नई दिल्ली। कांग्रेस सांसद शशि थरूर ने कॉकरोच जनता पार्टी (सीजेपी) के उभार और उससे जुड़े युवा आंदोलन की सराहना की है। इंडियन एक्सप्रेस के लिए लिखे अपने लेख में थरूर ने इस घटनाक्रम को भारतीय राजनीति में उभरते बदलाव का संकेत बताया। उन्होंने कहा कि युवाओं को अपनी बात रखने के लिए एक ऐसा मंच मिला है, जो पारंपरिक राजनीतिक ढांचे से अलग है। थरूर ने विपक्षी दलों को भी युवाओं के मुद्दों और बदलती राजनीतिक शैली को गंभीरता से लेने की सलाह दी है।
उपचुनाव और युवा आंदोलनों को थरूर ने माना बड़ा संकेत
शशि थरूर के मुताबिक, हाल में संपन्न बांकीपुर और दतिया उपचुनावों के परिणाम तथा देश के अलग-अलग हिस्सों में युवाओं के बढ़ते विरोध प्रदर्शनों ने राजनीति की संभावित दिशा को लेकर नया संकेत दिया है। उनके अनुसार, जिस सत्ताधारी दल को अब तक राजनीतिक रूप से मजबूत माना जाता रहा है, उसके सामने हिंदी भाषी राज्यों में अपनी चुनावी रणनीति पर दोबारा विचार करने की चुनौती खड़ी हो सकती है।
थरूर ने अपने लेख में इस बदलाव को किसी पारंपरिक राजनीतिक दल की चुनौती के बजाय असंतुष्ट जेन-जी यानी युवा पीढ़ी से जुड़े आंदोलन के रूप में प्रस्तुत किया है। उनके मुताबिक, युवाओं के बीच रोजगार, प्रतियोगी परीक्षाओं और भर्ती प्रक्रिया से जुड़े सवालों ने राजनीतिक असंतोष को एक नया रूप दिया है।
एक तंज से शुरू हुआ ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ अभियान
थरूर ने कॉकरोच जनता पार्टी यानी सीजेपी के उभार का जिक्र करते हुए कहा कि यह आंदोलन किसी जातिगत समीकरण, सांप्रदायिक लामबंदी या पारंपरिक चुनावी रणनीति का परिणाम नहीं था। उनके लेख के अनुसार, कथित तौर पर बेरोजगारी के खिलाफ आवाज उठा रहे युवाओं और सोशल मीडिया कार्यकर्ताओं को लेकर की गई एक टिप्पणी के बाद युवाओं के बीच नाराजगी बढ़ी।
इसी नाराजगी ने आगे चलकर ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ नाम के व्यंग्यात्मक डिजिटल अभियान का रूप लिया। थरूर के मुताबिक, सोशल मीडिया पर शुरू हुआ यह अभियान धीरे-धीरे व्यापक आंदोलन में बदल गया और प्रतियोगी परीक्षाओं में कथित अनियमितताओं, परीक्षा रद्द होने तथा रोजगार की अनिश्चितता से परेशान युवाओं को अपनी बात रखने का मंच मिला।
युवाओं की समस्याओं ने आंदोलन को दिया आधार
थरूर के लेख में कहा गया है कि युवाओं का यह आंदोलन केवल किसी एक राजनीतिक या वैचारिक मुद्दे तक सीमित नहीं रहा। प्रतियोगी परीक्षाओं से जुड़े सवाल, भर्ती प्रक्रियाओं में देरी और रोजगार की अनिश्चितता जैसे मुद्दों ने बड़ी संख्या में युवाओं को प्रभावित किया।
उनके मुताबिक, इसी वजह से सीजेपी से जुड़ा अभियान युवाओं के बीच चर्चा का विषय बना। थरूर ने इसे पारंपरिक राजनीतिक संगठनों से अलग बताया, जहां निर्णय लेने की प्रक्रिया अक्सर पार्टी नेतृत्व और स्थापित ढांचे के आसपास केंद्रित रहती है।
मुख्यधारा की विपक्षी राजनीति पर भी उठाए सवाल
शशि थरूर ने अपने लेख में मुख्यधारा के विपक्षी दलों की रणनीति की सीमाओं का भी उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि लंबे समय से विपक्षी पार्टियां जातिगत समीकरणों और संवैधानिक मुद्दों के इर्द-गिर्द अपनी राजनीति केंद्रित करती रही हैं। उनके अनुसार, ये विषय महत्वपूर्ण हैं, लेकिन युवाओं की रोजमर्रा की समस्याओं को लेकर राजनीतिक दलों का हस्तक्षेप उतना प्रभावी नहीं रहा है।
थरूर ने कोचिंग संस्थानों से जुड़ी समस्याओं, भर्ती प्रक्रियाओं में देरी और प्रशासनिक स्तर पर होने वाली कथित उपेक्षा जैसे मुद्दों का उल्लेख किया। उनके अनुसार, युवाओं के बीच राजनीतिक जुड़ाव बढ़ाने के लिए इन प्रत्यक्ष समस्याओं पर ज्यादा ध्यान देना जरूरी है।
सीजेपी की सफलता में क्या देखकर प्रभावित हुए थरूर?
