-असगर अली अंसारी-
1. मस्जिद में बराबरी, मस्जिद के बाहर ऊँच-नीच
भारत में इस्लाम - नाम का इस्लाम, रस्मों का इस्लामSource : Google.
यह दलील अक्सर दी जाती है कि इस्लाम में बराबरी है, देखो एक ही मस्जिद में अमीर-गरीब, मालिक-मजदूर एक साथ सजदा करते हैं। यह बात सफ तक तो सच है, लेकिन मस्जिद से बाहर कदम रखते ही यह बराबरी खत्म हो जाती है।
एक ही मोहल्ले में सैयद की मस्जिद, अंसारी की मस्जिद, कुरैशी की मस्जिद अलग-अलग क्यों होने लगी? निकाह के लिए लड़का सैयद है तो लड़की भी सैयद ही चाहिए, भले लड़का कम पढ़ा-लिखा हो और अंसारी बिरादरी का लड़का हाफिज-आलिम हो। गरीब-अमीर एक साथ नमाज तो पढ़ लेंगे, लेकिन गरीब की बेटी की शादी अमीर और ऊँची बिरादरी वाले के घर नहीं होगी।
यानी बराबरी सिर्फ इबादत के 10 मिनट तक है, जिंदगी के 24 घंटे में नहीं। इसीलिए कहा जाता है कि भारत में इस्लाम अब सिर्फ नाम का रह गया है, उसके मूलभूत सिद्धांत - बराबरी, सादगी, दिखावे से दूरी - इन सबसे वह काफी दूर जा चुका है।
2. जो हिंदू में वर्ण है, वही मुसलमान में बिरादरी
इस्लाम साफ कहता है - किसी अरबी को अजमी पर, किसी गोरे को काले पर कोई बड़ाई नहीं। लेकिन भारत में हमने हिंदू वर्ण व्यवस्था को हू-ब-हू नकल कर लिया, बस नाम बदल दिया।
ब्राह्मण की जगह सैयद, शेख ने ले ली - जो जन्म से ही ऊँचे माने जाते हैं।
वैश्य और शूद्र की जगह जुलाहा, अंसारी, कुरैशी, बढ़ई, लोहार, धोबी, नाई जैसी पेशेवर बिरादरियां आ गईं।
हिंदू में जैसे अपनी ही जाति में शादी होती है, वैसे ही मुसलमान में भी अपनी ही बिरादरी में शादी को इज्जत का सवाल बना दिया गया। दूसरी बिरादरी में शादी करने पर पूरे खानदान का हुक्का-पानी बंद। यह इस्लाम नहीं, यह भारत की जाति व्यवस्था है जो इस्लाम के लबादे में चल रही है।
3. वोट की राजनीति और बिरादरी का खेल
इस बिरादरीवाद का सबसे गंदा रूप आज की राजनीति में दिखता है।
चुनाव आते ही नेता टोपी पहन कर मस्जिद नहीं जाता, वह बिरादरी के चौधरी के घर जाता है।
पश्चिमी यूपी में - अंसारी वोट किधर जाएगा?
पूर्वांचल में - राजभर और अंसारी का गठजोड़ होगा कि नहीं?
बिहार में - पसमांदा मुसलमान, जो 80% से ज्यादा हैं, उनको अशराफ मुसलमानों ने आज तक कितना हक दिया?
टिकट बंटवारे में भी यही होता है। सैयद-पठान बहुल इलाके में पसमांदा को टिकट नहीं मिलेगा। मुस्लिम वोट बैंक जैसा कोई एक वोट बैंक है ही नहीं। वोट बैंक बिरादरी के हिसाब से बंटा हुआ है - कुरैशी वोट, मंसूरी वोट, अंसारी वोट। नेता भी इसी को भुनाते हैं।
जब वोट बिरादरी देख कर दिया जाएगा, तो कौम के नाम पर इंसाफ की बात कैसे होगी? यहीं पर इस्लाम का बुनियादी उसूल - एक उम्मत, एक बिरादरी - टूट जाता है।
4. लोक-इस्लाम - हिंदुस्तानी रस्मों का जोड़ा
जैसा पहले कहा, ताजिये का चौक सजाना और उस पर नियाज रखना, मजार पर अगरबत्ती-चादर, मनोकामना का धागा बांधना, शादी में हल्दी, मेहंदी, भात, बारात, दहेज में मोटरसाइकिल और नकद - ये सब अरब के इस्लाम में नहीं हैं। ये सब यहीं की मिट्टी से लिए गए हैं।
इस्लाम ने कहा - निकाह को आसान करो, दहेज हराम है। हमने कहा - नहीं, दहेज के बिना तो नाक कट जाएगी, जैसे पड़ोसी हिंदू भाई के यहाँ होता है वैसा ही करना है।
आखिरी बात -
इसलिए आज भारत का मुसलमान एक अजीब दोराहे पर खड़ा है। किताब में वह एक अल्लाह को मानने वाला, बराबरी पसंद मुसलमान है, लेकिन अमल में वह बिरादरी, ऊँच-नीच, दिखावे और लोक-रस्मों में जकड़ा हुआ हिंदुस्तानी है।
मस्जिद की चारदीवारी में वह इस्लाम जिंदा है, लेकिन मस्जिद से निकलते ही जो इस्लाम सड़कों पर, शादियों में, पंचायतों में और वोट की गिनती में दिखता है, वह अपने असल रूप को खो चुका है।
