बिहार की महत्वाकांक्षी पटना-पूर्णिया ग्रीनफील्ड एक्सप्रेस-वे परियोजना अब राजनीतिक विवाद के केंद्र में आ गई है। जिस एक्सप्रेस-वे को राज्य के विकास, तेज कनेक्टिविटी और आर्थिक गतिविधियों को बढ़ावा देने वाली बड़ी परियोजना के रूप में देखा जा रहा था, उसी के रूट को लेकर अब गंभीर सवाल उठने लगे हैं। जन सुराज पार्टी ने आरोप लगाया है कि समस्तीपुर जिले के सरायरंजन क्षेत्र में एक्सप्रेस-वे का अलाइनमेंट तकनीकी जरूरतों के बजाय प्रभावशाली लोगों के हितों को ध्यान में रखकर बदला गया है। पार्टी ने इस मुद्दे पर प्रेस कॉन्फ्रेंस कर राज्य सरकार से 10 सवाल पूछे हैं और पूरे मामले में पारदर्शिता की मांग की है। दूसरी ओर बिहार सरकार और पथ निर्माण विभाग इन आरोपों को भ्रामक और तथ्यहीन बता रहे हैं।
पटना-पूर्णिया एक्सप्रेस-वे रूट विवाद पर सियासत तेज
क्या किसी खास व्यक्ति को बचाने के लिए बदला गया रूट?
विवाद की जड़ सरायरंजन क्षेत्र में प्रस्तावित एक्सप्रेस-वे का रूट है। स्थानीय लोगों और कुछ प्रभावित परिवारों का आरोप है कि मूल योजना में एक्सप्रेस-वे का मार्ग अलग था, लेकिन बाद में उसमें बदलाव किया गया। आरोप यह भी है कि एक प्रभावशाली व्यक्ति की करीब 10.5 बीघा जमीन परियोजना की जद में आ रही थी, जिसके बाद रूट को मोड़ दिया गया। स्थानीय लोगों का कहना है कि इस बदलाव का असर अब सैकड़ों आम परिवारों पर पड़ रहा है। उनका दावा है कि नए रूट की वजह से सात गांव प्रभावित हो रहे हैं, 150 से अधिक मकान और दुकानें अधिग्रहण की जद में आ गई हैं, जबकि एक कॉलेज का हिस्सा भी प्रभावित हो सकता है। यही वजह है कि परियोजना के खिलाफ स्थानीय स्तर पर असंतोष बढ़ता जा रहा है।
जन सुराज ने सरकार से मांगा जवाब
प्रशांत किशोर की पार्टी जन सुराज ने इस मामले को बड़ा राजनीतिक मुद्दा बना दिया है। पार्टी का कहना है कि यदि रूट में कोई बदलाव नहीं हुआ है तो सरकार को मूल डीपीआर (Detailed Project Report), प्रारंभिक अलाइनमेंट और अंतिम स्वीकृत अलाइनमेंट सार्वजनिक करना चाहिए। जन सुराज ने यह भी सवाल उठाया है कि प्रभावित लोगों की आपत्तियों पर कितनी सुनवाई हुई और क्या सरकार स्वतंत्र जांच के लिए तैयार है। पार्टी ने मांग की है कि भूमि अधिग्रहण, मुआवजा, पुनर्वास और तकनीकी समिति की रिपोर्ट जैसे दस्तावेज जनता के सामने रखे जाएं ताकि सच्चाई सामने आ सके। जन सुराज का आरोप है कि सरकार विकास परियोजनाओं को जनता के हित में नहीं, बल्कि कुछ खास लोगों के हितों को ध्यान में रखकर आगे बढ़ा रही है।
सरकार का पक्ष: आरोपों को बताया भ्रामक
इन आरोपों के बीच बिहार सरकार और पथ निर्माण विभाग ने अपना पक्ष भी रखा है। विभाग का कहना है कि एक्सप्रेस-वे का रूट पूरी तरह तकनीकी मानकों, भूगोल, यातायात की जरूरतों और इंजीनियरिंग अध्ययन के आधार पर तय किया गया है। सरकार का दावा है कि परियोजना में किसी प्रकार का राजनीतिक हस्तक्षेप या निजी दबाव नहीं है। विभाग ने पहले ही बयान जारी कर कहा था कि रूट बदलने से जुड़ी खबरें और आरोप भ्रामक हैं। हालांकि विपक्ष और स्थानीय लोगों का कहना है कि यदि सरकार के पास छिपाने के लिए कुछ नहीं है तो सभी तकनीकी दस्तावेज सार्वजनिक किए जाने चाहिए। यही मांग अब राजनीतिक बहस का केंद्र बन गई है।
विकास बनाम विस्थापन की पुरानी बहस फिर सामने
पटना-पूर्णिया एक्सप्रेस-वे बिहार की सबसे महत्वपूर्ण बुनियादी ढांचा परियोजनाओं में से एक मानी जा रही है। इसके बनने से राजधानी पटना से सीमांचल क्षेत्र तक की दूरी और यात्रा समय में भारी कमी आने की उम्मीद है। लेकिन हर बड़ी परियोजना की तरह यहां भी विकास और विस्थापन के बीच संतुलन का सवाल खड़ा हो गया है। एक तरफ सरकार इसे आर्थिक विकास और बेहतर कनेक्टिविटी का माध्यम बता रही है, तो दूसरी ओर प्रभावित परिवार अपने घर, जमीन और आजीविका को लेकर चिंतित हैं। ऐसे में अब सबकी नजर इस बात पर टिकी है कि सरकार जन सुराज द्वारा उठाए गए सवालों का क्या जवाब देती है और क्या मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी या संबंधित विभाग इस पूरे विवाद पर विस्तृत स्पष्टीकरण जारी करते हैं। फिलहाल एक्सप्रेस-वे का रूट विकास से ज्यादा राजनीति और पारदर्शिता की बहस का विषय बन गया है।
