erer | Source: ererमॉस्को। अमेरिका ने रूस से कच्चा तेल और प्राकृतिक गैस खरीदने वाले देशों पर 100 फीसदी तक अतिरिक्त टैरिफ लगाने का रास्ता साफ करने की दिशा में बड़ा कदम उठाया है। इस प्रस्तावित व्यवस्था का असर भारत और चीन जैसे उन देशों पर पड़ सकता है, जो रूस से बड़ी मात्रा में ऊर्जा खरीदते हैं। हालांकि, इसी बीच अमेरिकी नीति का एक ऐसा पहलू सामने आया है, जिसने रूस के खिलाफ उसकी रणनीति को लेकर सवाल खड़े कर दिए हैं। रूस के तेल और गैस कारोबार पर दबाव बढ़ाने की तैयारी कर रहे अमेरिका ने अपने परमाणु ईंधन से जुड़े हितों को ध्यान में रखते हुए रूस से कुछ परमाणु सामग्री और यूरेनियम संबंधी गतिविधियों के लिए अपवाद की गुंजाइश बरकरार रखी है।

तेल और गैस पर सख्ती, परमाणु ईंधन पर अलग रुख

हाल ही में अमेरिकी प्रतिनिधि सभा से पारित व्यापक प्रतिबंध कानून में रूस के खिलाफ आर्थिक दबाव बढ़ाने के प्रावधान शामिल हैं। इसके तहत अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को उन देशों पर 100 फीसदी तक टैरिफ लगाने का अधिकार देने का प्रावधान है, जो रूस से कच्चा तेल या प्राकृतिक गैस खरीदते हैं। इस कदम का उद्देश्य रूस से होने वाली आर्थिक गतिविधियों पर दबाव बढ़ाना और उसके ऊर्जा कारोबार से जुड़े राजस्व को प्रभावित करना है।

लेकिन इसी कानून में परमाणु क्षेत्र से जुड़ी कुछ गतिविधियों को प्रतिबंधों से बाहर रखने का प्रावधान भी मौजूद है। यही वजह है कि अमेरिका की रूस नीति के इस हिस्से पर विशेष ध्यान दिया जा रहा है। एक तरफ रूस से ऊर्जा खरीदने वाले देशों पर भारी टैरिफ लगाने की व्यवस्था की जा रही है, वहीं दूसरी तरफ अमेरिकी परमाणु क्षेत्र की जरूरतों को देखते हुए रूस से जुड़े कुछ परमाणु ईंधन लेनदेन के लिए रास्ता खुला रखा गया है।

100 फीसदी तक टैरिफ लगाने की मिली ताकत

अमेरिकी प्रतिनिधि सभा ने बुधवार को ‘लिंडसे ओ. ग्राहम रूस और ईरान पर प्रतिबंध लगाने वाला अधिनियम 2026’ मंजूर किया। इस विधेयक के तहत राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को रूस से कच्चा तेल या प्राकृतिक गैस खरीदने वाले देशों पर 100 फीसदी तक टैरिफ लगाने का अधिकार मिलेगा।

यह विधेयक रूस और ईरान के खिलाफ व्यापक प्रतिबंध व्यवस्था का हिस्सा है। इसका उद्देश्य दोनों देशों से जुड़ी आर्थिक गतिविधियों पर दबाव बढ़ाना है। रूस से ऊर्जा खरीदने वाले देशों को प्रभावित करने वाला यह प्रावधान भारत और चीन के लिए भी महत्वपूर्ण है, क्योंकि दोनों देश रूस से ऊर्जा की खरीद करते हैं।

रूस से यूरेनियम पर पूरी तरह बंद नहीं हुआ रास्ता

रूस के खिलाफ प्रतिबंधों के इसी व्यापक ढांचे में यूरेनियम और परमाणु ईंधन से संबंधित प्रावधान भी शामिल हैं। कानून अमेरिकी राष्ट्रपति को रूस से यूरेनियम आयात से जुड़े पहले से लागू अमेरिकी कानून की आवश्यकताओं को लागू करने का निर्देश देता है। इसमें Rosatom State Atomic Energy Corporation तथा उसकी सहायक कंपनियों या संबंधित उत्तराधिकारी इकाइयों से आने वाले यूरेनियम का भी उल्लेख किया गया है।

