नई दिल्ली।विवादित इस्लामी उपदेशक जाकिर नाइक ने अफगानिस्तान में लड़कियों की माध्यमिक और उच्च शिक्षा पर तालिबान की ओर से लगाए गए प्रतिबंधों का बचाव किया है। नाइक ने तालिबान के फैसले को सही ठहराते हुए दावा किया कि लड़कियों की आगे की पढ़ाई पर रोक स्थायी नहीं है, बल्कि इसके पीछे सुरक्षा व्यवस्था और महिला शिक्षकों की उपलब्धता से जुड़ी समस्याएं हैं। उनके इस बयान के सामने आने के बाद सामाजिक कार्यकर्ताओं और अफगानिस्तान से जुड़े लोगों ने कड़ी प्रतिक्रिया दी है। पाकिस्तान की सामाजिक कार्यकर्ता और नोबेल शांति पुरस्कार विजेता मलाला यूसुफजई के पिता जियाउद्दीन यूसुफजई ने नाइक के तर्क को बेहद निराशाजनक और चिंताजनक बताया है।
तालिबान के प्रतिनिधियों से बातचीत का किया दावा
जाकिर नाइक ने एक वीडियो में कहा कि उन्होंने लड़कियों की शिक्षा के मुद्दे पर तालिबान के प्रतिनिधियों से व्यक्तिगत रूप से बातचीत की है। उनका कहना है कि इस विषय पर मीडिया में प्रसारित होने वाली प्रत्येक खबर को सही नहीं माना जाना चाहिए। नाइक ने दावा किया कि तालिबान अफगानिस्तान में लड़कियों को छठी कक्षा तक पढ़ने की अनुमति देता है। इसके बाद की शिक्षा को लेकर वहां सुरक्षित वातावरण और महिला शिक्षकों की पर्याप्त उपलब्धता सुनिश्चित करने की बात कही जा रही है।
नाइक के अनुसार, तालिबान का तर्क है कि जब तक लड़कियों की पढ़ाई के लिए उपयुक्त महिला शिक्षक और सुरक्षित शैक्षणिक माहौल उपलब्ध नहीं हो जाता, तब तक माध्यमिक शिक्षा को आगे बढ़ाने में देरी की जा सकती है। उन्होंने इसी आधार पर तालिबान की ओर से लगाए गए प्रतिबंधों का बचाव किया। उनका दावा है कि यह रोक स्थायी नहीं है, बल्कि परिस्थितियों से जुड़ी हुई है।
इस्लामी शिक्षा और उच्च डिग्री का भी दिया हवाला
जाकिर नाइक ने अपने बयान में यह भी दावा किया कि अफगानिस्तान में महिलाएं इस्लामी विषयों की पढ़ाई कर रही हैं। उनके अनुसार, महिलाएं शरिया, अरबी और कुरान जैसे विषयों में मास्टर डिग्री और पीएचडी तक हासिल कर सकती हैं। उन्होंने इस उदाहरण के माध्यम से यह बताने की कोशिश की कि अफगानिस्तान में महिलाओं की शिक्षा पूरी तरह बंद नहीं है।
हालांकि, नाइक के इस तर्क पर सवाल उठाए जा रहे हैं कि यदि लड़कियों को सामान्य माध्यमिक और उच्च शिक्षा हासिल करने का अवसर नहीं दिया जाएगा, तो भविष्य में महिला शिक्षकों की संख्या कैसे बढ़ेगी। आलोचकों का कहना है कि शिक्षा के अवसर सीमित करने से महिला शिक्षकों की कमी दूर होने के बजाय समस्या और गंभीर हो सकती है।
जियाउद्दीन यूसुफजई ने बताया निराशाजनक और चिंताजनक
जाकिर नाइक के बयान पर मलाला यूसुफजई के पिता जियाउद्दीन यूसुफजई ने नाराजगी जताई है। उन्होंने नाइक के तर्क को बेहद निराशाजनक और चिंताजनक बताया। लड़कियों की शिक्षा का मुद्दा लंबे समय से अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चर्चा का विषय रहा है। ऐसे में तालिबान की पाबंदियों को उचित ठहराने वाले किसी भी बयान पर सामाजिक कार्यकर्ताओं और शिक्षा के अधिकार के समर्थकों की प्रतिक्रिया सामने आना स्वाभाविक है।
