टीएमसी के बागी नेताओं ने ममता बनर्जी के सामने रखी बड़ी शर्त, अभिषेक बनर्जी को पार्टी से हटाने पर वापसी का किया दावा।
पश्चिम बंगाल की पूर्व मुख्यमंत्री और तृणमूल कांग्रेस (TMC) प्रमुख ममता बनर्जी इन दिनों बड़े राजनीतिक संकट का सामना कर रही हैं। पार्टी के भीतर बढ़ती बगावत के बीच अब उनके सामने संगठन को एकजुट रखने के साथ-साथ परिवार और राजनीति के बीच संतुलन बनाने की चुनौती भी खड़ी हो गई है। बागी नेताओं ने साफ संकेत दिया है कि अगर अभिषेक बनर्जी को पार्टी की सक्रिय भूमिका से हटाया जाता है, तो वे दोबारा टीएमसी में लौटने पर विचार कर सकते हैं।
दरअसल, तृणमूल कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और उत्तर बंगाल विकास विभाग के पूर्व मंत्री रवींद्रनाथ घोष ने दावा किया है कि यदि ममता बनर्जी अपने भतीजे और पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव अभिषेक बनर्जी को सक्रिय राजनीति से अलग कर देती हैं, तो ऋतब्रत बनर्जी के नेतृत्व वाले बागी गुट के अधिकांश असंतुष्ट नेता फिर से टीएमसी का दामन थाम सकते हैं।
रवींद्रनाथ घोष खुद भी हाल ही में ऋतब्रत बनर्जी के नेतृत्व वाले बागी खेमे में शामिल हुए हैं। उनके इस कदम के बाद कूचबिहार की राजनीति में हलचल तेज हो गई है। राजनीतिक जानकारों का मानना है कि इस घटनाक्रम ने टीएमसी के भीतर चल रहे मतभेदों को और गहरा कर दिया है, जिससे ममता बनर्जी के सामने संगठन को एकजुट रखने की चुनौती पहले से ज्यादा कठिन हो गई है।
सर्वे में क्या बोली बंगाल की जनता?
इसी बीच ABP आनंदा के एक ओपिनियन पोल ने इस राजनीतिक बहस को और हवा दे दी है। सर्वे में लोगों से सवाल पूछा गया कि क्या ममता बनर्जी पार्टी को बचाने के लिए अपने भतीजे अभिषेक बनर्जी के खिलाफ कोई बड़ा फैसला लेंगी? इस पर अधिकांश लोगों ने माना कि ऐसा होने की संभावना बेहद कम है।
सर्वे के मुताबिक, 78 फीसदी लोगों का मानना है कि ममता बनर्जी अपने भतीजे अभिषेक बनर्जी के खिलाफ कोई सख्त कदम नहीं उठाएंगी। वहीं, 19 फीसदी लोगों ने कहा कि अगर पार्टी के हित में जरूरत पड़ी तो ममता ऐसा फैसला ले सकती हैं। जबकि 3 फीसदी उत्तरदाताओं ने कहा कि वे इस मुद्दे पर कोई राय नहीं दे सकते या उन्हें नहीं पता कि ममता बनर्जी आगे क्या निर्णय लेंगी।
बागी गुट ने तेज की संगठन पर पकड़ बनाने की कवायद
तृणमूल कांग्रेस में जारी अंदरूनी कलह अब नए चरण में पहुंचती दिखाई दे रही है। बागी गुट ने पार्टी के समानांतर राज्य और जिला समितियों के गठन की प्रक्रिया तेज कर दी है, जिससे संगठन के भीतर सियासी खींचतान और बढ़ गई है। इस घटनाक्रम के बाद ममता बनर्जी के कई पुराने सहयोगियों के भी बागी खेमे में जाने की चर्चा है। इनमें बीरभूम के प्रभावशाली नेता अनुब्रत मंडल का नाम भी शामिल बताया जा रहा है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह सिर्फ असंतोष नहीं, बल्कि संगठन पर पकड़ मजबूत करने की रणनीति का हिस्सा है।
