गैलप और California State University की स्टडी के अनुसार 57% छात्र नियमित रूप से एआई टूल्स का उपयोग कर रहे हैं, जिससे उनकी सोचने की क्षमता कम हो रही है। इसके अलावा, गलत जानकारी के प्रसार और करियर में संभावित खतरों को लेकर भी चिंता जताई गई है।
अब दौर बदल चुका है। मैथ या साइंस के न्यूमेरिकल के लिए घंटों माथापच्ची नहीं करनी, इतिहास के लिए रट्टा नहीं मारना... होमवर्क के लिए पेरेंट्स से बहस भी बंद है। अब जमाना एआई का है। यहां चाहे किसी विदेशी भाषा के लेक्चर को समझना हो या कोई भी जानकारी हासिल करनी हो, बच्चों के पास सबसे बड़ा हथियार है—आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI)। लेकिन साथ ही कई तरह के डर और सवाल भी उठ रहे हैं। इसे लेकर ग्लोबल डिबेट हो रही है कि कहीं यह हथियार छात्रों की मौलिक बुद्धि यानी ओरिजिनल इंटेलिजेंस के लिए खतरा तो नहीं बन रहा? हाल ही में आए ग्लोबल डेटा और विशेषज्ञों की राय ने इस पर एक नई बहस छेड़ दी है। आइए समझते हैं।
क्या सच में हम एआई पर डिपेंड हो रहे हैं?
एजुकेशन फील्ड में AI वाकई वरदान जैसी दिखती है। अब ‘वर्डली’ जैसे प्लेटफॉर्म्स हैं, जहां विदेशी भाषा के लेक्चर भी रीयल-टाइम में स्टूडेंट्स की समझ की भाषा में उपलब्ध हैं। University of Southern California जैसे संस्थान इसका सफल उपयोग कर रहे हैं। लेकिन सिक्के का दूसरा पहलू थोड़ा चिंताजनक है। गैलप और कैलिफोर्निया स्टेट यूनिवर्सिटी की एक हालिया स्टडी बताती है कि 57% छात्र अब हर हफ्ते AI टूल्स का इस्तेमाल कर रहे हैं।
क्या नई पीढ़ी ‘सोचना’ छोड़ रही है?
ग्लोबल टेक-साइंस मीडिया प्लेटफॉर्म Digital Journal के एक विश्लेषण के अनुसार, AI का अत्यधिक उपयोग छात्रों को ‘कॉग्निटिव ऑफलोडिंग’ की ओर धकेल रहा है। इसका सीधा मतलब यह है कि छात्र अब समस्याओं को सुलझाने के बजाय उत्तर जनरेट करने पर निर्भर हो गए हैं।
विशेषज्ञों ने AI के इस्तेमाल को लेकर बताए 3 बड़े खतरे
1. क्रिटिकल थिंकिंग का अंत:
जब छात्र होमवर्क और निबंध (essay) लिखने के लिए AI का उपयोग करते हैं, तो उनकी तर्क करने और खुद के विचार विकसित करने की क्षमता कमजोर हो सकती है।
2. गलत जानकारी का भ्रम:
AI अक्सर ‘हैलुसिनेशन’ का शिकार होता है, यानी वह पूरे आत्मविश्वास के साथ गलत तथ्य पेश कर सकता है, जिसे छात्र सच मान लेते हैं।
3. करियर पर खतरा:
अगर छात्र एआई की मदद से डिग्री तो ले लेते हैं, लेकिन कार्यस्थल पर उन्हें बिना मदद के काम करना पड़ा, तो वे वहां संघर्ष कर सकते हैं।
संस्थानों के पास नहीं है कोई ठोस नीति
हैरानी की बात यह है कि आधे से ज्यादा छात्रों का कहना है कि उनके स्कूलों या कॉलेजों में AI के इस्तेमाल को लेकर कोई स्पष्ट गाइडलाइन नहीं है। ऐसे में यह ‘शॉर्टकट’ पढ़ाई का तरीका छात्रों को भविष्य की चुनौतियों के लिए कमजोर बना सकता है।
एजुकेशन एक्सपर्ट्स का मानना है कि AI को सिर्फ एक असिस्टेंट के रूप में इस्तेमाल करना चाहिए, न कि ‘ब्रेन’ के विकल्प के रूप में। लेकिन असल में हो यह रहा है कि अब न सिर्फ स्टूडेंट्स, बल्कि घरों में पेरेंट्स और टीचर्स भी एआई से इंसानों की तरह काम ले रहे हैं। वे भूल जाते हैं कि यह इंटेलिजेंस आर्टिफिशियल है, इंसानों की तरह मौलिक नहीं।
इस नई पीढ़ी को लेकर चिंता करना स्वाभाविक है, लेकिन कई विशेषज्ञ मानते हैं कि अगर बच्चों को AI का सही इस्तेमाल सिखाया जाए, तो वे और ज्यादा बुद्धिमान बन सकते हैं। जरा सोचिए—सीमित जानकारी या किताबों तक सीमित रहने वाली पिछली पीढ़ियों के मुकाबले आज के बच्चों के पास हर सवाल का जवाब तुरंत उपलब्ध है। इससे ज्ञान की खोज भी बढ़ सकती है। इसलिए यह कहना गलत होगा कि AI बच्चों को कमजोर बना रही है। हो सकता है कि यह उन्हें और ज्यादा ज्ञान की ओर प्रेरित कर रही हो।
