erere | Source: ererनई दिल्ली। देश में लगातार बढ़ती भीषण गर्मी और लू के खतरे के बीच केंद्र सरकार ने बड़ा और महत्वपूर्ण फैसला लिया है। सरकार ने लू यानी हीटवेव और बिजली गिरने की घटना को अधिसूचित प्राकृतिक आपदा की श्रेणी में शामिल कर दिया है। इसके साथ ही देश में अधिसूचित प्राकृतिक आपदाओं की संख्या 12 से बढ़कर 14 हो गई है। इस फैसले का सबसे बड़ा असर उन राज्यों और स्थानीय प्रशासन की क्षमता पर पड़ सकता है, जो हर साल गर्मी के दौरान लोगों को राहत पहुंचाने के लिए बड़े स्तर पर इंतजाम करते हैं।

केंद्र के इस निर्णय के बाद लू से निपटने के लिए राज्य सरकारें स्टेट डिजास्टर रिस्पॉन्स फंड यानी एसडीआरएफ और स्टेट डिजास्टर मिटिगेशन फंड यानी एसडीएमएफ का इस्तेमाल कर सकेंगी। इसका उद्देश्य केवल आपदा आने के बाद राहत पहुंचाना नहीं, बल्कि गर्मी के खतरे को कम करने के लिए पहले से स्थायी और स्थानीय स्तर के उपायों को मजबूत करना भी है।

12 से बढ़कर 14 हुई प्राकृतिक आपदाओं की सूची

4 अगस्त को लू और बिजली गिरने की घटना को अधिसूचित प्राकृतिक आपदा के रूप में शामिल किया गया। इससे पहले केंद्र की अधिसूचित प्राकृतिक आपदाओं की सूची में भूकंप, बाढ़, सूखा, सुनामी, चक्रवात या तूफान, भूस्खलन, कीड़ों का हमला, जंगल की आग, हिमस्खलन, शीतलहर या पाला, बादल फटना और ओलावृष्टि जैसी आपदाएं शामिल थीं।

लू और बिजली गिरने को सूची में शामिल किए जाने के बाद अब अधिसूचित प्राकृतिक आपदाओं की संख्या 14 हो गई है। शमन कोष के दिशा-निर्देशों में वर्ष 2024 में किए गए संशोधन के बाद इस कदम से लू को भारत की आपदा वित्त व्यवस्था के दायरे में लाया गया है।

इससे पहले जून 2026 में गृह मंत्रालय ने वर्ष 2026 से 2031 की अवधि के लिए राज्य आपदा प्रतिक्रिया कोष और राष्ट्रीय आपदा प्रतिक्रिया कोष से संबंधित नए परिचालन दिशा-निर्देश भी जारी किए थे।

अब गर्मी से राहत के लिए आपदा कोष का इस्तेमाल संभव

राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण के प्रमुख कृष्ण एस. वत्सा ने केंद्र के फैसले का स्वागत किया है। उन्होंने कहा कि हाल के वर्षों में लू एक गंभीर खतरे के रूप में उभरी है और इससे निपटने के लिए लंबे समय की योजना तथा पर्याप्त संसाधनों की जरूरत है।

कृष्ण एस. वत्सा के अनुसार, लू और बिजली गिरने को आपदा के रूप में अधिसूचित किए जाने के बाद राज्य सरकारें इनसे निपटने और इनके प्रभाव को कम करने के लिए स्टेट डिजास्टर रिस्पॉन्स फंड तथा स्टेट डिजास्टर मिटिगेशन फंड का इस्तेमाल कर सकेंगी।

उन्होंने कहा कि इन समस्याओं में हाल के समय में तेजी आई है। ऐसे में सभी स्तरों पर सरकारों के लिए पर्याप्त संसाधनों के साथ दीर्घकालिक समाधान तैयार करना जरूरी है। उनके मुताबिक यह ऐसा कदम हो सकता है जिसका लंबे समय तक सकारात्मक प्रभाव देखने को मिले।

