दय्यान खान

धार्मिक संस्थाओं के प्रबंधन अधिकार, धार्मिक स्वतंत्रता और संवैधानिक मर्यादाओं को लेकर चल रही सुनवाई के दौरान Supreme Court of India ने अहम और व्यापक टिप्पणी की है। अदालत ने साफ कहा कि किसी धार्मिक संस्था के प्रबंधन का अधिकार यह नहीं दर्शाता कि उसके संचालन में कोई ढांचा, नियम या व्यवस्था न हो। कोर्ट ने कहा कि चाहे दरगाह हो, मंदिर हो या कोई अन्य धार्मिक संस्था, उसके संचालन में अराजकता की स्थिति स्वीकार नहीं की जा सकती। हर संस्था के लिए एक विनियमित व्यवस्था, संचालन तंत्र और स्पष्ट नियम होने चाहिए, ताकि धार्मिक स्वतंत्रता और संस्थागत अनुशासन के बीच संतुलन बना रहे।

नौ जजों की संविधान बेंच यह सुनवाई धार्मिक स्थलों पर महिलाओं के प्रवेश, भेदभाव, धार्मिक संप्रदायों के अधिकार और संविधान के तहत धार्मिक स्वतंत्रता की सीमा से जुड़ी याचिकाओं पर कर रही है। इस बेंच में भारत के मुख्य न्यायाधीश सहित कई वरिष्ठ जज शामिल हैं और इसे संवैधानिक दृष्टि से बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है। सुनवाई के दौरान अदालत ने बार-बार इस बात पर जोर दिया कि प्रबंधन का अधिकार असीमित नहीं हो सकता और यह संवैधानिक मूल्यों के दायरे में ही संचालित होना चाहिए।

सुनवाई के दौरान हजरत Nizamuddin Auliya की दरगाह से जुड़ी चिश्ती निजामी परंपरा के वंशज की ओर से पेश अधिवक्ता निजाम पाशा ने सूफी परंपराओं का पक्ष रखते हुए कहा कि दरगाह सिर्फ एक भौतिक स्थान नहीं, बल्कि आस्था का केंद्र होती है। उन्होंने दलील दी कि इस्लाम में मृत्यु के बाद संतों की स्थिति को लेकर अलग-अलग मत हो सकते हैं, लेकिन सूफी आस्था प्रणाली में उस स्थान के प्रति गहरी श्रद्धा होती है, जहां किसी संत को दफनाया जाता है। उन्होंने कहा कि भारत में चिश्तिया, कादरिया, नक्शबंदिया और सुहरावर्दिया जैसी कई प्रमुख सूफी परंपराएं मौजूद हैं और ये सभी धार्मिक संप्रदाय के स्वरूप में देखी जा सकती हैं।

अधिवक्ता पाशा ने अदालत के सामने यह तर्क भी रखा कि किसी धार्मिक संस्था में प्रवेश को विनियमित करना उसके प्रबंधन का हिस्सा है। उनके मुताबिक, यह अधिकार धार्मिक संप्रदायों को अपनी परंपराओं, रीति-रिवाजों और धार्मिक व्यवस्था को बनाए रखने के लिए आवश्यक है। उन्होंने कहा कि अगर हजरत निजामुद्दीन औलिया की शिक्षाओं को देखा जाए, तो उनमें रोजा, नमाज, हज, जकात और सबसे बढ़कर आस्था जैसे इस्लामी मूल्यों के पालन पर जोर मिलता है, इसलिए चिश्ती परंपरा को एक मान्य धार्मिक संप्रदाय के रूप में देखा जाना चाहिए।

