erer | Source: ererलखनऊ | उत्तर प्रदेश के आगामी विधानसभा चुनावों को ध्यान में रखते हुए बहुजन समाज पार्टी (BSP) की सुप्रीमो मायावती ने एक ऐसा बड़ा और चौंकाने वाला फैसला लिया है, जिसने राजनीतिक गलियारों में हलचल पैदा कर दी है। पार्टी ने अपने सबसे भरोसेमंद और वफादार रणनीतिकारों में शुमार पूर्व राज्यसभा सांसद राजाराम को बसपा का नया राष्ट्रीय कोऑर्डिनेटर नियुक्त कर दिया है। मायावती के इस कदम से साफ हो गया है कि पार्टी अब पूरी तरह से पुराने और अनुभवी चेहरों पर दांव खेलकर संगठन को मजबूत करने की रणनीति पर उतर आई है।

ईशान आनंद को दी गई थी जिम्मेदारी, राजaram को बनाया गया था गुरु

बीते दिनों बसपा में हुए बड़े संगठनात्मक बदलावों के तहत मायावती ने अपने भतीजे ईशान आनंद को पार्टी का नया राष्ट्रीय कोऑर्डिनेटर घोषित किया था। उस दौरान पार्टी की तरफ से यह निर्देश दिए गए थे कि युवा नेता ईशान आनंद पार्टी की नीतियों, कार्यशैली और कैडर की बारीकियों को वरिष्ठ नेता राजाराम से सीखेंगे और समझेंगे। अब पार्टी ने खुद राजाराम को राष्ट्रीय स्तर की सबसे बड़ी जिम्मेदारी सौंप दी है, ताकि देश भर में पार्टी की गतिविधियों और सांगठनिक ढांचे के बीच बेहतर तालमेल बिठाया जा सके।

चार राज्यों के प्रभारी से लेकर राष्ट्रीय कमान तक का सफर

संगठन में लंबा अनुभव रखने वाले राजाराम लंबे समय से बसपा के मुख्य रणनीतिकारों में शामिल रहे हैं। इसी साल पार्टी ने उन पर भरोसा जताते हुए मध्य प्रदेश, केरल, गुजरात और कर्नाटक जैसे अहम राज्यों का अतिरिक्त प्रभार सौंपा था। उनकी ग्राउंड लेवल की पकड़ और सांगठनिक अनुशासन को देखते हुए अब उन्हें सीधे तौर पर राष्ट्रीय कोऑर्डिनेटर का पद सौंप दिया गया है। राजनीतिक जानकारों का मानना है कि 2027 के यूपी चुनाव से पहले यह बसपा का एक बहुत बड़ा और सधा हुआ दांव है।

संसद से लेकर जमीन तक मजबूत पकड़ रखते हैं राजाराम

उत्तर प्रदेश के आजमगढ़ से ताल्लुक रखने वाले राजाराम पार्टी के बेहद अनुशासित और वफादार नेताओं में गिने जाते हैं। वह उत्तर प्रदेश से दो बार राज्यसभा सदस्य रह चुके हैं, जहां उनका दूसरा कार्यकाल 2014 से 2020 तक रहा था। संसदीय मामलों और बैठकों में उनकी सक्रियता हमेशा से उच्च स्तर की रही है। बहुजन मूवमेंट और कैडर की गहरी समझ रखने की वजह से उन्हें पार्टी के भीतर संकटमोचक माना जाता है।

क्या मायावती की यह रणनीति दिला पाएगी बसपा को खोई हुई जमीन?

लगातार हो रहे संगठनात्मक फेरबदल के बीच मायावती का यह निर्णय इस बात का साफ संकेत है कि पार्टी इस बार चुनाव में किसी भी तरह की चूक नहीं करना चाहती है। परिवार और युवा चेहरों को आगे बढ़ाने के साथ-साथ पार्टी के पुराने दिग्गजों पर भरोसा जताना यह बताता है कि बसपा आगामी सियासी समर के लिए पूरी ताकत झोंकने को तैयार है।

क्या आपको लगता है कि मायावती का यह पुराना और अनुभवी चेहरों पर भरोसा जताने का दांव 2027 के विधानसभा चुनाव में बसपा की किस्मत बदल पाएगा?