महाराष्ट्र की राजनीति में एक बार फिर शिवसेना परिवार के भीतर नए घटनाक्रमों ने हलचल बढ़ा दी है। चार साल पहले एकनाथ शिंदे की बगावत से उद्धव ठाकरे को सबसे बड़ा राजनीतिक झटका लगा था, जिसके बाद पार्टी दो हिस्सों में बंट गई थी। अब लोकसभा चुनाव और विधानसभा चुनावों के बाद एक बार फिर शिवसेना (उद्धव बालासाहेब ठाकरे) के भीतर असंतोष और संभावित टूट की चर्चाएं तेज हो गई हैं। इसकी वजह बनी ‘मातोश्री’ में बुलाई गई उद्धव ठाकरे की अहम बैठक, जिसमें पार्टी के 9 सांसदों में से केवल 4 ही शामिल हुए। पांच सांसदों की गैरमौजूदगी ने राजनीतिक गलियारों में यह सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या शिवसेना (यूबीटी) एक और बड़े संकट की ओर बढ़ रही है।
क्या फिर टूटेगी शिवसेना? उद्धव के सामने नया सियासी संकट | फोटो: TIMES NOW NAVBHARAT
मातोश्री की बैठक ने क्यों बढ़ाई अटकलें?
रविवार को उद्धव ठाकरे ने अपने लोकसभा सांसदों की बैठक बुलाई थी। यह बैठक ऐसे समय हुई जब महाराष्ट्र की राजनीति में लगातार नए समीकरण बनते और बिगड़ते दिखाई दे रहे हैं। लेकिन बैठक में आधे से ज्यादा सांसदों का अनुपस्थित रहना पार्टी नेतृत्व के लिए चिंता का विषय बन गया। जिन सांसदों ने बैठक में हिस्सा नहीं लिया, उनमें संजय जाधव, संजय देशमुख, ओमराजे निंबालकर, भाऊसाहेब वाकचौरे और नागेश पाटिल अष्टिकर शामिल बताए जा रहे हैं।हालांकि पार्टी की ओर से कहा गया कि कुछ सांसद वर्चुअल माध्यम से जुड़े थे, लेकिन राजनीतिक पर्यवेक्षक इसे केवल तकनीकी अनुपस्थिति नहीं मान रहे। खासकर तब, जब अनुपस्थित सांसदों में से कुछ नेताओं के शिंदे खेमे के नेताओं के संपर्क में होने की खबरें भी सामने आईं। यही वजह है कि ‘ऑपरेशन टाइगर’ जैसी चर्चाएं फिर से सुर्खियों में आ गई हैं।
संजय देशमुख की मुलाकात ने बढ़ाए सवाल
इस पूरे घटनाक्रम में सबसे ज्यादा चर्चा सांसद संजय देशमुख को लेकर हो रही है। जिस दिन उद्धव ठाकरे अपने सांसदों के साथ बैठक कर रहे थे, उसी दिन संजय देशमुख की मुलाकात केंद्र सरकार में मंत्री और शिंदे गुट के वरिष्ठ नेता प्रतापराव जाधव से हुई। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि सामान्य राजनीतिक मुलाकातें भले नई बात न हों, लेकिन ऐसे संवेदनशील समय में हुई यह मुलाकात कई संकेत छोड़ गई है। प्रतापराव जाधव ने भी सार्वजनिक रूप से कहा कि शिवसेना (यूबीटी) के कई सांसद पार्टी नेतृत्व से नाराज हैं और उनके संपर्क में हैं। उनके इस बयान ने अटकलों को और बल दिया। हालांकि अभी तक किसी सांसद ने खुलकर पार्टी छोड़ने की बात नहीं कही है, लेकिन लगातार बढ़ती दूरी को नजरअंदाज करना भी आसान नहीं है।
उद्धव ठाकरे का संदेश: ‘जिसे जाना है, वह जा सकता है’
इस पूरे घटनाक्रम के बीच उद्धव ठाकरे का बयान भी बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा कि यदि कोई नेता जाना चाहता है तो उसे रोका नहीं जाएगा। उन्होंने याद दिलाया कि 2022 में जब एकनाथ शिंदे के नेतृत्व में बड़ी बगावत हुई थी, तब भी उन्हें हालात की जानकारी थी, लेकिन उन्होंने किसी पर दबाव नहीं डाला। उद्धव ने कहा कि राजनीति में संघर्ष का दौर हमेशा नहीं रहता। आज परिस्थितियां अलग हो सकती हैं, लेकिन कल समय बदल भी सकता है। उनका यह बयान एक तरफ आत्मविश्वास दिखाता है तो दूसरी तरफ यह संकेत भी देता है कि पार्टी नेतृत्व अब किसी भी संभावित राजनीतिक घटनाक्रम के लिए मानसिक रूप से तैयार है। शिवसेना (यूबीटी) के भीतर इसे एक भावनात्मक संदेश के रूप में भी देखा जा रहा है, जिसमें उद्धव अपने नेताओं को निष्ठा और धैर्य का महत्व समझाने की कोशिश कर रहे हैं।
2022 की बगावत की यादें फिर हुईं ताजा
महाराष्ट्र की राजनीति में शिवसेना की पिछली बड़ी टूट अभी भी एक ताजा राजनीतिक स्मृति है। 2022 में एकनाथ शिंदे के नेतृत्व में 40 से अधिक विधायक अलग हो गए थे, जिसके बाद उद्धव ठाकरे की सरकार गिर गई और महाराष्ट्र की राजनीति का पूरा समीकरण बदल गया। उस बगावत ने केवल सत्ता ही नहीं छीनी, बल्कि शिवसेना के नाम, चुनाव चिन्ह और संगठनात्मक पहचान पर भी बड़ा असर डाला। इसी वजह से मौजूदा घटनाक्रम को केवल एक साधारण राजनीतिक असहमति नहीं माना जा रहा। पार्टी के भीतर कोई भी छोटी हलचल तुरंत बड़े राजनीतिक संकेत के रूप में देखी जा रही है। राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि यदि लोकसभा स्तर पर भी कोई बड़ा बदलाव होता है, तो उसका असर आगामी स्थानीय निकाय और विधानसभा राजनीति पर भी पड़ सकता है।
क्या सचमुच नई टूट की संभावना है?
फिलहाल शिवसेना (यूबीटी) के किसी सांसद ने आधिकारिक रूप से पार्टी छोड़ने का संकेत नहीं दिया है। लेकिन लगातार बढ़ती राजनीतिक गतिविधियां, शिंदे खेमे की ओर से दिए जा रहे बयान और महत्वपूर्ण बैठकों से सांसदों की दूरी यह जरूर दर्शाती है कि पार्टी के भीतर सब कुछ सामान्य नहीं है। दूसरी ओर, शिंदे गुट लगातार यह संदेश देने की कोशिश कर रहा है कि असली शिवसेना वही है और जो भी नेता बालासाहेब ठाकरे की विचारधारा के नाम पर राजनीति करना चाहते हैं, उनके लिए दरवाजे खुले हैं। ऐसे में आने वाले कुछ सप्ताह महाराष्ट्र की राजनीति के लिए बेहद महत्वपूर्ण साबित हो सकते हैं। नजर अब इस बात पर रहेगी कि अनुपस्थित सांसद अपने राजनीतिक रुख को लेकर क्या संकेत देते हैं और क्या उद्धव ठाकरे एक बार फिर संगठन को एकजुट रखने में सफल हो पाते हैं या नहीं।
