ere | Source: ererनई दिल्ली। बच्चों की कही हुई कुछ बातें माता-पिता के दिल को गहराई से चोट पहुंचा सकती हैं। खासकर जब बच्चा परिवार की आर्थिक स्थिति, माता-पिता की उपलब्धियों या उनकी किसी कमी को लेकर दूसरों के सामने टिप्पणी कर दे। ऐसी स्थिति में माता-पिता को गुस्सा आना स्वाभाविक हो सकता है, लेकिन क्या हर बार बच्चे को तुरंत बदतमीज या अनुशासनहीन मान लेना सही है? इसी सवाल को एक सोशल मीडिया वीडियो के जरिए समझाने की कोशिश की गई है।

जब बच्चे के मुंह से निकल जाए ऐसी बात

सोशल मीडिया पर साझा किए गए एक वीडियो में विभा ने पेरेंट्स के सामने एक ऐसी स्थिति रखी, जो कई परिवारों में असहजता पैदा कर सकती है। उन्होंने उदाहरण दिया कि मान लीजिए माता-पिता अपने दोस्तों के साथ बैठे हैं और बच्चा भी वहीं मौजूद है। बातचीत के दौरान कोई दोस्त बताता है कि उसने हाल ही में बड़ी प्रॉपर्टी खरीदी है और आगे भी प्रॉपर्टी तलाश रहा है।

इसी दौरान बच्चा अचानक कह देता है, “मेरे पापा तो अभी तक अपना मकान ही नहीं बना पाए।” माता-पिता के लिए दोस्तों के सामने बच्चे की ऐसी टिप्पणी सुनना भावनात्मक रूप से परेशान करने वाला हो सकता है। ऐसे समय पर बच्चे की बात को गलत या बदतमीजी भरा मानकर उसे तुरंत डांटने की प्रतिक्रिया आ सकती है।

बेटी अगर मां के खाना बनाने पर टिप्पणी करे तो?

वीडियो में इसी बात को एक दूसरे उदाहरण के जरिए समझाया गया है। मान लीजिए किसी दोस्त ने बताया कि वह अब बाजार जैसा पिज्जा बनाना सीख गई है। तभी आपकी बेटी कह देती है कि उसकी मां तो सामान्य खाना भी ठीक से नहीं बना पातीं। ऐसी टिप्पणी सुनने के बाद मां को भी बुरा लग सकता है और बच्चे के व्यवहार पर गुस्सा आ सकता है।

इन दोनों उदाहरणों का मकसद यह दिखाना है कि बच्चे कई बार अपने आसपास की चीजों को सीधे शब्दों में कह देते हैं। उन्हें यह समझ नहीं होता कि उनकी कही बात माता-पिता के आत्मसम्मान या भावनाओं को किस तरह प्रभावित कर सकती है।

लेकिन अब स्थिति को उलटकर देखिए

विभा ने पेरेंट्स से स्थिति को दूसरे नजरिए से देखने की बात कही। उन्होंने बच्चों की बात पर माता-पिता की प्रतिक्रिया की तुलना उस व्यवहार से की, जो कभी-कभी स्वयं माता-पिता बच्चों के साथ करते हैं।

उन्होंने उदाहरण दिया कि बच्चा अपने दोस्तों के साथ बैठा है और उनमें से कोई बच्चा अपने परीक्षा के अंक बताता है। उसी समय कोई पेरेंट्स अपने बच्चे से कहते हैं कि उन्हें तो अपने बच्चे से इतने अंक की उम्मीद ही नहीं थी।

बच्चे के सामने पेरेंट्स की ऐसी टिप्पणी क्यों अहम है?

इस उदाहरण में सवाल यह उठता है कि अगर बच्चा अपने माता-पिता की किसी कमी या उपलब्धि को लेकर दूसरों के सामने टिप्पणी करता है तो उसे गलत माना जाता है, लेकिन जब माता-पिता अपने बच्चे की उपलब्धि या प्रदर्शन पर उसके दोस्तों के सामने टिप्पणी करते हैं तो उसे किस नजरिए से देखा जाना चाहिए?

यही तुलना इस पूरे संदेश का मुख्य हिस्सा है। इसका उद्देश्य माता-पिता को यह सोचने के लिए प्रेरित करना है कि बच्चों से सम्मानजनक व्यवहार की अपेक्षा रखने के साथ-साथ उन्हें भी बच्चों के सामने अपनी भाषा और प्रतिक्रिया पर ध्यान देना चाहिए।

‘बच्चे को टोकेंगे नहीं तो सुधरेगा कैसे’ वाली सोच पर सवाल

वीडियो में इस तर्क पर भी सवाल उठाया गया कि यदि बच्चे को उसकी गलती पर टोका नहीं जाएगा तो वह सुधरेगा कैसे। संदेश में कहा गया है कि बच्चे को सुधारने की कोशिश और उसे दूसरों के सामने शर्मिंदा करने या उसकी भावनाओं को ठेस पहुंचाने के बीच अंतर समझना जरूरी है।

माता-पिता और बच्चों के बीच संवाद का तरीका परिवार के माहौल को प्रभावित कर सकता है। इसलिए बच्चों के व्यवहार पर प्रतिक्रिया देते समय केवल उनकी गलती देखने के बजाय यह भी देखना महत्वपूर्ण है कि बड़े स्वयं किस तरह की भाषा और व्यवहार का इस्तेमाल कर रहे हैं।

बच्चों को अनुशासन सिखाने के साथ खुद भी उदाहरण बनें

पेरेंटिंग से जुड़ा यह संदेश माता-पिता को आत्ममंथन का एक अवसर देता है। बच्चे कई बार वही व्यवहार सीखते हैं, जो वे अपने आसपास देखते हैं। ऐसे में यदि माता-पिता बच्चों से दूसरों का सम्मान करने, सोच-समझकर बोलने और किसी की कमी का मजाक न उड़ाने की अपेक्षा करते हैं तो उन्हें भी बच्चों के सामने इसी तरह का व्यवहार करने की जरूरत होती है।

इसका अर्थ यह नहीं है कि बच्चे की हर अनुचित टिप्पणी को नजरअंदाज कर दिया जाए। बल्कि बच्चे को यह समझाना जरूरी हो सकता है कि किसी की निजी परिस्थिति, आर्थिक स्थिति या व्यक्तिगत कमी पर सार्वजनिक टिप्पणी करना दूसरे व्यक्ति को दुखी कर सकता है।

माता-पिता के लिए क्या है इस संदेश का सार?

सोशल मीडिया पर साझा किए गए इस उदाहरण का मूल संदेश यही है कि बच्चों के व्यवहार को सुधारने के साथ माता-पिता को अपने व्यवहार पर भी नजर डालनी चाहिए। बच्चा यदि पिता के घर या मां के खाना बनाने को लेकर टिप्पणी करता है तो उस पर तुरंत गुस्सा करने के बजाय यह समझने की कोशिश की जा सकती है कि बच्चा किस तरह की भाषा और व्यवहार अपने आसपास से सीख रहा है।

इसी तरह माता-पिता को भी बच्चों की पढ़ाई, अंक, शारीरिक बनावट, क्षमताओं या दूसरी व्यक्तिगत बातों पर उनके दोस्तों अथवा अन्य लोगों के सामने टिप्पणी करते समय संवेदनशील रहने की जरूरत है।