
बक्सर: नगर भवन में आयोजित समता अधिकार सम्मेलन ने सामाजिक न्याय, आरक्षण, शिक्षा में समान अवसर और बहुजन प्रतिनिधित्व के सवालों को लेकर बक्सर में नई बहस छेड़ दी। बड़ी संख्या में छात्र-युवा, सामाजिक कार्यकर्ता, बुद्धिजीवी और सामाजिक न्याय की राजनीति से जुड़े लोगों की मौजूदगी ने सम्मेलन को एक व्यापक जनमंच का रूप दिया। पूरे कार्यक्रम के दौरान फुले-आंबेडकर-मंडल की वैचारिक धारा, सामाजिक प्रतिनिधित्व, संवैधानिक अधिकारों की रक्षा और बहुजन एकजुटता के सवाल प्रमुखता से छाए रहे।
सम्मेलन में सामाजिक न्याय की मौजूदा चुनौतियों, आरक्षण व्यवस्था के प्रभावी क्रियान्वयन, शिक्षा में समान अवसर, प्रतिनिधित्व, रोजगार और वंचित तबकों की भागीदारी जैसे मुद्दों पर गंभीर मंथन हुआ। वक्ताओं ने कहा कि सामाजिक न्याय केवल नीतिगत घोषणा नहीं, बल्कि सामाजिक बदलाव का एजेंडा है, जिसे ज़मीन पर उतारना जरूरी है।
65 प्रतिशत आरक्षण, महिला कोटा और शिक्षा के सवालों पर जोर
कार्यक्रम में बिहार में पारित 65 प्रतिशत आरक्षण लागू करने की मांग प्रमुखता से उठी। साथ ही महिला आरक्षण में ओबीसी हिस्सेदारी सुनिश्चित करने, उच्च शिक्षा संस्थानों में समान अवसर बढ़ाने, यूजीसी रेगुलेशंस को प्रभावी बनाने और शिक्षा में सामाजिक न्याय को संस्थागत रूप देने की बात कही गई। मंच से यह भी कहा गया कि प्रतिनिधित्व के बिना लोकतंत्र अधूरा है और सामाजिक न्याय के सवालों को केवल चुनावी राजनीति तक सीमित नहीं रखा जा सकता।
रोजगार, निजी क्षेत्र में आरक्षण, जातीय प्रतिनिधित्व, शिक्षा के निजीकरण और सामाजिक भागीदारी जैसे मुद्दों पर भी वक्ताओं ने अपनी चिंता जाहिर की। सम्मेलन में यह स्वर बार-बार उभरा कि बहुजन समाज की हिस्सेदारी बढ़ाए बिना समतामूलक व्यवस्था संभव नहीं है।
सम्मेलन में इन प्रमुख वक्ताओं की रही भागीदारी
सम्मेलन में लेखक एवं एडमिनिस्ट्रेटिव प्रोफेशनल डॉ. लक्ष्मण यादव, सामाजिक न्याय आंदोलन बिहार के संयोजक रिंकू यादव, दिल्ली से यूजीसी रेगुलेशन-समता आंदोलन एवं आइसा नेता अंजलि, पूर्व विधायक शिवप्रकाश रंजन, पूर्व विधायक डॉ. अजित कुशवाहा तथा रिसर्च स्कॉलर ज्ञानप्रकाश शामिल हुए।
वक्ताओं ने सामाजिक न्याय के व्यापक एजेंडे पर रखी बात
डॉ. लक्ष्मण यादव ने फुले, आंबेडकर और मंडल की वैचारिक विरासत को सामाजिक परिवर्तन की आधारशिला बताते हुए कहा कि बहुजन समाज की राजनीतिक और शैक्षणिक भागीदारी बढ़ाना समय की जरूरत है। रिंकू यादव ने समता आंदोलन को अधिकार आधारित संघर्ष की दिशा बताते हुए सामाजिक न्याय के प्रश्नों पर संगठित हस्तक्षेप की जरूरत बताई। अंजलि ने उच्च शिक्षा संस्थानों में समान अवसर, छात्र आंदोलनों और प्रतिनिधित्व के सवालों को मजबूती से रखा, जबकि शिवप्रकाश रंजन ने सामाजिक न्याय की राजनीति को और व्यापक बनाने की आवश्यकता पर जोर दिया।
