आज असम विधानसभा में यूनिफॉर्म सिविल कोड (UCC) विधेयक पेश कर दिया गया। मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा की सरकार की ओर से यह बिल संसदीय कार्य मंत्री अतुल बोरा ने सदन में रखा। पिछले कई महीनों से इस कानून को लेकर चर्चा चल रही थी। कैबिनेट मंजूरी मिलने के बाद आज इसे विधानसभा में लाया गया। सरकार इसे महिलाओं के अधिकार, समानता और सामाजिक सुधार से जोड़कर देख रही है, जबकि विपक्ष और कई सामाजिक संगठनों का कहना है कि यह सिर्फ कानूनी बदलाव नहीं, बल्कि धार्मिक और सांस्कृतिक पहचान से जुड़ा विषय है। इसी वजह से बिल पेश होने के साथ ही बहस भी तेज हो गई।UCC का मुद्दा नया नहीं है। संविधान बनने के समय से ही इस पर चर्चा होती रही है। लेकिन अब धीरे-धीरे राज्यों ने अपने स्तर पर इस दिशा में कदम बढ़ाने शुरू कर दिए हैं। असम भी अब उसी सूची में शामिल होने जा रहा है।


कब होगी UCC बिल पर चर्चा

असम विधानसभा का विशेष सत्र 21 मई से 26 मई तक चलने वाला है. ऐसे में मंगलवार को विधानसभा सत्र के आखिरी दिन यूसीसी बिल पर चर्चा हो सकती है. असम विधानसभा में पेश यूसीसी विधेयक के अनुसार, इसका उद्देश्य विवाह, तलाक, उत्तराधिकार और सह जीवनसाथी संबंध से संबंधित कानूनों को नियंत्रित करना है. साथ ही इसमें एक से ज्‍यादा शादी पर प्रतिबंध लगाना, पुरुषों के लिए न्यूनतम विवाह की उम्र 21 वर्ष और महिलाओं के लिए 18 वर्ष निर्धारित करना भी शामिल है !

UCC आखिर है क्या, और इसकी जरूरत क्यों महसूस की जा रही है?

यूनिफॉर्म सिविल कोड यानी समान नागरिक संहिता। इसका मतलब यह है कि शादी, तलाक, गोद लेना, संपत्ति बंटवारा और पारिवारिक मामलों में धर्म के आधार पर अलग-अलग कानून लागू होने के बजाय सभी नागरिकों के लिए एक समान कानून हो। अभी भारत में आपराधिक कानून सभी के लिए एक जैसे हैं, लेकिन परिवार और निजी मामलों में अलग-अलग धार्मिक समुदायों के अपने पर्सनल लॉ हैं। संविधान के अनुच्छेद 44 में राज्य को समान नागरिक संहिता लागू करने की दिशा में प्रयास करने की बात कही गई है। लेकिन भारत जैसे विविधता वाले देश में यह हमेशा संवेदनशील मुद्दा रहा है। सरकार का तर्क है कि अगर नागरिक अधिकार समान हैं तो नागरिक कानून भी समान होने चाहिए। जबकि विरोध करने वालों का कहना है कि भारत में धर्म सिर्फ पूजा तक सीमित नहीं, बल्कि जीवन शैली और सामाजिक पहचान का हिस्सा भी है।


हिंदू और मुस्लिम पर्सनल लॉ में क्या फर्क है, जहां से शुरू होती है पूरी बहस

UCC की बहस की असली जड़ अलग-अलग पर्सनल लॉ हैं। भारत में हिंदू, सिख, जैन और बौद्ध समुदाय हिंदू पर्सनल लॉ के तहत आते हैं। 1955-56 के हिंदू कोड बिल के बाद शादी, तलाक और संपत्ति के नियम तय किए गए। उसी दौरान हिंदुओं में बहुविवाह पर रोक लगा दी गई और विवाह संबंधी कई नियम कानून के दायरे में लाए गए। दूसरी तरफ मुस्लिम पर्सनल लॉ की व्यवस्था अलग ढंग से विकसित हुई। इसमें विवाह, विरासत और परिवार से जुड़े कई मामलों में अलग नियम लागू रहे। लंबे समय तक बहुविवाह की अनुमति और तीन तलाक जैसे मुद्दों पर बहस होती रही। हालांकि बाद में तीन तलाक को कानून बनाकर खत्म कर दिया गया। UCC के समर्थकों का कहना है कि अलग-अलग कानूनों की वजह से नागरिक समानता प्रभावित होती है। जबकि विरोध करने वाले कहते हैं कि धार्मिक कानून केवल कानूनी व्यवस्था नहीं, बल्कि सांस्कृतिक पहचान का हिस्सा भी हैं।