इस पर जस्टिस अहसानुद्दीन अमानुल्ला ने महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा कि प्रबंधन के अधिकार का अर्थ यह नहीं हो सकता कि कोई ढांचा ही न हो। उन्होंने कहा कि “अराजकता नहीं हो सकती।” अदालत ने स्पष्ट किया कि हर धार्मिक संस्था में कुछ प्रक्रियाएं, परंपराएं और कार्यप्रणाली होती है, जिन्हें विनियमित करने के लिए किसी न किसी निकाय की जरूरत होती है। जस्टिस अमानुल्ला ने कहा कि ऐसा नहीं हो सकता कि हर कोई यह कहे कि वह अपनी इच्छा से जो चाहे करेगा, या धार्मिक स्थल के द्वार हर समय बिना किसी नियंत्रण के खुले रहें।

कोर्ट ने कहा कि धार्मिक संस्थाओं के संरक्षण, संचालन और विनियमन के लिए नियम जरूरी हैं, लेकिन वे नियम संविधान की सीमाओं से बाहर नहीं जा सकते। अदालत ने इस बात पर भी जोर दिया कि प्रबंधन के नाम पर भेदभाव स्वीकार नहीं किया जा सकता। व्यापक संवैधानिक मानकों के तहत समानता और मौलिक अधिकारों का सम्मान अनिवार्य है। यही वह बिंदु है जहां धार्मिक स्वतंत्रता और संवैधानिक मूल्यों के बीच संतुलन की जरूरत सामने आती है।

यह सुनवाई इसलिए भी महत्वपूर्ण मानी जा रही है क्योंकि इसका संबंध Sabarimala Temple से जुड़े विवादों और महिलाओं के प्रवेश पर ऐतिहासिक बहस से भी है। सितंबर 2018 में सुप्रीम कोर्ट की पांच जजों की संविधान बेंच ने बहुमत से फैसला देते हुए 10 से 50 वर्ष आयु की महिलाओं के सबरीमाला मंदिर में प्रवेश पर लगी रोक को असंवैधानिक करार दिया था। अदालत ने तब कहा था कि धार्मिक प्रथा के नाम पर भेदभाव को सही नहीं ठहराया जा सकता। अब मौजूदा नौ जजों की बेंच उसी बहस के व्यापक संवैधानिक पहलुओं पर विचार कर रही है।

सुनवाई के दौरान अदालत ने यह भी दोहराया कि किसी धार्मिक प्रथा को “जरूरी” या “गैर-जरूरी” घोषित करने के लिए मानदंड तय करना न्यायपालिका के लिए अत्यंत कठिन कार्य है। कोर्ट ने संकेत दिया कि धार्मिक प्रथाओं का मूल्यांकन केवल परंपरा के आधार पर नहीं, बल्कि संवैधानिक कसौटी पर भी होना चाहिए। यही कारण है कि यह मामला सिर्फ धार्मिक प्रबंधन तक सीमित नहीं, बल्कि संविधान, आस्था और अधिकारों के बड़े प्रश्नों से जुड़ा हुआ माना जा रहा है।

कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि अदालत की यह टिप्पणी भविष्य में धार्मिक संस्थाओं के प्रशासन और उनके अधिकारों से जुड़े मामलों पर असर डाल सकती है। इससे यह संदेश भी गया है कि धार्मिक संस्थाओं के स्वायत्त अधिकार महत्वपूर्ण हैं, लेकिन वे पूर्णतः निरंकुश नहीं हो सकते। किसी भी संस्था के संचालन में पारदर्शिता, नियम और संवैधानिक जवाबदेही बनी रहनी चाहिए।

फिलहाल इस मामले की सुनवाई जारी है, लेकिन सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणियों ने साफ संकेत दे दिया है कि धार्मिक संस्थाओं के प्रबंधन के नाम पर अराजकता, अनियंत्रित संचालन या मनमानी को मान्यता नहीं दी जा सकती। चाहे दरगाह हो या मंदिर, नियम और व्यवस्था जरूरी हैं, लेकिन वह व्यवस्था संविधान की मूल भावना—समानता, स्वतंत्रता और न्याय—के अनुरूप होनी चाहिए। इसी संतुलन को लेकर अब इस संवैधानिक सुनवाई पर देशभर की नजर बनी हुई है।