रिसर्च स्कॉलर ज्ञानप्रकाश ने युवाओं और छात्रों की भूमिका को रेखांकित करते हुए कहा कि नई पीढ़ी को इस वैचारिक संघर्ष में सक्रिय भूमिका निभानी होगी। वक्ताओं ने सामूहिक रूप से कहा कि सामाजिक न्याय की लड़ाई केवल आरक्षण तक सीमित नहीं बल्कि शिक्षा, रोजगार, प्रतिनिधित्व और गरिमामय हिस्सेदारी के व्यापक सवालों से जुड़ी है। सम्मेलन में यह भी स्वर उभरा कि मंडल राजनीति को नए दौर की चुनौतियों के अनुरूप नए विस्तार की जरूरत है।
डॉ. अजित कुशवाहा के संबोधन पर सबसे ज्यादा रहा फोकस
सम्मेलन में पूर्व विधायक डॉ. अजित कुशवाहा का संबोधन विशेष आकर्षण का केंद्र रहा और पूरे आयोजन में सबसे ज्यादा चर्चा उनके वक्तव्य को लेकर रही। उन्होंने अपने संबोधन में सामाजिक न्याय की लड़ाई को केवल नीतिगत बहस नहीं, बल्कि व्यापक जनआंदोलन का विषय बताते हुए कहा कि आरक्षण, प्रतिनिधित्व और संवैधानिक अधिकारों की रक्षा के लिए सामाजिक एकजुटता को और मजबूत करना होगा।
डॉ. कुशवाहा ने कहा कि मंडल की राजनीति ने देश में प्रतिनिधित्व का नया अध्याय खोला, लेकिन अब उसे नए दौर की चुनौतियों के अनुरूप और व्यापक बनाने की जरूरत है। उन्होंने शिक्षा के लोकतंत्रीकरण, बहुजन समाज की राजनीतिक भागीदारी, वंचित तबकों के अधिकारों और सामाजिक न्याय की राजनीति को जनआधारित स्वरूप देने पर विस्तार से बात रखी।
उन्होंने यह भी कहा कि सामाजिक न्याय केवल सत्ता संरचनाओं में हिस्सेदारी का प्रश्न नहीं, बल्कि समाज के पुनर्गठन का एजेंडा है। उनके भाषण में आरक्षण, प्रतिनिधित्व, शिक्षा और बहुजन एकजुटता के सवाल प्रमुखता से उभरे, जिस पर सभा में मौजूद लोगों ने जोरदार समर्थन जताया। कई लोगों ने उनके संबोधन को सम्मेलन की वैचारिक दिशा तय करने वाला वक्तव्य माना।
ऑल इंडिया फोरम फॉर इक्विटी की पहल के रूप में देखा गया सम्मेलन
कार्यक्रम का आयोजन ऑल इंडिया फोरम फॉर इक्विटी / यूजीसी रेगुलेशंस-समता आंदोलन, बक्सर के बैनर तले हुआ। आयोजकों ने कहा कि सम्मेलन का उद्देश्य सामाजिक न्याय के मुद्दों पर राष्ट्रीय स्तर के विमर्श को स्थानीय समाज से जोड़ना और अधिकार आधारित संघर्षों को मजबूत करना है।
यह आयोजन छात्र आंदोलन, बहुजन राजनीति और सामाजिक अधिकारों के प्रश्नों को एक साझा मंच पर लाने की कोशिश के रूप में भी देखा गया।
बक्सर के युवाओं ने संभाली आयोजन की कमान
इस कार्यक्रम को सफल बनाने में बक्सर के युवा साथियों की भूमिका भी काफी अहम रही। स्थानीय स्तर पर युवाओं ने संगठन, प्रचार, जनसंपर्क और लोगों की भागीदारी सुनिश्चित करने में महत्वपूर्ण योगदान दिया।
विशेष रूप से विश्वजीत, छात्र नेता वीटटू यादव, समाजसेवी भाई तबरेज़ खान, इनाम खान, सरफराज वकील समेत कई युवा साथियों का आयोजन को सफल बनाने में भरपूर सहयोग रहा। स्थानीय युवाओं की सक्रिय भागीदारी ने सम्मेलन को और मजबूत आधार देने का काम किया।