सूत्रों के मुताबिक, बागी गुट जल्द ही रवींद्रनाथ घोष को कूचबिहार जिला अध्यक्ष की जिम्मेदारी सौंप सकता है। घोष ने पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव अभिषेक बनर्जी और चुनावी रणनीतिकार संस्था आई-पैक (I-PAC) की कार्यशैली पर सवाल उठाते हुए कहा कि विधानसभा चुनाव में टीएमसी को हुए नुकसान की बड़ी वजह यही फैसले रहे।
'अभिषेक को कुछ समय के लिए सक्रिय राजनीति से दूर करना होगा'
रवींद्रनाथ घोष ने दावा किया कि पार्टी के कई नेताओं और कार्यकर्ताओं से बातचीत के बाद उन्हें लगता है कि अगर ममता बनर्जी अभिषेक बनर्जी को कुछ समय के लिए सक्रिय राजनीति से अलग कर दें, तो बड़ी संख्या में नाराज नेता और कार्यकर्ता दोबारा टीएमसी में लौट सकते हैं। उनका कहना था कि इससे संगठन में पैदा हुई नाराजगी काफी हद तक कम हो सकती है।
घोष ने आरोप लगाया कि अभिषेक बनर्जी की कार्यशैली के चलते 80 से अधिक मौजूदा विधायकों और मंत्रियों के टिकट काटे गए, जबकि कई वरिष्ठ नेताओं को संगठनात्मक पदों से भी हटाया गया। उनके मुताबिक, इन फैसलों का पार्टी की चुनावी स्थिति और संगठनात्मक एकजुटता पर नकारात्मक असर पड़ा।
'क्या अब भी दीदी के हाथ में है कमान?'
रवींद्रनाथ घोष ने दावा किया कि तृणमूल कांग्रेस में अब ममता बनर्जी का पहले जैसा प्रभाव नहीं रह गया है। उन्होंने सवाल उठाते हुए कहा, "क्या अब भी दीदी के हाथों में कोई ताकत बची है? असली शक्ति कहीं और सिमट गई है और महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां ऐसे लोगों को सौंप दी गई हैं, जो इसके योग्य नहीं हैं। ऐसे में ममता बनर्जी चाहकर भी कई फैसले लागू नहीं करा सकतीं।"
'अभिषेक के पास राजनीतिक अनुभव की कमी'
अभिषेक बनर्जी के नेतृत्व पर सवाल उठाते हुए घोष ने कहा कि उनके पास जमीनी राजनीतिक अनुभव की कमी है। उनका कहना था कि अभिषेक किसी जनआंदोलन की पृष्ठभूमि से नहीं आए हैं। उन्होंने चुनावी रणनीतिकार संस्था आई-पैक (I-PAC) पर भी निशाना साधते हुए कहा कि पार्टी को ऐसे लोगों के भरोसे छोड़ दिया गया, जिनका राजनीतिक संघर्ष से कोई वास्ता नहीं था।
घोष ने कहा, "हम वर्षों के संघर्ष और राजनीतिक आंदोलनों से आगे बढ़े हैं। 2011 और 2016 के चुनावों में आई-पैक नहीं थी, लेकिन बाद में उसे अपरिहार्य बना दिया गया। आखिरकार, उन्होंने पार्टी को नुकसान पहुंचाया और फिर चले गए।"
'तृणमूल कांग्रेस एक ही है'
पाला बदलने के सवाल पर रवींद्रनाथ घोष ने कहा कि वह किसी नए दल में नहीं गए हैं, क्योंकि तृणमूल कांग्रेस एक ही है और उसमें किसी अलग गुट का अस्तित्व नहीं है। उन्होंने कहा कि उत्तर बंगाल के अधिकांश विधायक और नेता एक साथ आ गए हैं और उन्होंने भी पार्टी कार्यकर्ताओं के साथ खड़े रहने के लिए यही फैसला लिया है। उनके मुताबिक, यह कदम किसी व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा के लिए नहीं, बल्कि कार्यकर्ताओं की भावनाओं को ध्यान में रखकर उठाया गया है।
