने संलयन अनुसंधान कार्यक्रम को आगे बढ़ा रहा है। गुजरात में SST-1 टोकामाक के जरिए प्लाज्मा को नियंत्रित और लंबे समय तक गर्म रखने की दिशा में हो रही प्रगति भारत की वैज्ञानिक क्षमता के लिए महत्वपूर्ण है।

क्या सच में धरती पर बन सकता है ‘कृत्रिम सूरज’?

‘कृत्रिम सूरज’ शब्द वैज्ञानिक रूप से किसी वास्तविक सूरज के निर्माण के अर्थ में इस्तेमाल नहीं होता। इसका इस्तेमाल आम तौर पर उन संलयन प्रयोगों के लिए किया जाता है, जिनमें सूरज के भीतर होने वाली नाभिकीय संलयन प्रक्रिया को धरती पर नियंत्रित परिस्थितियों में दोहराने की कोशिश की जाती है।

भारत का SST-1 भी इसी दिशा में अनुसंधान का हिस्सा है। यहां वैज्ञानिकों का लक्ष्य अत्यधिक गर्म प्लाज्मा को चुंबकीय क्षेत्र के भीतर नियंत्रित रखना और संलयन प्रक्रिया के लिए आवश्यक परिस्थितियों को बेहतर तरीके से समझना है।

संलयन ऊर्जा के रास्ते में अभी कई चुनौतियां

नाभिकीय संलयन को व्यावहारिक ऊर्जा स्रोत बनाने के रास्ते में अभी कई वैज्ञानिक और तकनीकी चुनौतियां मौजूद हैं। अत्यधिक तापमान वाले प्लाज्मा को स्थिर रखना, उसे मशीन की दीवारों से संपर्क में आने से रोकना और लंबे समय तक नियंत्रित परिस्थितियों में बनाए रखना इनमें प्रमुख हैं।

भारतीय वैज्ञानिकों की मौजूदा प्रगति इसी चुनौती को हल करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण प्रयास है। SST-1 में जाइरोट्रॉन के जरिए प्लाज्मा को लंबे समय तक उच्च तापमान पर बनाए रखने की क्षमता विकसित करना इस अनुसंधान को आगे बढ़ाने में मदद कर सकता है।