हालांकि, कानून के दूसरे हिस्से में कुछ परमाणु गतिविधियों के लिए अपवाद रखा गया है। इसका अर्थ यह है कि रूस से जुड़े प्रत्येक परमाणु लेनदेन पर एक साथ और पूरी तरह रोक लगाने की व्यवस्था नहीं की गई है। अमेरिकी परमाणु क्षेत्र की कुछ आवश्यकताओं को देखते हुए विशेष परिस्थितियों में लेनदेन जारी रहने की गुंजाइश रखी गई है।

सेक्शन 111 में यूरेनियम आयात को लेकर क्या प्रावधान है?

कानून के सेक्शन 111 में अमेरिकी राष्ट्रपति को रूस से यूरेनियम आयात को नियंत्रित करने वाले मौजूदा अमेरिकी कानून की आवश्यकताओं को लागू करने का निर्देश दिया गया है। इसमें विशेष रूप से Rosatom और उसकी किसी सहायक या उत्तराधिकारी इकाई से आने वाले यूरेनियम का उल्लेख किया गया है।

यह प्रावधान रूस के परमाणु क्षेत्र पर अमेरिकी नियंत्रण और प्रतिबंध व्यवस्था को मजबूत करने की दिशा में है। लेकिन इसके बाद कानून के सेक्शन 114 में कुछ महत्वपूर्ण अपवाद दिए गए हैं, जो परमाणु क्षेत्र में रूस के साथ कुछ गतिविधियों को पूरी तरह प्रतिबंधित होने से बचाते हैं।

सेक्शन 114 में दिए गए दो महत्वपूर्ण अपवाद

पहला अपवाद अमेरिका और रूस के बीच नागरिक परमाणु सहयोग समझौते के तहत होने वाली गतिविधियों से संबंधित है। ऐसे समझौते परमाणु ऊर्जा अधिनियम की धारा 123 के तहत किए गए हैं। इन समझौतों के तहत होने वाली कुछ गतिविधियों पर प्रतिबंध संबंधी प्रावधान लागू नहीं होंगे।

दूसरा अपवाद कुछ कम-संवर्धित यूरेनियम यानी LEU के आयात से जुड़ा है। ऐसे यूरेनियम का इस्तेमाल परमाणु रिएक्टरों में किया जाता है और कुछ आयात मौजूदा अमेरिकी कानून के दायरे में आते हैं। इसके अलावा कुछ मेडिकल आइसोटोप के आयात को भी छूट दी गई है, लेकिन इसके लिए पहले से जारी छूट का होना जरूरी है।

रूस पर परमाणु ईंधन के मामले में अमेरिका की निर्भरता कितनी है?

परमाणु क्षेत्र से जुड़े इन अपवादों की एक बड़ी वजह अमेरिका की अपनी परमाणु ईंधन जरूरतें मानी जा रही हैं। रूस लंबे समय से यूरेनियम संवर्धन के क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाता रहा है। अमेरिका ने रूस पर अपनी व्यापक आर्थिक निर्भरता घटाने के प्रयास किए हैं, लेकिन परमाणु ईंधन के क्षेत्र में निर्भरता को कम करना अपेक्षाकृत जटिल रहा है।

2025 में अमेरिकी नागरिक परमाणु संयंत्रों ने कुल 12.71 मिलियन सेपरेटिव वर्क यूनिट्स (SWU) की एनरिचमेंट सेवाएं हासिल कीं। इनमें रूस की हिस्सेदारी 3.284 मिलियन SWU रही। यह कुल मात्रा का लगभग 26 फीसदी है। यानी अमेरिकी नागरिक परमाणु क्षेत्र के लिए हासिल की गई एनरिचमेंट सेवाओं में रूस की हिस्सेदारी एक महत्वपूर्ण स्तर पर रही।

अमेरिका खुद भी करता है यूरेनियम संवर्धन, फिर रूस की जरूरत क्यों?

