पटना। बिहार के सभी पुलिस थानों में बच्चों से जुड़े मामलों के लिए अब एक अलग और सुरक्षित व्यवस्था लागू होने जा रही है। पुलिस मुख्यालय ने प्रदेश के प्रत्येक थाने में बाल सहायता डेस्क स्थापित करने की तैयारी की है। यह व्यवस्था महात्मा गांधी जयंती, 2 अक्टूबर 2026 से सभी थानों में शुरू हो जाएगी। इसका उद्देश्य बाल आरोपी और बाल पीड़ितों को पुलिस थाने में सुरक्षित, संवेदनशील और भयमुक्त वातावरण उपलब्ध कराना है।
2 अक्टूबर से बिहार के हर थाने में शुरू होगी नई व्यवस्था
बिहार पुलिस की यह पहल सुप्रीम कोर्ट और राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग के निर्देशों के अनुरूप की जा रही है। पुलिस मुख्यालय ने सभी जिलों को बाल सहायता डेस्क के गठन से संबंधित तैयारियां पूरी करने के निर्देश दिए हैं। साथ ही जिलों से 5 अक्टूबर तक अनुपालन रिपोर्ट भी मांगी गई है।
पुलिस मुख्यालय के अपराध अनुसंधान विभाग (कमजोर वर्ग) के अनुसार, यह व्यवस्था बिहार पुलिस अधिनियम 2007 की धारा 8 (5) और राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग के दिशा-निर्देशों के अनुरूप की जा रही है।
लॉकअप से अलग होगा बच्चों का खास सहायता केंद्र
प्रत्येक थाना परिसर में बनाया जाने वाला बाल सहायता डेस्क सामान्य पुलिस लॉकअप से पूरी तरह अलग स्थान पर होगा। यहां बच्चों को सुरक्षित और सहज वातावरण देने की कोशिश की जाएगी। डेस्क वाले स्थान की दीवारों को रंगीन बनाया जाएगा, ताकि वातावरण बच्चों के अनुकूल हो और वे किसी तरह के भय या दबाव में न रहें।
इस व्यवस्था का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि किसी मामले में पुलिस थाने पहुंचने वाले बच्चे के साथ अपराधी जैसा व्यवहार न हो और उसकी उम्र तथा परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए संवेदनशील तरीके से बातचीत और कार्रवाई की जाए।
डेस्क पर दिखेगा अधिकारी का नाम और मोबाइल नंबर
बाल सहायता डेस्क पर संबंधित अधिकारियों की महत्वपूर्ण जानकारी स्पष्ट रूप से प्रदर्शित की जाएगी। यहां बाल कल्याण पुलिस पदाधिकारी का नाम, पदनाम और मोबाइल नंबर लिखा होगा। इसके अलावा संबंधित जिला बाल संरक्षण पदाधिकारी का नाम और मोबाइल नंबर भी लोगों को उपलब्ध कराया जाएगा।
पुलिस मुख्यालय ने निर्देश दिया है कि डेस्क पर प्रदर्शित किए जाने वाले मोबाइल नंबर हमेशा सक्रिय रहें। इसका उद्देश्य बच्चों और उनके अभिभावकों को जरूरत पड़ने पर संबंधित अधिकारियों से संपर्क करने में सुविधा देना है।
बाल कल्याण पुलिस पदाधिकारी संभालेंगे डेस्क की जिम्मेदारी
प्रत्येक थाना में बाल सहायता डेस्क का संचालन थाना के बाल कल्याण पुलिस पदाधिकारी के नेतृत्व में किया जाएगा। बच्चों से जुड़े मामलों में डेस्क की भूमिका महत्वपूर्ण होगी। पुलिस मुख्यालय के अनुसार, बच्चों और उनके अभिभावकों से प्राप्त शिकायतों तथा सहायता संबंधी अनुरोधों पर त्वरित कार्रवाई की जाएगी।
प्राप्त शिकायतों का समयबद्ध निष्पादन सुनिश्चित करने के साथ-साथ उनका समुचित अभिलेख भी रखा जाएगा। इस व्यवस्था से बच्चों से संबंधित मामलों में पुलिस कार्रवाई को अधिक संवेदनशील और व्यवस्थित बनाने का प्रयास किया जाएगा।
बालिकाओं से बातचीत के लिए महिला पुलिसकर्मी रहेंगी तैनात
बाल सहायता डेस्क पर बालिकाओं से संबंधित मामलों और समस्याओं को ध्यान में रखते हुए योग्य महिला पुलिसकर्मियों की प्रतिनियुक्ति भी की जाएगी। महिला पुलिसकर्मी बालिकाओं से संवाद करने और उनकी समस्याओं को समझने में सहयोग करेंगी।
