erer | Source: ereनई दिल्ली। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने रूस पर नए और कड़े प्रतिबंधों से जुड़े उस कानून पर हस्ताक्षर कर दिए हैं, जिसके तहत रूस से तेल और गैस खरीदने वाले देशों पर 100 प्रतिशत तक अतिरिक्त टैरिफ लगाने का रास्ता खुल गया है। इस फैसले के बाद भारत और चीन पर भी अमेरिकी कार्रवाई की संभावना को लेकर चर्चा तेज हो गई है, क्योंकि दोनों देश रूस से ऊर्जा की बड़ी मात्रा में खरीद करते हैं।

कानून के बाद भारत पर क्यों टिकी निगाहें

नए कानून का सीधा उद्देश्य रूस के ऊर्जा क्षेत्र पर दबाव बढ़ाना और उसके तेल एवं गैस से होने वाली आय को प्रभावित करना है। इसके साथ ही रूस के वरिष्ठ अधिकारियों, वित्तीय संस्थानों तथा प्रतिबंधों से बचने के लिए कथित तौर पर इस्तेमाल किए जाने वाले टैंकरों के नेटवर्क को भी निशाना बनाया गया है।

इस कानून में अमेरिकी राष्ट्रपति को रूस से तेल या गैस खरीदने वाले पांच सबसे बड़े खरीदार देशों पर 100 प्रतिशत तक टैरिफ लगाने का अधिकार दिया गया है। हालांकि, महत्वपूर्ण बात यह है कि 100 प्रतिशत शुल्क अपने आप लागू नहीं होगा। टैरिफ किस देश पर लगाया जाएगा, उसकी दर कितनी होगी और किन परिस्थितियों में किसी देश को छूट दी जा सकती है, इस संबंध में निर्णय लेने का अधिकार राष्ट्रपति के पास रहेगा।

अमेरिकी संसद में कितने वोट पड़े

इस विधेयक को अमेरिकी प्रतिनिधि सभा में मतदान के दौरान 262 वोट मिले, जबकि 159 सांसदों ने इसके खिलाफ मतदान किया। बहुमत मिलने के बाद विधेयक को सीनेट की मंजूरी भी पहले ही प्राप्त हो चुकी थी। इसके बाद राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने इस पर हस्ताक्षर कर इसे कानून का रूप दे दिया।

इस घटनाक्रम के बाद अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि अमेरिकी प्रशासन इस कानून का इस्तेमाल किन देशों के खिलाफ और किस स्तर पर करता है। कानून राष्ट्रपति को व्यापक अधिकार देता है, लेकिन टैरिफ लागू करने का वास्तविक फैसला अलग से किया जाना है।

भारत की रूस से तेल खरीद बनी अहम वजह

भारत रूस से कच्चे तेल का प्रमुख खरीदार है। पश्चिमी देशों द्वारा रूस पर लगाए गए प्रतिबंधों और ऊर्जा बाजार में बदलाव के बाद रूस भारत के लिए कच्चे तेल के महत्वपूर्ण आपूर्तिकर्ताओं में शामिल रहा है। ऐसे में अमेरिकी कानून का संभावित असर भारत की ऊर्जा खरीद व्यवस्था और दोनों देशों के व्यापारिक संबंधों के संदर्भ में देखा जा रहा है।

भारत पहले ही अमेरिका को इस तरह की टैरिफ व्यवस्था को लेकर अपनी चिंता से अवगत करा चुका है। भारतीय पक्ष का कहना है कि देश की प्राथमिकता ऊर्जा सुरक्षा सुनिश्चित करना है। भारत ने यह भी स्पष्ट किया है कि अंतरराष्ट्रीय बाजार की परिस्थितियों के आधार पर वह विभिन्न देशों से कच्चे तेल की खरीद जारी रखेगा।

भारत-अमेरिका व्यापार संबंधों पर भी पड़ सकता है असर

नए कानून का महत्व केवल रूस-अमेरिका संबंधों तक सीमित नहीं है। यदि अमेरिका रूस से ऊर्जा खरीदने वाले किसी देश पर अतिरिक्त टैरिफ लागू करता है, तो संबंधित देश के अमेरिकी बाजार में निर्यात और द्विपक्षीय व्यापार पर भी इसका प्रभाव पड़ सकता है। हालांकि, भारत पर वास्तविक असर इस बात पर निर्भर करेगा कि अमेरिकी प्रशासन कानून में मिले अधिकार का इस्तेमाल किस तरह करता है और भारत के लिए कोई विशेष छूट या अलग व्यवस्था तय की जाती है या नहीं।

इसलिए फिलहाल कानून के पारित होने और उसके आधार पर वास्तविक टैरिफ लागू होने के बीच अंतर करना जरूरी है। कानून ने अमेरिकी राष्ट्रपति को कार्रवाई का अधिकार दिया है, लेकिन किसी विशेष देश पर 100 प्रतिशत शुल्क तत्काल लागू होने की बात इससे स्वतः साबित नहीं होती।

चीन ने भी अमेरिका के कदम का किया विरोध

रूस से बड़े पैमाने पर ऊर्जा खरीदने वाले चीन ने भी इस तरह की अमेरिकी कार्रवाई का विरोध किया है। चीन का कहना है कि उसके व्यापार और आर्थिक सहयोग में किसी तीसरे पक्ष को हस्तक्षेप या दबाव नहीं डालना चाहिए।

चीनी विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता गुओ जियाकुन ने कहा था कि चीन ऐसी किसी कार्रवाई का विरोध करता है, जिसे संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की मंजूरी प्राप्त नहीं हुई है। चीन का यह रुख बताता है कि अमेरिकी कानून का असर केवल भारत-अमेरिका संबंधों तक सीमित रहने के बजाय रूस से जुड़े व्यापक अंतरराष्ट्रीय व्यापार पर भी पड़ सकता है।

अब आगे क्या होगा

ट्रंप के हस्ताक्षर के बाद कानून प्रभावी हो गया है, लेकिन भारत पर 100 प्रतिशत टैरिफ स्वतः लागू नहीं हुआ है। अब निगाहें अमेरिकी प्रशासन के अगले फैसले पर रहेंगी कि वह रूस से तेल और गैस खरीदने वाले देशों के संबंध में इस अधिकार का इस्तेमाल किस तरह करता है। भारत की ओर से ऊर्जा सुरक्षा और बाजार की परिस्थितियों को प्राथमिकता दिए जाने की बात पहले ही कही जा चुकी है।