तृणमूल कांग्रेस (TMC) में मचे सियासी भूचाल ने अब संसदीय और संवैधानिक लड़ाई का रूप ले लिया है। पार्टी के 20 सांसदों के बागी रुख और नई राजनीतिक पहचान बनाने की कोशिशों के बीच टीएमसी के राष्ट्रीय महासचिव और लोकसभा में पार्टी के नेता अभिषेक बनर्जी सीधे लोकसभा स्पीकर ओम बिरला के पास पहुंचे। उन्होंने न केवल बागी सांसदों को अयोग्य घोषित करने की मांग की, बल्कि यह भी स्पष्ट संदेश दिया कि पार्टी छोड़कर नई राजनीतिक जमीन तलाशने वालों के लिए बंगाल की राजनीति में कोई जगह नहीं है। यह घटनाक्रम ऐसे समय सामने आया है जब टीएमसी अपने इतिहास के सबसे बड़े संसदीय संकटों में से एक का सामना कर रही है।स्पीकर से मिले अभिषेक बनर्जी | Photo: ITG

स्पीकर से मिले अभिषेक बनर्जी | Photo: ITG

स्पीकर के सामने संवैधानिक लड़ाई, 20 सांसदों पर कार्रवाई की मांग

लोकसभा स्पीकर से मुलाकात के दौरान अभिषेक बनर्जी ने 20 सांसदों के खिलाफ अयोग्यता याचिकाएं सौंपीं और दसवीं अनुसूची (Anti-Defection Law) के प्रावधानों का हवाला देते हुए तत्काल कार्रवाई की मांग की। उनका तर्क था कि यदि कोई सांसद स्वेच्छा से पार्टी छोड़ता है या पार्टी विरोधी गतिविधियों में शामिल होता है, तो उसकी सदस्यता समाप्त की जा सकती है। अभिषेक ने स्पीकर को यह भी याद दिलाया कि किसी वैध विलय को मान्यता तभी मिल सकती है जब किसी दल के कम से कम दो-तिहाई सांसद किसी दूसरी पार्टी में शामिल हों। टीएमसी का दावा है कि मौजूदा हालात में बागी सांसदों की ओर से किया जा रहा कोई भी दावा संवैधानिक कसौटी पर खरा नहीं उतरता।

‘नई पार्टी’ के दावे से बढ़ी सियासी हलचल

टीएमसी नेतृत्व की चिंता का सबसे बड़ा कारण वह दावा है जिसमें कुछ सांसदों ने कथित तौर पर नई राजनीतिक पार्टी बनाने की बात कही है। अभिषेक बनर्जी ने खुलासा किया कि उन्हें जानकारी मिली है कि 4-5 सांसद अलग संगठन खड़ा करने का दावा कर रहे हैं। उनके मुताबिक यह केवल राजनीतिक असहमति का मामला नहीं, बल्कि जनता के जनादेश के साथ विश्वासघात है। उन्होंने कहा कि लोकतंत्र में हार-जीत सामान्य है, लेकिन भाजपा के खिलाफ लड़ने के बजाय राजनीतिक सुविधा के लिए पाला बदलना जनता के भरोसे को तोड़ने जैसा है। यही वजह है कि टीएमसी इस मुद्दे को केवल पार्टी अनुशासन नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक नैतिकता के सवाल के रूप में पेश कर रही है।

ईडी, सीआईडी जांच और राजनीतिक दबाव के आरोप

इस पूरे विवाद के पीछे केंद्रीय एजेंसियों की भूमिका को लेकर भी राजनीतिक बहस तेज हो गई है। हाल ही में प्रवर्तन निदेशालय (ED) और राज्य सीआईडी द्वारा लंबी पूछताछ का सामना कर चुके अभिषेक बनर्जी ने आरोप लगाया कि विपक्षी नेताओं पर दबाव बनाकर राजनीतिक समीकरण बदले जा रहे हैं। उनका कहना है कि पिछले एक महीने में सांसदों और विधायकों को डराने, तोड़ने और राजनीतिक रूप से कमजोर करने की कोशिशें हुई हैं। हालांकि विपक्ष इन आरोपों को खारिज करता रहा है, लेकिन टीएमसी नेतृत्व इसे अपने खिलाफ चल रहे बड़े राजनीतिक अभियान के रूप में देख रहा है।

मॉनसून सत्र से पहले बड़ा फैसला संभव, बंगाल की राजनीति पर नजर

अब सभी निगाहें लोकसभा स्पीकर के अगले कदम पर टिकी हैं। सूत्रों के अनुसार, मॉनसून सत्र शुरू होने से पहले बागी सांसदों की स्थिति और उनकी मान्यता से जुड़े मुद्दों पर फैसला आ सकता है। टीएमसी सांसद सौगत रॉय ने भी साफ कहा है कि पार्टी एकजुट है और जो नेता पार्टी छोड़ चुके हैं, उन्हें टीएमसी का हिस्सा नहीं माना जा सकता। यदि स्पीकर अयोग्यता याचिकाओं पर कार्रवाई करते हैं, तो यह केवल टीएमसी के लिए नहीं बल्कि देश की संसदीय राजनीति और दल-बदल कानून की व्याख्या के लिए भी एक महत्वपूर्ण मिसाल बन सकता है। बंगाल की राजनीति में यह संघर्ष अब सड़क से संसद और संसद से संविधान की चौखट तक पहुंच चुका है।