कूलिंग शेल्टर से लेकर पानी के केंद्र तक हो सकेंगे विकसित

लू को प्राकृतिक आपदा का दर्जा मिलने के बाद स्थानीय स्तर पर गर्मी से बचाव के उपायों को वित्तीय मदद मिलने का रास्ता आसान हो सकता है। कृष्ण एस. वत्सा ने बताया कि सरकारी फंड का इस्तेमाल हीट एक्शन प्लान लागू करने में किया जा सकता है।

यदि कोई शहर, शहरी आपदा प्रबंधन प्राधिकरण या नगर निगम गर्मी से राहत देने के लिए कूलिंग शेल्टर बनाना चाहता है, सार्वजनिक स्थानों पर अधिक पानी के केंद्र स्थापित करना चाहता है या गर्मी से राहत देने वाली अन्य सुविधाओं को मजबूत करना चाहता है, तो इन संसाधनों का इस्तेमाल ऐसे कार्यों में किया जा सकता है।

उन्होंने बताया कि सरकार की ओर से मिलने वाली राशि शुरुआती पूंजी यानी सीड मनी की तरह काम कर सकती है। इसके आधार पर शहर और स्थानीय प्रशासन नागरिकों, कॉरपोरेट सोशल रिस्पॉन्सिबिलिटी यानी सीएसआर तथा अन्य योजनाओं से अतिरिक्त धन जुटाने की दिशा में आगे बढ़ सकते हैं।

हीट एक्शन प्लान को मिलेगा ज्यादा समर्थन

लू से होने वाले नुकसान को कम करने के लिए कई शहरों और स्थानीय प्रशासन की ओर से हीट एक्शन प्लान तैयार किए जाते हैं। इनमें गर्मी के दौरान लोगों को चेतावनी देने, संवेदनशील आबादी की पहचान करने और राहत के इंतजाम करने जैसे उपाय शामिल होते हैं।

कृष्ण एस. वत्सा ने कहा कि जिला प्रशासन और नगर निगम स्थानीय स्तर पर हीट एक्शन प्लान लागू करने तथा संसाधनों के इस्तेमाल और निवेश की प्राथमिकताएं तय करने के लिए जिम्मेदार होंगे। उन्होंने उम्मीद जताई कि आने वाले पांच वर्षों में अधिक संख्या में हीट एक्शन प्लान और स्थानीय स्तर पर गर्मी से बचाव के उपाय लागू किए जा सकेंगे।

गरीबों और खुले में काम करने वाले मजदूरों को बड़ी राहत की उम्मीद

लू का सबसे गंभीर असर अक्सर उन लोगों पर पड़ता है जिन्हें गर्मी के दौरान भी खुले स्थानों पर काम करना पड़ता है। इनमें दिहाड़ी मजदूर, असंगठित क्षेत्र के कामगार, राहगीर और अत्यंत गरीब वर्ग के लोग शामिल हैं। ऐसे लोगों के लिए पानी, छांव और ठंडक वाली सुविधाओं की उपलब्धता बेहद महत्वपूर्ण हो जाती है।

केंद्र के फैसले के बाद उपलब्ध आपदा वित्तीय संसाधनों का इस्तेमाल ऐसे स्थानीय उपायों को मजबूत करने में किया जा सकता है। इससे उन इलाकों में राहत व्यवस्था विकसित करने में मदद मिल सकती है जहां गर्मी का असर अधिक होता है और लोगों के पास उससे बचने के सीमित साधन होते हैं।

पहले राज्यों के पास थी वित्तीय सीमा

काउंसिल ऑन एनर्जी, एनवायरनमेंट एंड वाटर के संस्थापक और मुख्य कार्यकारी अधिकारी अरुणाभ घोष ने इस फैसले के वित्तीय महत्व को रेखांकित किया। उन्होंने बताया कि पहले राज्य अपने स्तर पर लू को आपदा घोषित कर सकते थे, लेकिन ऐसी स्थिति में वे स्टेट डिजास्टर रिस्पॉन्स फंड के केवल 10 प्रतिशत और स्टेट डिजास्टर मिटिगेशन फंड के केवल 20 प्रतिशत हिस्से का इस्तेमाल कर पाते थे।