2025 के आंकड़ों के अनुसार, अमेरिका में ही होने वाली यूरेनियम एनरिचमेंट सेवाओं की हिस्सेदारी करीब 23 फीसदी रही। इसके अलावा फ्रांस, ब्रिटेन और नीदरलैंड्स भी अमेरिका को यूरेनियम एनरिचमेंट सेवाएं उपलब्ध कराते हैं।

इन आंकड़ों से यह स्पष्ट होता है कि अमेरिका के पास अपने परमाणु ईंधन की जरूरत पूरी करने के लिए घरेलू और अन्य विदेशी स्रोत मौजूद हैं, लेकिन रूस की हिस्सेदारी भी काफी महत्वपूर्ण रही है। ऐसे में रूस से परमाणु ईंधन से संबंधित कुछ गतिविधियों के लिए अपवाद रखने का प्रावधान अमेरिकी परमाणु क्षेत्र की मौजूदा आपूर्ति व्यवस्था से जुड़ा हुआ है।

भारत और चीन पर टैरिफ का क्या असर पड़ सकता है?

रूस से कच्चे तेल और प्राकृतिक गैस की खरीद करने वाले देशों पर 100 फीसदी तक टैरिफ लगाने की प्रस्तावित व्यवस्था के कारण भारत और चीन का नाम विशेष रूप से सामने आ रहा है। दोनों देश रूस से ऊर्जा खरीदते हैं और इसलिए अमेरिकी कानून में प्रस्तावित प्रावधान उनके लिए महत्वपूर्ण हो सकते हैं।

हालांकि, टैरिफ किस देश पर लगाया जाएगा, कितना लगाया जाएगा और उसका वास्तविक प्रभाव क्या होगा, यह आगे अमेरिकी प्रशासन की ओर से लिए जाने वाले फैसलों पर निर्भर करेगा। मौजूदा प्रावधान राष्ट्रपति को 100 फीसदी तक टैरिफ लगाने का अधिकार देने की बात करता है।

रूस के खिलाफ अमेरिकी नीति में यह विरोधाभास क्यों चर्चा में है?

रूस से तेल और गैस खरीदने वाले देशों पर भारी टैरिफ लगाने का प्रावधान और दूसरी ओर परमाणु ईंधन से जुड़े कुछ रूसी आयातों के लिए अपवाद, दोनों को साथ देखने पर अमेरिकी नीति का अलग-अलग क्षेत्रों में अलग दृष्टिकोण दिखाई देता है। ऊर्जा क्षेत्र में रूस पर आर्थिक दबाव बढ़ाने की कोशिश की जा रही है, जबकि परमाणु क्षेत्र में अमेरिकी जरूरतों को ध्यान में रखते हुए कुछ सीमित रास्ते खुले रखे गए हैं।

इसका प्रमुख आधार अमेरिकी परमाणु ऊर्जा क्षेत्र की आपूर्ति व्यवस्था है। 2025 के आंकड़ों में रूस से मिली 3.284 मिलियन SWU एनरिचमेंट सेवाएं कुल 12.71 मिलियन SWU का करीब 26 फीसदी थीं। यही आंकड़ा बताता है कि परमाणु ईंधन के मामले में रूस के साथ संबंधों को तुरंत पूरी तरह समाप्त करना अमेरिका के लिए ऊर्जा क्षेत्र की तुलना में अलग चुनौती रखता है।

आगे की तस्वीर

रूस के खिलाफ अमेरिकी प्रतिबंध व्यवस्था में ऊर्जा और परमाणु क्षेत्र को लेकर अलग-अलग प्रावधान सामने आए हैं। भारत और चीन जैसे रूस के ऊर्जा खरीदार देशों पर 100 फीसदी तक टैरिफ लगाने का अधिकार प्रस्तावित कानून का अहम हिस्सा है, जबकि रूस से जुड़े कुछ नागरिक परमाणु सहयोग और विशिष्ट यूरेनियम आयात के लिए अपवाद बनाए गए हैं। 2025 में अमेरिकी परमाणु क्षेत्र द्वारा इस्तेमाल की गई एनरिचमेंट सेवाओं में रूस की करीब 26 फीसदी हिस्सेदारी इन प्रावधानों की पृष्ठभूमि को समझने में महत्वपूर्ण आंकड़ा है।