असम से पहले किस राज्य में लागू हुआ UCC, और वहां क्या-क्या नियम बनाए गए

जब भी UCC की चर्चा होती है, सबसे पहले गोवा का नाम आता है। गोवा में पुर्तगाली शासन के समय से एक तरह का कॉमन सिविल कोड लागू है। वहां संपत्ति और पारिवारिक मामलों में काफी हद तक समान नियम लागू हैं। हालांकि उसमें भी कुछ अपवाद मौजूद हैं ! इसके बाद उत्तराखंड देश का पहला आधुनिक राज्य बना जिसने UCC लागू किया। उत्तराखंड के कानून में शादी, तलाक और पारिवारिक मामलों को एक ढांचे में लाने की कोशिश की गई। वहां लिव-इन रिलेशनशिप का रजिस्ट्रेशन भी चर्चा का विषय बना। इसके अलावा संपत्ति और परिवार से जुड़े कई नियमों को नए तरीके से व्यवस्थित किया गया। गुजरात ने भी UCC की दिशा में प्रक्रिया शुरू की। अब असम भी इस दिशा में कदम बढ़ा रहा है।


असम के UCC में क्या खास है, और किन लोगों को मिलेगी छूट?

असम सरकार के प्रस्तावित बिल में बहुविवाह पर रोक, पारिवारिक कानूनों में एकरूपता और महिलाओं के अधिकारों पर जोर दिया गया है। लेकिन इस बिल की सबसे अहम बात सिर्फ कानून नहीं, बल्कि इसमें दी गई छूट है। रिपोर्टों के मुताबिक, असम सरकार ने राज्य के अनुसूचित जनजाति (Scheduled Tribes) समुदायों को UCC के दायरे से बाहर रखने का फैसला किया है। इसमें बोडो, मिसिंग, कार्बी, राभा, दिमासा और अन्य जनजातीय समुदाय शामिल हो सकते हैं। असम में इन समुदायों की अपनी पारंपरिक सामाजिक व्यवस्था और रीति-रिवाज हैं। कई जनजातियों में शादी, संपत्ति और पारिवारिक मामलों के फैसले लंबे समय से सामुदायिक नियमों और पारंपरिक व्यवस्थाओं के आधार पर होते रहे हैं। सरकार का कहना है कि अगर उन पर सीधे UCC लागू किया गया तो उनकी सांस्कृतिक पहचान और परंपराएं प्रभावित हो सकती हैं। यहीं से एक नई बहस शुरू हो गई है। आलोचक सवाल उठा रहे हैं कि अगर कुछ समुदायों को कानून से बाहर रखा जाएगा तो फिर इसे "यूनिफॉर्म" यानी समान नागरिक संहिता कैसे कहा जाएगा?


क्या UCC धार्मिक स्वतंत्रता के खिलाफ है? सबसे बड़ा सवाल यहीं खड़ा है

UCC पर सबसे ज्यादा विवाद इसी बात को लेकर है। विरोध करने वालों का कहना है कि संविधान का अनुच्छेद 25 हर नागरिक को धर्म मानने और उसका पालन करने की स्वतंत्रता देता है। शादी और पारिवारिक परंपराएं सिर्फ कानूनी विषय नहीं, बल्कि धार्मिक और सांस्कृतिक पहचान का हिस्सा भी हैं। लेकिन समर्थकों का कहना है कि सरकार किसी की पूजा-पद्धति या धार्मिक परंपराओं में दखल नहीं दे रही। मामला सिर्फ नागरिक कानूनों का है। उनका कहना है कि अगर महिलाओं और पुरुषों को समान अधिकार देने हैं तो नागरिक कानून धर्म देखकर अलग-अलग नहीं होने चाहिए।


यह सिर्फ कानून नहीं, आने वाले समय की राजनीति और समाज की बड़ी कहानी है

असम में पेश हुआ UCC बिल सिर्फ एक विधेयक नहीं माना जा रहा। इसके पीछे सामाजिक सुधार, महिलाओं के अधिकार, धार्मिक पहचान और राजनीति-सब एक साथ जुड़े हैं। आने वाले दिनों में सदन के भीतर और बाहर इस पर और बड़ी बहस देखने को मिल सकती है। फिलहाल इतना तय है कि UCC अब सिर्फ एक कानूनी शब्द नहीं रह गया। यह देश में समानता, परंपरा और संवैधानिक अधिकारों के बीच चल रही सबसे बड़ी बहसों में से एक बन चुका है।