उनके अनुसार, केंद्र की नई अधिसूचना से इस वित्तीय सीमा और इससे जुड़ी नीतिगत अस्पष्टता को समाप्त करने में मदद मिलेगी। इससे गर्मी से निपटने के लिए राज्यों और स्थानीय प्रशासन के पास उपलब्ध वित्तीय विकल्प पहले की तुलना में व्यापक हो सकते हैं।

स्वास्थ्य व्यवस्था को मजबूत करने पर भी जोर

एम्स दिल्ली के चिकित्सक डॉ. हर्षल रमेश साल्वे ने गर्मी से होने वाली स्वास्थ्य समस्याओं को लेकर प्राथमिक स्तर पर तैयारी को महत्वपूर्ण बताया। उनके अनुसार, हीटवेव के प्रभाव को रोकना और उसका इलाज करना बेहद कठिन नहीं है, लेकिन इसके लिए प्राथमिकता तय करने और संवेदनशील लोगों की पहचान करने की जरूरत है।

उन्होंने यह भी कहा कि बीमारी के कारण गरीब परिवारों पर पड़ने वाले भारी खर्च को कम करने के लिए सरकारी पुनर्वास और वित्तीय सहायता उपलब्ध कराई जाए तो इससे देश की आर्थिक और स्वास्थ्य व्यवस्था दोनों को मजबूती मिल सकती है।

आपदा घोषित होने से कई विभागों के बीच बेहतर तालमेल की उम्मीद

नेचुरल रिसोर्सेज डिफेंस काउंसिल से जुड़े अभियंत तिवारी ने इस फैसले की तुलना कोविड-19 महामारी के दौरान विभिन्न स्तरों पर बने समन्वय से की। उनके अनुसार, किसी खतरे को आपदा घोषित किए जाने से अलग-अलग सरकारी प्रणालियों के बीच बेहतर तालमेल के साथ काम करने का आधार तैयार होता है।

उन्होंने कहा कि यह अधिसूचना हीट एक्शन प्लान को राष्ट्रीय स्तर पर नीतिगत, कानूनी और वित्तीय मजबूती दे सकती है। इसमें एसडीआरएफ, एनडीआरएफ, एसडीएमएफ और एनडीएमएफ जैसे आपदा वित्तीय तंत्र की भूमिका महत्वपूर्ण हो सकती है।

तेजी से बढ़ते तापमान के बीच क्यों महत्वपूर्ण है यह फैसला?

भारत में एक तरफ तेजी से शहरीकरण और निर्माण गतिविधियां बढ़ रही हैं, वहीं बड़ी संख्या में कामगार खुले स्थानों पर काम करते हैं। ऐसे में अत्यधिक गर्मी और लू का असर कामगारों के स्वास्थ्य और रोजमर्रा की जिंदगी पर पड़ सकता है।

लू को अधिसूचित प्राकृतिक आपदा का दर्जा मिलने के बाद स्थानीय प्रशासन के पास गर्मी से बचाव के उपायों के लिए संसाधन जुटाने का एक औपचारिक रास्ता उपलब्ध होगा। कूलिंग शेल्टर, पेयजल केंद्र, छांव और सार्वजनिक स्थानों पर गर्मी से राहत देने वाली सुविधाओं जैसे उपायों को हीट एक्शन प्लान के साथ जोड़ा जा सकता है।

अगले पांच साल में स्थानीय स्तर पर बढ़ सकते हैं गर्मी से बचाव के इंतजाम

कृष्ण एस. वत्सा ने उम्मीद जताई है कि इस फैसले के बाद आने वाले पांच वर्षों में अधिक संख्या में हीट एक्शन प्लान तैयार और लागू किए जा सकते हैं। साथ ही स्थानीय स्तर पर गर्मी से बचाव के उपायों को बढ़ावा मिल सकता है।

इस फैसले से राज्य सरकारों और स्थानीय निकायों को लू तथा बिजली गिरने जैसी घटनाओं से निपटने के लिए आपदा प्रबंधन के मौजूदा ढांचे का इस्तेमाल करने का अवसर मिलेगा। इससे आपदा के बाद राहत के साथ-साथ पहले से तैयारी करने और नुकसान कम करने पर भी जोर दिया जा सकेगा।