क्या आपके शरीर में भी प्लास्टिक पहुंच चुका है? यह सवाल सुनने में भले ही अजीब लगे, लेकिन वैज्ञानिकों की हालिया रिसर्च कुछ ऐसा ही संकेत दे रही हैं। जिस प्लास्टिक का इस्तेमाल हम रोज पानी पीने, खाना रखने और पैकेजिंग के लिए करते हैं, उसके बेहद छोटे कण अब इंसानी शरीर के भीतर भी पाए जा रहे हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि माइक्रोप्लास्टिक नाम के ये सूक्ष्म कण सिर्फ पर्यावरण ही नहीं, बल्कि इंसानी स्वास्थ्य और प्रजनन क्षमता के लिए भी खतरा बन सकते हैं। आइए जानते हैं कि माइक्रोप्लास्टिक को लेकर वैज्ञानिक क्यों चिंतित हैं और इसका शरीर पर क्या असर पड़ सकता है।

मानव स्वास्थ्य के लिए बढ़ता माइक्रोप्लास्टिक खतरा।Source : Straight Arrow news
इंसानी शरीर तक पहुंच चुके हैं माइक्रोप्लास्टिक
माइक्रोप्लास्टिक ऐसे छोटे प्लास्टिक कण होते हैं जिनका आकार पांच मिलीमीटर से भी कम होता है। समय के साथ बड़े प्लास्टिक उत्पाद टूटकर इन सूक्ष्म कणों में बदल जाते हैं। पहले इन्हें केवल पर्यावरण प्रदूषण की समस्या माना जाता था, लेकिन हाल के वर्षों में वैज्ञानिकों ने इन्हें इंसानी रक्त, फेफड़ों, प्लेसेंटा, स्पर्म और यहां तक कि महिलाओं के ओवरी में मौजूद फॉलिक्युलर फ्लूइड में भी पाया है। यही कारण है कि अब इनके स्वास्थ्य और फर्टिलिटी पर पड़ने वाले प्रभावों को लेकर रिसर्च तेज हो गई है।
क्या माइक्रोप्लास्टिक बन सकता है बांझपन का कारण?
साल 2024 में यूनिवर्सिटी ऑफ न्यू मैक्सिको के शोधकर्ताओं द्वारा प्रकाशित एक अध्ययन में मानव टेस्टिकुलर टिश्यू में माइक्रोप्लास्टिक कण पाए गए। वहीं कुछ अन्य अध्ययनों में महिलाओं के फॉलिक्युलर फ्लूइड में भी इनकी मौजूदगी दर्ज की गई है। हालांकि वैज्ञानिक अभी सीधे तौर पर यह नहीं कह रहे हैं कि माइक्रोप्लास्टिक ही बांझपन का कारण है, लेकिन इसके संभावित प्रभावों को लेकर चिंता लगातार बढ़ रही है और इस दिशा में व्यापक शोध किए जा रहे हैं।
शरीर और हार्मोन पर कैसे पड़ सकता है असर?
कोलकाता स्थित नोवा आईवीएफ की फर्टिलिटी विशेषज्ञ डॉ. अनिंदिता सिंह के अनुसार, रिसर्च बताती हैं कि माइक्रोप्लास्टिक शरीर में ऑक्सीडेटिव स्ट्रेस बढ़ा सकते हैं। इस स्थिति में रिएक्टिव ऑक्सीजन स्पीशीज नामक हानिकारक अणुओं की मात्रा बढ़ जाती है, जो कोशिकाओं को नुकसान पहुंचा सकते हैं। विशेषज्ञों के मुताबिक, माइक्रोप्लास्टिक माइटोकॉन्ड्रिया की कार्यप्रणाली को प्रभावित कर सकते हैं और एस्ट्रोजन व टेस्टोस्टेरोन जैसे हार्मोन के संतुलन में भी हस्तक्षेप कर सकते हैं। लंबे समय तक इनके संपर्क में रहने से पुरुषों में स्पर्म की गतिशीलता कम होने, डीएनए को नुकसान पहुंचने और फर्टिलिटी प्रभावित होने की आशंका जताई जा रही है। वहीं महिलाओं में ओवरी की क्षमता, अंडों की गुणवत्ता और फर्टिलाइजेशन प्रक्रिया पर भी इसका नकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है।
फर्टिलिटी ही नहीं, कई अन्य बीमारियों का भी खतरा
विशेषज्ञों का मानना है कि माइक्रोप्लास्टिक केवल प्रजनन क्षमता तक ही सीमित नहीं हैं, बल्कि इम्यून सिस्टम, हृदय स्वास्थ्य, मेटाबॉलिज्म और एंडोक्राइन सिस्टम के लिए भी संभावित खतरा पैदा कर सकते हैं। हालांकि इस विषय पर अभी और शोध की जरूरत है, लेकिन एहतियात बरतने की सलाह दी जा रही है। डॉ. अनिंदिता सिंह के अनुसार, प्लास्टिक की बोतलों की जगह कांच या स्टील के बर्तनों का इस्तेमाल करना, प्लास्टिक कंटेनरों में खाना गर्म करने से बचना, कम पैकेज्ड खाद्य पदार्थों का सेवन करना, फिल्टर किया हुआ पानी पीना और फल, सब्जियों व साबुत अनाज से भरपूर एंटी-इन्फ्लेमेटरी डाइट अपनाना माइक्रोप्लास्टिक के संपर्क को कम करने में मदद कर सकता है।
Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है। इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें। किसी भी स्वास्थ्य संबंधी समस्या, उपचार या नई गतिविधि को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें।
