तृणमूल कांग्रेस नेता ममता बनर्जी, पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी और विपक्ष के नेता ऋतब्रत बनर्जी. (Photo: PTI)तृणमूल कांग्रेस नेता ममता बनर्जी, पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी और विपक्ष के नेता ऋतब्रत बनर्जी. (Photo: PTI)

उमर फ़ारूक़:

कोलकाता: पश्चिम बंगाल की सुवेंदु अधिकारी सरकार के पहले बजट में मिड-डे मील योजना में बड़े बदलाव का ऐलान किया गया है। सरकार ने कोलकाता नगर निगम (KMC) क्षेत्र के स्कूलों में पायलट प्रोजेक्ट के तहत इस्कॉन (ISKCON) के माध्यम से शुद्ध शाकाहारी भोजन उपलब्ध कराने का फैसला किया है। इस नई व्यवस्था में मिड-डे मील से अंडे हटाए जाएंगे, जिसे लेकर राजनीतिक विवाद शुरू हो गया है।

हालांकि सरकार ने प्रति छात्र मिड-डे मील की सामग्री पर होने वाला खर्च *6.78 रुपये से बढ़ाकर 10 रुपये* कर दिया है। इस योजना को लागू करने में एक से दो महीने का समय लग सकता है, क्योंकि इस्कॉन को रसोई और अन्य आवश्यक व्यवस्थाएं तैयार करनी होंगी।

सरकार का पक्ष

मुख्यमंत्री सुवेंदु अधिकारी ने विधानसभा में कहा कि इस्कॉन को केवल भोजन बनाने की जिम्मेदारी दी गई है। उन्होंने कहा कि बच्चों को स्वच्छ और गुणवत्तापूर्ण भोजन मिलेगा, इसलिए चिंता की कोई बात नहीं है।

वहीं, स्कूल शिक्षा मंत्री दीपक बर्मन ने अंडे हटाने के फैसले का बचाव करते हुए कहा कि शाकाहारी भोजन भी बच्चों की पोषण संबंधी सभी जरूरतों को पूरा कर सकता है। उनके अनुसार, दुनिया भर में करोड़ों लोग पूरी तरह शाकाहारी भोजन पर स्वस्थ जीवन जीते हैं और यह मानना गलत है कि पोषण के लिए अंडा जरूरी है।

 विपक्ष का हमला

इस फैसले का दोनों टीएमसी गुटों ने विरोध किया है। विधानसभा में विपक्ष के नेता ऋतब्रत बनर्जी ने कहा कि बंगाल के बच्चों के भोजन में लंबे समय से पशु प्रोटीन शामिल रहा है। उन्होंने आरोप लगाया कि यदि इस्कॉन के जरिए मिड-डे मील तैयार होगा तो केवल अंडे ही नहीं, बल्कि मसूर दाल जैसी चीजें भी हट सकती हैं, जो बंगाल की खान-पान संस्कृति के खिलाफ है।

टीएमसी सांसद डेरेक ओ'ब्रायन ने भी सोशल मीडिया पर सरकार की आलोचना करते हुए कहा कि बच्चों को पोषण देने के बजाय उन पर शाकाहार थोपा जा रहा है। उन्होंने इसे बंगाल की खाद्य संस्कृति पर हमला बताया।

(ISKCON) इस्कॉन ने क्या कहा?

इस्कॉन के उपाध्यक्ष राधारमण दास ने कहा कि संगठन पिछले 20 से 22 वर्षों से देश के आठ राज्यों के 20 से अधिक शहरों में करीब 12 लाख छात्रों को मिड-डे मील उपलब्ध करा रहा है। उन्होंने कहा कि अंतिम मेन्यू अभी तय नहीं हुआ है और इसे पोषण विशेषज्ञों की सलाह से स्थानीय स्वाद को ध्यान में रखकर तैयार किया जाएगा।

उन्होंने बताया कि भोजन में चावल, दाल, खिचड़ी, सब्जी, सोया चंक्स और राजमा जैसे प्रोटीनयुक्त खाद्य पदार्थ शामिल किए जा सकते हैं। उनका कहना है कि यह कहना गलत है कि केवल अंडे या मांस से ही पर्याप्त पोषण मिलता है।

 शिक्षकों की चिंता

कई शिक्षकों और स्कूल प्रमुखों ने इस फैसले पर चिंता जताई है। महेशतला के नेताजी सुभाष प्राइमरी स्कूल के प्रधानाध्यापक देबब्रत पांती ने कहा कि अंडा बच्चों का सबसे पसंदीदा भोजन था और जिस दिन अंडा मिलता था, उस दिन स्कूल में छात्रों की उपस्थिति भी अधिक रहती थी।

एक सरकारी स्कूल के शिक्षक ने नाम न छापने की शर्त पर कहा कि यह फैसला केवल भोजन बदलने का नहीं, बल्कि खान-पान की आदतें बदलने की कोशिश जैसा लगता है। उनका कहना है कि कई बच्चों के लिए पनीर, राजमा और छोले जैसे व्यंजन सामान्य भोजन का हिस्सा नहीं हैं और इससे अभिभावकों में भी असंतोष हो सकता है।

शिक्षकों ने यह भी आशंका जताई कि यदि स्कूलों में खाना बनाने का काम इस्कॉन को दिया जाता है तो वर्षों से मिड-डे मील बनाने वाली स्थानीय महिला रसोइयों की आजीविका भी प्रभावित हो सकती है।