थरूर के मुताबिक, सीजेपी से जुड़े अभियान की सफलता का एक प्रमुख कारण इसकी सहजता और जमीनी जुड़ाव है। उन्होंने कहा कि जब मुख्यधारा के राजनीतिक नेता युवाओं के मुद्दे उठाते हैं तो कई बार उसे राजनीतिक अवसरवाद के रूप में देखा जाता है। इसके विपरीत सीजेपी ने बिना पारंपरिक पार्टी ढांचे के युवाओं की सामूहिक आवाज बनने की कोशिश की।
थरूर ने इंटरनेट संस्कृति, मीम्स और सांस्कृतिक संवाद को भी इस आंदोलन की ताकत के तौर पर रेखांकित किया। उनके अनुसार, इन माध्यमों ने युवाओं को केवल समर्थक या भीड़ का हिस्सा बनने के बजाय राजनीतिक संवाद में सीधे भाग लेने का अवसर दिया।
पारंपरिक दलों के लिए थरूर का बड़ा संदेश
कांग्रेस सांसद ने राजनीतिक दलों के पारंपरिक शीर्ष-से-नीचे ढांचे और वंशवाद की संस्कृति को युवाओं की भागीदारी के रास्ते में एक बाधा बताया। उनके मुताबिक, कई राजनीतिक संगठनों में युवा कार्यकर्ताओं की भूमिका रैलियों में भीड़ जुटाने या वरिष्ठ नेताओं के प्रचार तक सीमित रह जाती है।
थरूर का मानना है कि यदि राजनीतिक दल युवा असंतोष को स्थायी राजनीतिक विकल्प में बदलना चाहते हैं तो उन्हें अपनी कार्यशैली में व्यापक बदलाव करना होगा। इसके लिए पार्टी संगठन में ऐसे युवाओं को भी निर्णय लेने की प्रक्रिया में जगह देने की जरूरत होगी, जिनकी कोई पारंपरिक राजनीतिक पृष्ठभूमि नहीं है।
परीक्षा धांधली और रोजगार जैसे मुद्दे बनें प्राथमिकता
थरूर ने राजनीतिक दलों के लिए कुछ प्रत्यक्ष मुद्दों को प्राथमिकता देने की जरूरत बताई। उनके लेख के अनुसार, केवल व्यापक और अमूर्त राजनीतिक नारों के बजाय परीक्षा में धांधली के खिलाफ कड़े कानून, समयबद्ध भर्ती प्रक्रिया और गिग वर्कर्स के लिए सुरक्षा जैसे मुद्दों पर ठोस राजनीतिक एजेंडा तैयार किया जाना चाहिए।
उनका कहना है कि युवाओं की समस्याओं पर स्पष्ट नीतिगत जवाब देने से राजनीतिक दलों और युवा मतदाताओं के बीच भरोसा मजबूत हो सकता है। इसके लिए केवल चुनाव के समय युवाओं से संपर्क करने के बजाय लगातार संवाद कायम करना जरूरी है।
युवाओं से उनकी भाषा में संवाद की जरूरत
शशि थरूर ने पारंपरिक और लंबे राजनीतिक भाषणों की जगह युवाओं की भाषा में सीधा और प्रामाणिक संवाद स्थापित करने पर जोर दिया। उन्होंने राहुल गांधी और अखिलेश यादव जैसे नेताओं के हाल के प्रयासों को बदलती राजनीतिक संवाद शैली से जोड़कर देखा।
थरूर के अनुसार, इंटरनेट और सोशल मीडिया के दौर में युवा राजनीतिक संदेशों को पहले की तुलना में अलग तरीके से देखते और समझते हैं। ऐसे में राजनीतिक दलों को भी संवाद के नए माध्यमों और युवाओं की भाषा के अनुरूप अपनी शैली विकसित करनी होगी।
क्या बदल रही है युवाओं की राजनीतिक सोच?
थरूर के लेख का मूल संदेश यही है कि भारत की युवा आबादी राजनीति से दूर नहीं हुई है। इसके बजाय वह अपनी समस्याओं और असंतोष को सामने रखने के लिए ऐसे मंच की तलाश में है, जहां उसकी बात सीधे और सम्मान के साथ सुनी जाए।
सीजेपी से जुड़े आंदोलन को थरूर ने इसी बदलती राजनीतिक चेतना के एक उदाहरण के तौर पर पेश किया है। उनके मुताबिक, यदि स्थापित राजनीतिक दल समय रहते युवाओं की बदलती अपेक्षाओं और राजनीतिक भागीदारी के नए तरीकों को नहीं समझ पाए तो उनके और युवा मतदाताओं के बीच दूरी बढ़ सकती है।
