पश्चिम बंगाल की राजनीति एक बार फिर बड़े बदलाव के मुहाने पर खड़ी दिखाई दे रही है। सूत्रों के अनुसार, राज्य की शुभेंदु अधिकारी सरकार आगामी सोमवार को विधानसभा में समान नागरिक संहिता (Uniform Civil Code-UCC) विधेयक पेश कर सकती है। अगर ऐसा होता है तो यह केवल एक कानूनी बदलाव नहीं होगा, बल्कि राज्य की सामाजिक, राजनीतिक और प्रशासनिक व्यवस्था में भी एक नए अध्याय की शुरुआत मानी जाएगी। विधानसभा चुनाव के दौरान भारतीय जनता पार्टी ने अपने ‘संकल्प पत्र’ में सत्ता में आने के तीन महीने के भीतर यूसीसी लागू करने का वादा किया था और अब सरकार उसी दिशा में निर्णायक कदम बढ़ाती नजर आ रही है।बंगाल में UCC की दस्तक

बंगाल में UCC की दस्तक

वादे से विधेयक तक का सफर

समान नागरिक संहिता भाजपा के प्रमुख चुनावी वादों में शामिल रही है। चुनाव प्रचार के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी पश्चिम बंगाल की कई जनसभाओं में यूसीसी को लेकर अपनी प्रतिबद्धता दोहराई थी। भाजपा का तर्क रहा है कि देश के सभी नागरिकों के लिए एक समान कानून व्यवस्था होना संविधान की मूल भावना के अनुरूप है। वहीं तत्कालीन मुख्यमंत्री ममता बनर्जी और तृणमूल कांग्रेस ने इस प्रस्ताव का लगातार विरोध किया था। लेकिन सत्ता परिवर्तन के बाद अब राज्य सरकार इस मुद्दे को विधायी रूप देने की तैयारी में दिखाई दे रही है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह कदम भाजपा सरकार के सबसे बड़े वैचारिक एजेंडे को जमीन पर उतारने की दिशा में महत्वपूर्ण माना जाएगा।

क्या बदलेगा UCC लागू होने के बाद?

समान नागरिक संहिता लागू होने की स्थिति में विवाह, तलाक, उत्तराधिकार, गोद लेने, संपत्ति के अधिकार और लिव-इन रिलेशनशिप जैसे मामलों में धर्म आधारित अलग-अलग व्यक्तिगत कानूनों की जगह एक समान कानूनी व्यवस्था लागू होगी। इसका मतलब होगा कि सभी नागरिकों के लिए एक ही कानून प्रभावी होगा, चाहे उनका धर्म, जाति या समुदाय कोई भी हो। सरकार का मानना है कि इससे कानूनी समानता और लैंगिक न्याय को बढ़ावा मिलेगा। हालांकि इसके आलोचक इसे धार्मिक और सांस्कृतिक विविधता पर प्रभाव डालने वाला कदम बताते रहे हैं।

उत्तराखंड, गुजरात और असम के बाद बंगाल

देश में गोवा लंबे समय से समान नागरिक संहिता लागू करने वाला राज्य रहा है। इसके बाद उत्तराखंड ने यूसीसी लागू कर राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा बटोरी थी। गुजरात और असम में भी इस दिशा में प्रयास किए गए हैं। यदि पश्चिम बंगाल में यह विधेयक पारित होता है तो पूर्वी भारत का यह पहला बड़ा राज्य होगा जहां समान नागरिक संहिता लागू की जाएगी। राजनीतिक रूप से भी इसका असर व्यापक हो सकता है, क्योंकि बंगाल लंबे समय तक क्षेत्रीय दलों और वैचारिक राजनीति का मजबूत गढ़ माना जाता रहा है।

सियासत में बढ़ी हलचल, सबकी नजर विधानसभा पर

सूत्रों के अनुसार, विधानसभा के चालू सत्र में विधेयक पेश किए जाने की संभावना ने राजनीतिक गलियारों में हलचल बढ़ा दी है। विपक्षी दल इसे लेकर रणनीति बनाने में जुट गए हैं, जबकि भाजपा इसे अपने चुनावी वादे की पूर्ति और ‘कानूनी समानता’ की दिशा में ऐतिहासिक कदम बता रही है। अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि विधानसभा में इस विधेयक पर बहस किस दिशा में जाती है और क्या सरकार इसे पारित कराने में सफल होती है। फिलहाल राज्य की राजनीति से लेकर आम जनता तक, सभी की नजरें सोमवार को होने वाली संभावित पेशकश पर टिकी हुई हैं।