नई दिल्ली। लंबे समय से नरेंद्र मोदी सरकार की नीतियों और विदेश नीति पर सवाल उठाते रहे पूर्व केंद्रीय मंत्री यशवंत सिन्हा ने अब केंद्र सरकार के नेतृत्व में आयोजित ब्रिक्स सम्मेलन की खुलकर तारीफ की है। सिन्हा ने दिल्ली में हुए सम्मेलन को कई मायनों में सफल बताया और कहा कि भारत ने अंतरराष्ट्रीय मंच पर अपनी स्थिति मजबूती से रखी। खास तौर पर चीन के साथ हुई बातचीत का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा कि भारत ने अपने मुद्दों को मजबूती से उठाया।
कभी मोदी सरकार के मुखर आलोचक रहे यशवंत सिन्हा ने आखिर क्यों बदला अपना सुर?
यशवंत सिन्हा लंबे समय तक मोदी सरकार के मुखर आलोचकों में रहे हैं। उन्होंने वर्ष 2018 में भाजपा से अलग होने का फैसला किया था। इसके बाद वह तृणमूल कांग्रेस से जुड़े, लेकिन बाद में विपक्षी एकता के लिए काम करने की बात कहते हुए वहां से भी अलग हो गए। वर्ष 2022 के राष्ट्रपति चुनाव में विपक्ष ने उन्हें अपना उम्मीदवार बनाया था, हालांकि वह चुनाव जीत नहीं सके। इससे पहले वह अटल बिहारी वाजपेयी सरकार में वित्त और विदेश जैसे महत्वपूर्ण मंत्रालय संभाल चुके हैं।
ब्रिक्स सम्मेलन की सफलता के सिन्हा ने गिनाए तीन बड़े कारण
न्यूज एजेंसी एएनआई से बातचीत में सिन्हा ने ब्रिक्स सम्मेलन को सफल बताते हुए इसके पीछे कई कारण बताए। उन्होंने कहा कि सम्मेलन में आमंत्रित सभी प्रमुख राष्ट्राध्यक्ष पहुंचे। रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन और चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग की मौजूदगी को उन्होंने महत्वपूर्ण उपलब्धि माना। उनके मुताबिक, खासतौर पर जिनपिंग के आने को लेकर पहले से कई तरह की आशंकाएं जताई जा रही थीं।
सिन्हा ने सम्मेलन के बाद साझा घोषणापत्र जारी होने को भी बड़ी सफलता बताया। उन्होंने कहा कि इससे पहले विदेश मंत्रियों की बैठक के दौरान मतभेदों के कारण साझा बयान जारी नहीं हो सका था, लेकिन इस बार सदस्य देशों के बीच सहमति बनाने में सफलता मिली। इसके अलावा अलग-अलग देशों के साथ हुई द्विपक्षीय बैठकों को भी उन्होंने सम्मेलन की अहम उपलब्धि बताया।
ईरान को लेकर भारत के रुख की भी की तारीफ, फिलिस्तीन पर भी बोले
पूर्व विदेश मंत्री ने ब्रिक्स सम्मेलन में ईरान की भागीदारी और भारत के रुख को भी सकारात्मक बताया। उन्होंने कहा कि सम्मेलन के दौरान ईरान के राष्ट्रपति की मौजूदगी महत्वपूर्ण रही। सिन्हा के अनुसार, हाल के वर्षों में ईरान को लेकर भारत की स्थिति में बदलाव दिखाई दिया था, लेकिन ब्रिक्स सम्मेलन में भारत अपने पुराने रुख के करीब लौटता नजर आया।
उन्होंने फिलिस्तीन और इजरायल के मुद्दे का भी उल्लेख किया। सिन्हा ने कहा कि गाजा और लेबनान में इजरायल की कार्रवाई की आलोचना किया जाना संतोष की बात है। उनके मुताबिक, भारत की पारंपरिक विदेश नीति में फिलिस्तीन को लेकर जिस संतुलित रुख की बात होती रही है, सम्मेलन में उसका प्रभाव फिर दिखाई दिया।
चीन के सामने भारत ने मजबूती से रखे मुद्दे, जिनपिंग के नाराज होने का भी किया दावा
यशवंत सिन्हा ने चीन के साथ हुई द्विपक्षीय बैठक को सम्मेलन की सबसे महत्वपूर्ण बैठकों में से एक बताया। उन्होंने कहा कि भारत को चीन पर पूरी तरह भरोसा नहीं करना चाहिए, क्योंकि दोनों देशों के बीच लंबे समय से कई विवाद और मतभेद रहे हैं। हालांकि बातचीत जारी रखना जरूरी है।
सिन्हा के मुताबिक, बैठक के दौरान भारत ने अपने मुद्दों को मजबूती से उठाया और चीन की चिंताओं को भी सामने रखा गया। उन्होंने दावा किया कि बातचीत के दौरान दोनों पक्षों के बीच तल्खी की स्थिति बनी होगी। इसी संदर्भ में उन्होंने उन खबरों का जिक्र किया, जिनमें दावा किया गया कि चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग रात्रिभोज में शामिल नहीं हुए क्योंकि वह भारत के रुख से खुश नहीं थे।
‘गिलास आधा भरा है या आधा खाली’, सिन्हा ने भारत की भूमिका पर दिया बड़ा बयान
यशवंत सिन्हा ने ब्रिक्स सम्मेलन के आकलन को लेकर कहा कि किसी भी अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन को केवल कमियों या उपलब्धियों के आधार पर नहीं देखना चाहिए। उनके अनुसार, कोई व्यक्ति इसे आधा भरा या आधा खाली बता सकता है, लेकिन पूरे संदर्भ में देखें तो भारत ने सम्मेलन की अध्यक्षता और अपनी कूटनीतिक भूमिका को काफी प्रभावी ढंग से निभाया।
उन्होंने कहा कि जिन मुद्दों को लेकर पहले आशंकाएं थीं, भारत ने उन्हें ऐसी भाषा और सहमति के साथ सामने रखा जिसे सदस्य देशों ने स्वीकार किया। लंबे समय से मोदी सरकार की आलोचना करने वाले सिन्हा की ओर से आई यह सकारात्मक टिप्पणी इसलिए भी चर्चा में है, क्योंकि उन्होंने सरकार की विदेश नीति से जुड़े कुछ अहम फैसलों की इस बार खुलकर सराहना की है।
