पटना। बिहार की राजनीति में चिराग पासवान इन दिनों जिस अंदाज में आगे बढ़ रहे हैं, उसने राजनीतिक गलियारों में कई नए सवाल खड़े कर दिए हैं। एनडीए के साथ होने के बावजूद उनके हालिया बयानों में विपक्षी नेताओं के प्रति नरम रुख नजर आ रहा है। कभी वह लालू प्रसाद यादव की तारीफ करते हैं तो कभी प्रशांत किशोर की राजनीतिक सोच और विकास के एजेंडे की सराहना करते दिखाई देते हैं। यही बदलता तेवर अब बिहार की सियासत में चर्चा का बड़ा विषय बन गया है।
चिराग पासवान के इस रुख को महज संयोग माना जाए या इसके पीछे कोई लंबी रणनीति तैयार हो रही है? सवाल इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि उनके पिता और लोक जनशक्ति पार्टी के संस्थापक रामविलास पासवान की राजनीति भी गठबंधन बदलने और सत्ता के समीकरणों में अपनी भूमिका मजबूत रखने के लिए जानी जाती थी। ऐसे में चिराग के मौजूदा कदमों को उसी राजनीतिक विरासत से जोड़कर देखा जा रहा है।
जिस लालू के 'जंगलराज' पर बरसते थे, अब उन्हीं की तारीफ क्यों?
चिराग पासवान ने अपने राजनीतिक सफर के शुरुआती दौर में लालू प्रसाद यादव और उनके शासनकाल को लेकर काफी आक्रामक रुख अपनाया था। बिहार में 'जंगलराज' का मुद्दा उठाकर उन्होंने राजद और लालू परिवार की राजनीति पर निशाना साधा था। उस दौर में लालू विरोधी राजनीति चिराग के लिए एक मजबूत राजनीतिक हथियार भी बनी।
लेकिन अब परिस्थितियां बदली हुई नजर आ रही हैं। हाल में चिराग पासवान ने लालू प्रसाद यादव को लेकर बेहद सकारात्मक टिप्पणी की। उन्होंने लालू को 'महापुरुष' बताते हुए उनकी प्रतिमा राजधानी के किसी प्रमुख चौक-चौराहे पर लगाए जाने की बात कही। चिराग के इस बयान ने इसलिए भी लोगों का ध्यान खींचा क्योंकि कभी वही चिराग लालू की राजनीति के मुखर आलोचक माने जाते थे।
हालांकि चिराग पासवान ने लालू परिवार के साथ अपने पुराने व्यक्तिगत रिश्तों का भी जिक्र किया है। उनका कहना है कि राजनीतिक मतभेद अपनी जगह रहे हैं, लेकिन उनके परिवार के साथ व्यक्तिगत और पारिवारिक संबंध हमेशा अच्छे रहे हैं। यही वजह है कि वह लालू प्रसाद के राजनीतिक योगदान और व्यक्तिगत रिश्तों को अलग-अलग नजरिए से देखते हैं।
प्रशांत किशोर पर भी दोहरा रुख, पहले हमला फिर तारीफ
चिराग पासवान के बदलते राजनीतिक तेवर का दूसरा उदाहरण प्रशांत किशोर को लेकर उनके बयान हैं। बांकीपुर विधानसभा उपचुनाव के दौरान चिराग ने जन सुराज और प्रशांत किशोर के दावों पर सवाल उठाए थे। उन्होंने जन सुराज के वादों को हवा-हवाई बताया था और मतदाताओं से जमीनी विकास को प्राथमिकता देने की अपील की थी।
लेकिन बाद में प्रशांत किशोर की राजनीतिक सोच को लेकर चिराग का रुख काफी नरम दिखाई दिया। उन्होंने उनकी उस सोच की तारीफ की, जिसमें जाति और धर्म से आगे बढ़कर शिक्षा, रोजगार और बिहार के विकास जैसे मुद्दों पर जोर देने की बात कही जाती है।
यानी एक तरफ चिराग प्रशांत किशोर के राजनीतिक दावों की आलोचना करते हैं और दूसरी तरफ उनकी सोच की तारीफ भी करते हैं। यही विरोधाभास अब इस सवाल को जन्म दे रहा है कि क्या चिराग भविष्य की राजनीति में किसी भी संभावना को पूरी तरह बंद नहीं करना चाहते?
NDA में रहते हुए विपक्षी नेताओं की तारीफ, आखिर संकेत क्या है?
