बिहार के वैशाली से आने वाले सुधीर कुमार की सफलता की कहानी आम प्रतियोगी छात्रों से काफी अलग है। जिस दौर में अधिकतर युवा सरकारी नौकरी की तैयारी में घंटों किताबों के बीच समय बिताते हैं, उसी दौर में सुधीर ने पढ़ाई से दूरी बना ली थी। कोटा में इंजीनियरिंग की तैयारी के दौरान प्रतियोगिता के दबाव ने उनका आत्मविश्वास प्रभावित किया और वे मानसिक तनाव से गुजरने लगे। हालात यहां तक पहुंचे कि उन्होंने पढ़ाई लगभग छोड़ दी और मोबाइल पर फिल्में देखने में समय बिताने लगे।
सुधीर ने एक इंटरव्यू में बताया था कि उन्होंने करीब एक साल में 500 से अधिक फिल्में देख डाली थीं। इसका सीधा असर उनकी पढ़ाई और कोचिंग प्रदर्शन पर पड़ा। जहां पहले टेस्ट में उनकी रैंक करीब 15 से 20 के बीच रहती थी, वहीं बाद में यह 80 से 90 तक पहुंच गई। हालांकि, यह दौर उनकी कहानी का अंत नहीं बल्कि एक बड़े बदलाव की शुरुआत साबित हुआ।
साधारण परिवार से निकलकर IIT कानपुर तक पहुंचे सुधीर
सुधीर के माता-पिता दोनों सरकारी सेवा में रहे हैं। उनकी मां ANM के रूप में काम करती थीं, जबकि पिता डाक विभाग में कर्मचारी रहे। स्कूल की पढ़ाई सेंट जोसेफ एकेडमी से पूरी करने के बाद सुधीर ने इंजीनियरिंग को अपना लक्ष्य बनाया। गणित और भौतिकी में उनकी अच्छी पकड़ थी, जिसके चलते उन्होंने IIT-JEE की तैयारी की।
कोटा में मुश्किल दौर से गुजरने के बाद उन्होंने खुद को संभाला और IIT-JEE में सफलता हासिल कर IIT कानपुर में प्रवेश लिया। यहां से उन्होंने सिविल इंजीनियरिंग की डिग्री पूरी की। पढ़ाई पूरी करने के बाद उनके सामने कॉर्पोरेट नौकरी का रास्ता था, लेकिन उन्होंने तत्काल नौकरी करने के बजाय अपने गांव लौटने का फैसला किया।
IIT की डिग्री हाथ में थी, फिर भी गांव लौटकर बच्चों को पढ़ाने लगे
IIT कानपुर से इंजीनियरिंग करने के बावजूद सुधीर ने कॉर्पोरेट सेक्टर की नौकरी नहीं चुनी। वह गांव वापस आए और बच्चों को पढ़ाने लगे। उनके इस फैसले पर आसपास के लोगों और परिचितों की तरफ से सवाल भी उठाए गए कि इतनी बड़ी संस्था से पढ़ाई करने के बाद उन्होंने नौकरी क्यों नहीं की।
इसी दौरान देश में कोरोना महामारी का दौर आया और उनकी कोचिंग का काम भी प्रभावित हो गया। आमदनी का जरिया सीमित हो गया था। परिवार का सहयोग जरूर था, लेकिन सुधीर को अपनी जरूरतों के लिए पैसों की आवश्यकता महसूस होती थी। यहीं से उनके जीवन में एक ऐसा मोड़ आया, जिसने आगे चलकर उनका पूरा करियर बदल दिया।
दोस्तों के साथ पार्टी के लिए चाहिए थे पैसे, ₹50 हजार की बात सुनकर दिया BPSC
सुधीर के मुताबिक, कोविड के दौरान उन्होंने पहली बार BPSC परीक्षा देने के बारे में सोचा। इसकी वजह कोई बड़ा प्रशासनिक लक्ष्य नहीं था। उन्हें जानकारी मिली थी कि परीक्षा पास करने वाले कुछ अभ्यर्थियों को सरकार की ओर से 50 हजार रुपये की प्रोत्साहन राशि मिलती है। दोस्तों के साथ पार्टी के लिए पैसे जुटाने की सोच ने उन्हें परीक्षा देने के लिए प्रेरित किया।
उन्होंने BPSC की प्रारंभिक परीक्षा पास कर ली। बाद में उन्हें पता चला कि बताई गई 50 हजार रुपये की प्रोत्साहन राशि सामान्य वर्ग के अभ्यर्थियों के लिए लागू नहीं थी। यानी जिस इनाम के बारे में सोचकर उन्होंने परीक्षा शुरू की थी, वह उन्हें मिलने वाला नहीं था। लेकिन तब तक यह परीक्षा उनके लिए महज पैसे हासिल करने का जरिया नहीं रही थी।
एक परीक्षा ने बदली पूरी सोच, पहली कोशिश में BPSC में हासिल की पहली रैंक
प्रारंभिक परीक्षा में सफलता मिलने के बाद सुधीर ने BPSC को गंभीरता से लेना शुरू कर दिया। उन्होंने परीक्षा का पाठ्यक्रम समझा, रणनीति तैयार की और मुख्य परीक्षा तथा इंटरव्यू की तैयारी में पूरी ताकत लगा दी। इसका परिणाम भी बेहद चौंकाने वाला रहा।
BPSC की 66वीं प्रतियोगी परीक्षा के परिणाम में सुधीर कुमार ने पहली रैंक हासिल की। वर्ष 2022 में घोषित परिणाम के बाद वह बिहार में अधिकारी बने। उनका चयन DSP पद के लिए हुआ था, लेकिन शारीरिक मानकों से जुड़ी पात्रता के कारण उन्हें स्टेट टैक्स असिस्टेंट कमिश्नर का पद मिला।
BPSC के बाद भी नहीं रुके, UPSC में भी हासिल की सफलता
बिहार में अधिकारी बनने के बाद भी सुधीर ने अपनी पढ़ाई और प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी जारी रखी। उनका लक्ष्य यहीं खत्म नहीं हुआ। उन्होंने UPSC सिविल सेवा परीक्षा की तैयारी की और वर्ष 2023 में इसमें भी सफलता हासिल की।
इसके बाद उनका चयन रेलवे सेवा में अधिकारी के रूप में हुआ। इस तरह जिस युवक ने कभी कोटा में पढ़ाई से दूरी बनाकर एक साल में 500 से ज्यादा फिल्में देखी थीं, वही आगे चलकर BPSC में पहली रैंक हासिल करने और UPSC सिविल सेवा परीक्षा पास करने तक पहुंच गया।
सुधीर कुमार की कहानी में सबसे दिलचस्प मोड़ यह है कि उनकी सरकारी सेवा की शुरुआत किसी बड़े करियर प्लान से नहीं, बल्कि दोस्तों के साथ पार्टी के लिए पैसों की जरूरत और 50 हजार रुपये की प्रोत्साहन राशि के बारे में मिली जानकारी से हुई थी। हालांकि बाद में उन्होंने इस अवसर को गंभीर तैयारी में बदला और यही फैसला उनके करियर का निर्णायक मोड़ बन गया। ![]()
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