इस व्यवस्था का उद्देश्य ऐसी बालिकाओं को सहज वातावरण उपलब्ध कराना है, जिन्हें किसी अपराध, शिकायत या अन्य सहायता के सिलसिले में पुलिस थाने पहुंचना पड़ सकता है।
डीएसपी और वरिष्ठ अधिकारी करेंगे नियमित निगरानी
एडीजी (कमजोर वर्ग) केएस अनुपम ने बताया कि बाल सहायता डेस्क के कामकाज की नियमित निगरानी की जाएगी। जिलों में डीएसपी (विशेष अपराध) तथा अन्य वरीय पुलिस पदाधिकारी डेस्क की गतिविधियों पर नजर रखेंगे।
पुलिस मुख्यालय के अनुसार, निगरानी की यह व्यवस्था यह सुनिश्चित करने के लिए होगी कि बच्चों से जुड़े मामलों में संवेदनशील और प्रभावी पुलिसिंग हो तथा शिकायतों और सहायता संबंधी अनुरोधों पर समयबद्ध कार्रवाई की जाए।
बच्चों की पहचान सार्वजनिक करने पर रोक, निजता का रहेगा ध्यान
बच्चों से जुड़े मामलों में उनकी निजता और पहचान की सुरक्षा बेहद महत्वपूर्ण है। सुप्रीम कोर्ट और राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग की ओर से बच्चों से संबंधित अपराधों के मामलों में संवेदनशीलता बरतने पर जोर दिया गया है। नियमों के मुताबिक बच्चों की पहचान सार्वजनिक नहीं की जा सकती।
ऐसे मामलों में बच्चों के साथ अपराधी जैसा व्यवहार नहीं किया जाना चाहिए। पुलिस थाने में किसी बच्चे के पहुंचने की स्थिति में उसकी उम्र, स्थिति और अधिकारों को ध्यान में रखते हुए संवेदनशील तरीके से कार्रवाई किए जाने की जरूरत है।
अलग डेस्क से बच्चों को मिलेगा सुरक्षित और भयमुक्त माहौल
कई मामलों में बच्चे स्वयं किसी अपराध के पीड़ित होते हैं या उनके परिजन शिकायत लेकर पुलिस थाने पहुंचते हैं। ऐसे में सामान्य थाना परिसर का माहौल उनके लिए असहज या भय पैदा करने वाला हो सकता है। बाल सहायता डेस्क को इसी आवश्यकता को ध्यान में रखते हुए अलग स्थान पर तैयार किया जा रहा है।
रंगीन दीवारों और अलग स्थान के साथ बनाए जाने वाले इस डेस्क का मकसद बच्चों को सहज महसूस कराना और उनकी शिकायतों को संवेदनशीलता के साथ सुनना है। साथ ही संबंधित अधिकारियों के संपर्क नंबर उपलब्ध होने से बच्चों और अभिभावकों को सहायता लेने में सुविधा होगी।
5 अक्टूबर तक जिलों को देनी होगी अनुपालन रिपोर्ट
बिहार पुलिस मुख्यालय की योजना के अनुसार 2 अक्टूबर से राज्य के सभी पुलिस थानों में बाल सहायता डेस्क काम करने लगेगा। इसके बाद जिलों को 5 अक्टूबर तक इसके गठन और संचालन से संबंधित अनुपालन रिपोर्ट पुलिस मुख्यालय को देनी होगी।
कुल मिलाकर, बिहार पुलिस की यह व्यवस्था बच्चों से जुड़े मामलों में थाने के स्तर पर अलग, सुरक्षित और संवेदनशील सहायता प्रणाली उपलब्ध कराने की दिशा में उठाया गया कदम है। बाल आरोपी और बाल पीड़ित दोनों के मामलों में बच्चों की गरिमा, निजता और सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए कार्रवाई करने पर जोर दिया गया है।
बच्चों के लिए थानों में बनेगा अलग और संवेदनशील माहौल
2 अक्टूबर से बिहार के सभी पुलिस थानों में शुरू होने वाला बाल सहायता डेस्क बच्चों से संबंधित शिकायतों और मामलों के लिए अलग व्यवस्था उपलब्ध कराएगा। लॉकअप से अलग स्थान, बच्चों के अनुकूल वातावरण, महिला पुलिसकर्मियों की तैनाती, अधिकारियों के संपर्क नंबर और वरिष्ठ अधिकारियों की निगरानी के जरिए इस व्यवस्था को संचालित किया जाएगा। सुप्रीम कोर्ट और राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग के निर्देशों के अनुरूप शुरू की जा रही यह व्यवस्था बच्चों के लिए पुलिस थाने में अधिक सुरक्षित और संवेदनशील वातावरण उपलब्ध कराने पर केंद्रित है।
