मौलाना आजाद नेशनल उर्दू यूनिवर्सिटी, हैदराबाद का परिसर शनिवार शाम एक आंदोलन का केंद्र बन गया, जहां छात्रों का गुस्सा सड़कों पर साफ दिखाई दिया। हाथों में मोमबत्तियां, आंखों में आक्रोश और आवाज में सवाल- हर तरफ सिर्फ इंसाफ की मांग गूंज रही थी। यह विरोध सिर्फ एक घटना के खिलाफ नहीं, बल्कि उस व्यवस्था के खिलाफ था, जिस पर अब भरोसा कमजोर होता दिख रहा है। यह कैंडल मार्च "मुस्लिम स्टूडेंट्स ऑर्गेनाइजेशन (MSO)" के आह्वान पर आयोजित किया गया था, जिसमें बड़ी संख्या में छात्र-छात्राएं शामिल हुए।


कैंडल मार्च में गूंजे तीखे सवाल, छात्रों ने उठाई सुरक्षा पर चिंता

शाम करीब 7 बजे निकाले गए इस मार्च में माहौल भावुक भी था और आक्रोश से भरा भी। कानून के छात्र "आबिद रजा मिस्बाही" ने कहा कि संविधान हर नागरिक को सुरक्षित जीवन का अधिकार देता है, लेकिन जब एक व्यक्ति ट्रेन में ही सुरक्षित नहीं रह पाता, तो यह पूरे सिस्टम की विफलता है। उन्होंने सवाल उठाया कि क्या आम नागरिक की सुरक्षा अब केवल कागजों तक सीमित रह गई है?


"स्वालेह अंसारी" ने अपने संबोधन में गहरी नाराजगी जताते हुए कहा कि आखिर कब तक निर्दोष लोग इस तरह हिंसा का शिकार होते रहेंगे। उन्होंने कहा कि यह सिर्फ एक व्यक्ति की मौत नहीं, बल्कि समाज में फैलते डर और असुरक्षा का संकेत है।


पूर्व छात्रसंघ अध्यक्ष "मतीन अशरफ" ने छात्रों को एकजुट होने का आह्वान किया और कहा कि अन्याय के खिलाफ आवाज उठाना ही लोकतंत्र की असली ताकत है। उन्होंने जोर देकर कहा कि अगर आज हम चुप रहे, तो कल यह किसी और के साथ भी हो सकता है।


"कौनेन रजा" ने अपने अंदाज में ग़ज़ल के जरिए विरोध दर्ज कराया, जिसने माहौल को और ज्यादा भावनात्मक बना दिया। उनके शब्दों में दर्द भी था और प्रतिरोध की ताकत भी।


इन सबके अलावा कई अन्य छात्र-छात्राओं ने भी अपनी बात रखी। किसी ने सुरक्षा व्यवस्था पर सवाल उठाए, तो किसी ने न्यायिक प्रक्रिया की धीमी रफ्तार पर चिंता जताई। सभी की आवाज में एक ही मांग थी- निष्पक्ष जांच और दोषियों को सख्त सजा।



एक यात्रा जो आखिरी साबित हुई: कैसे सामने आई सच्चाई

इस विरोध की जड़ में बरेली का वह मामला है, जिसने पूरे देश को झकझोर दिया। बिहार के किशनगंज निवासी "मौलाना तौसीफ रजा" उर्स में शामिल होकर ट्रेन से लौट रहे थे। सफर के दौरान उन्होंने अपनी पत्नी को फोन कर बताया कि कुछ लोग उनके साथ मारपीट कर रहे हैं। उनकी घबराई हुई आवाज और मदद की पुकार इस बात का संकेत थी कि स्थिति बेहद गंभीर थी। यह घटना 27 अप्रैल 2026 को हुई थी!


फोन अचानक कट गया और इसके बाद उनसे कोई संपर्क नहीं हो सका। कुछ ही देर बाद उनका शव रेलवे ट्रैक के पास मिला। पहले इसे एक सामान्य हादसा बताया गया, लेकिन पोस्टमार्टम रिपोर्ट ने सच्चाई को उजागर कर दिया।


रिपोर्ट में शरीर पर गंभीर चोटों, फ्रैक्चर और घसीटे जाने के निशान मिले, जिससे यह साफ हुआ कि पहले उनके साथ मारपीट की गई और फिर उन्हें ट्रेन से फेंका गया।



हादसे से हत्या तक: क्यों उठ रहे हैं बड़े सवाल

इस पूरी घटना ने कई गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। क्या ट्रेन में सफर करना अब सुरक्षित नहीं रहा? जब कोई व्यक्ति मदद के लिए पुकारता है, तो सिस्टम क्यों नाकाम हो जाता है? और सबसे बड़ा सवाल- क्या हर बार सच्चाई सामने आने के लिए परिवार को लड़ाई लड़नी पड़ेगी?


मौलाना आजाद नेशनल उर्दू यूनिवर्सिटी में हुआ यह विरोध सिर्फ एक घटना का प्रतिरोध नहीं, बल्कि उस सिस्टम को आईना दिखाने की कोशिश है, जहां सुरक्षा और न्याय दोनों पर सवाल उठ रहे हैं। छात्रों की यह आवाज अब सिर्फ परिसर तक सीमित नहीं रही, बल्कि एक बड़े सामाजिक सवाल में बदलती जा रही है।