चिराग पासवान इस समय एनडीए का हिस्सा हैं और केंद्र सरकार में मंत्री की जिम्मेदारी भी संभाल रहे हैं। इसके बावजूद उनके हालिया बयान किसी एक राजनीतिक धड़े तक सीमित नहीं दिख रहे। वह जहां एनडीए के साथ हैं, वहीं दूसरी तरफ विपक्ष के बड़े नेताओं और संभावित राजनीतिक प्रतिद्वंद्वियों को लेकर भी पूरी तरह तल्ख नजर नहीं आ रहे।
बिहार की राजनीति में इस तरह का संतुलन कई मायनों में महत्वपूर्ण माना जाता है। राज्य की राजनीति में गठबंधन और सत्ता के समीकरण अक्सर बदलते रहे हैं। ऐसे में छोटी लेकिन प्रभावशाली राजनीतिक ताकतें चुनाव के बाद सरकार बनाने में निर्णायक भूमिका निभा सकती हैं। चिराग की मौजूदा रणनीति को इसी संभावित स्थिति से जोड़कर देखा जा रहा है।
क्या पिता रामविलास पासवान की पुरानी रणनीति दोहरा रहे हैं चिराग?
रामविलास पासवान भारतीय राजनीति के उन नेताओं में गिने जाते थे जिन्होंने बदलते राजनीतिक समीकरणों के बीच अपनी पार्टी की उपयोगिता बनाए रखी। उन्होंने अलग-अलग दौर में अलग-अलग गठबंधनों के साथ सत्ता में भागीदारी की। अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व वाली सरकार में मंत्री रहने के बाद 2002 के गुजरात दंगों के मुद्दे पर उन्होंने एनडीए से दूरी बनाई और बाद में कांग्रेस नेतृत्व वाली यूपीए सरकार का हिस्सा बने।
रामविलास पासवान की राजनीति का एक अहम पहलू यह भी था कि वह सत्ता के समीकरणों में अपनी पार्टी की भूमिका को महत्वपूर्ण बनाए रखने में सफल रहे। अब चिराग पासवान के मौजूदा बयानों को देखकर सवाल उठ रहा है कि क्या वह भी भविष्य के लिए सभी राजनीतिक विकल्प खुले रखना चाहते हैं।
2030 के लिए अभी से बिसात? 'अपने दम पर सरकार' वाले बयान ने बढ़ाई हलचल
चिराग पासवान की पार्टी के मंच से बिहार में भविष्य की राजनीति को लेकर ऐसे संकेत भी दिए गए हैं, जिन्होंने इस चर्चा को और हवा दी है। लोजपा (रामविलास) के पूर्व प्रदेश अध्यक्ष और राष्ट्रीय महासचिव राजू तिवारी की ओर से पार्टी के दम पर सरकार बनाने की बात कही गई है।
पार्टी के मंच से जब 'अपने दम पर सरकार' की संभावना की बात सामने आती है और उसी दौर में चिराग अलग-अलग राजनीतिक विचारधाराओं से जुड़े नेताओं को लेकर सकारात्मक टिप्पणी करते हैं, तो इसे महज बयान मानना मुश्किल हो जाता है। हालांकि पार्टी की वास्तविक रणनीति क्या है, इसका खुलासा अभी साफ तौर पर नहीं हुआ है।
चिराग की 'न काहू से दोस्ती, न काहू से बैर' वाली राजनीति का असली लक्ष्य क्या?
चिराग पासवान की मौजूदा राजनीति को देखकर सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या वह अभी से भविष्य के लिए राजनीतिक जमीन तैयार कर रहे हैं। एनडीए में रहते हुए विपक्षी नेताओं की तारीफ, प्रशांत किशोर की सोच की सराहना और अपनी पार्टी को भविष्य में अपने दम पर खड़ा करने की बात—इन सभी घटनाओं को एक साथ देखा जाए तो तस्वीर काफी दिलचस्प नजर आती है।
हालांकि यह कहना अभी जल्दबाजी होगी कि चिराग पासवान वास्तव में गठबंधन की राजनीति से अलग कोई बड़ा कदम उठाने की तैयारी कर रहे हैं। लेकिन इतना जरूर है कि उनके बदले हुए तेवर ने बिहार की राजनीति में संभावनाओं की नई चर्चा शुरू कर दी है। अब नजर इस बात पर रहेगी कि चिराग आने वाले समय में एनडीए के साथ मजबूती से खड़े रहते हैं या पिता रामविलास पासवान की तरह बदलते राजनीतिक समीकरणों के बीच अपनी पार्टी के लिए कोई अलग रास्ता तैयार करते हैं।
