पश्चिम बंगाल की राजनीति इन दिनों अभूतपूर्व उथल-पुथल के दौर से गुजर रही है। विधानसभा चुनाव में तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) को मिली बड़ी हार के बाद पार्टी के भीतर असंतोष खुलकर सामने आने लगा है। एक ओर कई विधायक और सांसद पार्टी नेतृत्व से दूरी बनाते दिखाई दे रहे हैं, वहीं दूसरी ओर पुराने राजनीतिक विरोधी भी इस संकट पर अपनी प्रतिक्रिया दे रहे हैं। इसी बीच आम जनता उन्नयन पार्टी के अध्यक्ष हुमायूं कबीर ने टीएमसी के बागी सांसदों पर तीखा हमला बोलते हुए उन पर जनता के जनादेश के साथ विश्वासघात करने का आरोप लगाया है। उनका कहना है कि जिन सांसदों को जनता ने भाजपा के खिलाफ वोट देकर संसद भेजा था, वे अब यदि अलग गुट बनाकर एनडीए का समर्थन करते हैं तो यह सीधे-सीधे मतदाताओं के साथ धोखा है।टीएमसी की बगावत पर हुमायूं कबीर का हमला | फोटो: हिन्दुस्तान न्यूज वेबसाइट

19 सांसदों की बगावत ने बढ़ाई ममता बनर्जी की मुश्किलें

पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव के बाद टीएमसी में राजनीतिक संकट लगातार गहराता जा रहा है। पार्टी के भीतर असंतोष का दायरा इतना बढ़ गया है कि कई विधायक और सांसद नेतृत्व पर सवाल उठाने लगे हैं। सबसे बड़ी हलचल तब मची जब लोकसभा के 19 सांसदों के एक कथित पत्र की चर्चा सामने आई, जिसमें काकोली घोष दस्तीदार के नेतृत्व में अलग संसदीय समूह को मान्यता देने और भाजपा नीत राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) को समर्थन देने की बात कही गई। हालांकि इस पत्र की आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है, लेकिन इसके सामने आने के बाद बंगाल की राजनीति में नई बहस छिड़ गई। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यदि सांसदों का यह असंतोष संगठित रूप लेता है तो यह टीएमसी के लिए अब तक का सबसे बड़ा आंतरिक संकट साबित हो सकता है।

हुमायूं कबीर ने बागी सांसदों पर साधा निशाना

हुमायूं कबीर ने इस घटनाक्रम पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि लोकतंत्र में जनता का जनादेश सर्वोपरि होता है। उनके अनुसार, जिन नेताओं को जनता ने किसी खास विचारधारा और पार्टी के आधार पर चुना है, उन्हें चुनाव जीतने के बाद अपनी राजनीतिक निष्ठा बदलने का अधिकार नहीं होना चाहिए। उन्होंने कहा कि यदि कोई सांसद भाजपा के विरोध में चुनाव जीतकर संसद पहुंचा है और बाद में एनडीए का समर्थन करने लगता है, तो यह मतदाताओं की भावनाओं और भरोसे के साथ अन्याय है। कबीर ने इसे केवल राजनीतिक फैसला नहीं, बल्कि नैतिकता और जनप्रतिनिधित्व से जुड़ा गंभीर सवाल बताया। उनका कहना है कि जनता ने जिन उम्मीदों के साथ वोट दिया था, उन उम्मीदों को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।

काकोली घोष गुट की चर्चा और बढ़ती राजनीतिक अटकलें

टीएमसी के भीतर उभरे इस संकट का केंद्र काकोली घोष दस्तीदार का नाम भी बनता जा रहा है। चर्चा है कि पार्टी के असंतुष्ट सांसद उनके नेतृत्व में अलग पहचान बनाने की कोशिश कर रहे हैं। कथित पत्र में काकोली घोष, यूसुफ पठान, सायोनी घोष समेत कई सांसदों के हस्ताक्षर होने की बात कही गई है। हालांकि संबंधित नेताओं की ओर से इस विषय पर स्पष्ट और औपचारिक बयान सामने नहीं आया है, लेकिन राजनीतिक गलियारों में यह चर्चा तेज है कि टीएमसी के भीतर नेतृत्व को लेकर गंभीर मतभेद उभर चुके हैं। विधानसभा चुनाव में हार के बाद पार्टी की रणनीति, संगठन और नेतृत्व को लेकर लगातार सवाल उठ रहे हैं, जिसने इस संकट को और गहरा कर दिया है।

ममता बनर्जी के प्रति नरम पड़े हुमायूं कबीर, दिया था सीट छोड़ने का प्रस्ताव

दिलचस्प बात यह है कि कभी ममता बनर्जी के कट्टर विरोधी रहे हुमायूं कबीर हाल के दिनों में उनके प्रति अपेक्षाकृत नरम रुख अपनाते दिखाई दिए हैं। अपनी अलग पार्टी बनाने के बाद भी उन्होंने सार्वजनिक रूप से कहा था कि यदि ममता बनर्जी चाहें तो वह उनके लिए अपनी विधानसभा सीट छोड़ने को तैयार हैं ताकि वह विधानसभा में वापसी कर सकें। कबीर ने दावा किया था कि नंदीग्राम जैसी कठिन सीट की तुलना में रेजीनगर से ममता बनर्जी की जीत अधिक आसान हो सकती है। उनके इस बयान को राजनीतिक हलकों में बड़े संकेत के रूप में देखा गया था। अब जब टीएमसी के भीतर बगावत और टूट की खबरें सामने आ रही हैं, तब हुमायूं कबीर का बागी सांसदों के खिलाफ खुलकर बोलना यह दर्शाता है कि बंगाल की राजनीति में समीकरण तेजी से बदल रहे हैं और आने वाले दिनों में सत्ता तथा विपक्ष दोनों खेमों में नए राजनीतिक गठजोड़ देखने को मिल सकते हैं।