मलाला यूसुफजई स्वयं लड़कियों की शिक्षा के अधिकार के लिए अंतरराष्ट्रीय स्तर पर आवाज उठाती रही हैं। ऐसे में उनके पिता की ओर से जाकिर नाइक के बयान पर जताई गई चिंता ने इस विवाद को और चर्चा में ला दिया है।
अफगानिस्तान के पूर्व सुरक्षा बल सदस्य ने उठाया बड़ा सवाल
नाइक के बयान पर अफगानिस्तान से जुड़े कई लोगों ने भी नाराजगी जाहिर की है। बेल्जियम में रहने वाले अफगानिस्तान के पूर्व सुरक्षा बल सदस्य अजीम शिनवारी ने उनके दावों पर सवाल उठाते हुए पूछा कि यदि लड़कियों को पढ़ने का अवसर ही नहीं मिलेगा, तो भविष्य में महिला शिक्षक कहां से आएंगी? उन्होंने जाकिर नाइक से उनके दावों के समर्थन में प्रमाण प्रस्तुत करने की मांग भी की।
अजीम शिनवारी का सवाल शिक्षा व्यवस्था से जुड़ी एक महत्वपूर्ण समस्या की ओर ध्यान दिलाता है। यदि लड़कियों को माध्यमिक और उच्च शिक्षा से दूर रखा जाता है, तो उनके लिए आगे चलकर शिक्षक, डॉक्टर और अन्य पेशेवर बनने के अवसर भी सीमित हो सकते हैं। महिला शिक्षकों की कमी को प्रतिबंध का कारण बताना और दूसरी ओर लड़कियों को पढ़ाई से दूर रखना एक ऐसा तर्क है, जिस पर लगातार सवाल उठ रहे हैं।
निर्वासित संसद की सदस्य मरियम सोलैमंखिल ने भी साधा निशाना
अफगानिस्तान की निर्वासित संसद की सदस्य मरियम सोलैमंखिल ने भी जाकिर नाइक के तर्क पर कटाक्ष किया। उन्होंने कहा कि तालिबान ने जिन महिला शिक्षकों को काम करने से रोक रखा है, उसी व्यवस्था में अब महिला शिक्षकों की उपलब्धता का इंतजार किया जा रहा है। उनके बयान का आशय यह था कि जब महिलाओं को काम करने और शिक्षा व्यवस्था में योगदान देने के अवसर ही नहीं दिए जाएंगे, तो महिला शिक्षकों की कमी कैसे दूर होगी?
मरियम सोलैमंखिल की प्रतिक्रिया से स्पष्ट है कि अफगानिस्तान में लड़कियों की शिक्षा पर लगे प्रतिबंधों को लेकर विरोध केवल अंतरराष्ट्रीय सामाजिक कार्यकर्ताओं तक सीमित नहीं है। अफगानिस्तान से जुड़े लोग भी इस व्यवस्था और उसके समर्थन में दिए जा रहे तर्कों पर सवाल उठा रहे हैं।
26 लाख से अधिक लड़कियां माध्यमिक शिक्षा से वंचित
अफगानिस्तान में लड़कियों की शिक्षा की स्थिति को लेकर यूनिसेफ की अगस्त में जारी रिपोर्ट में गंभीर आंकड़े सामने आए थे। रिपोर्ट के मुताबिक, देश में 26 लाख से अधिक लड़कियां माध्यमिक शिक्षा से वंचित हैं। तालिबान के 15 अगस्त 2021 को सत्ता में लौटने के बाद से लड़कियों की शिक्षा पर लगातार पाबंदियां लगाई गई हैं।
सितंबर 2021 से लड़कियों के लिए छठी कक्षा से आगे की पढ़ाई बंद है। इसका अर्थ है कि प्राथमिक स्तर की शिक्षा पूरी करने के बाद बड़ी संख्या में लड़कियों को आगे पढ़ने का अवसर नहीं मिल पा रहा है। इस प्रतिबंध के कारण उनका शैक्षणिक भविष्य प्रभावित हो रहा है।
विश्वविद्यालयों से लेकर मेडिकल प्रशिक्षण तक पर पाबंदी
दिसंबर 2022 में तालिबान ने महिलाओं के विश्वविद्यालयों में प्रवेश पर भी रोक लगा दी थी। इसके बाद उच्च शिक्षा हासिल करने की इच्छुक छात्राओं के लिए विश्वविद्यालयों के दरवाजे बंद हो गए। दिसंबर 2024 में महिलाओं के लिए नर्सिंग और मिडवाइफरी सहित मेडिकल प्रशिक्षण संस्थानों में पढ़ाई पर भी प्रतिबंध लगा दिया गया।
इन फैसलों के कारण अफगानिस्तान में महिलाओं के लिए शिक्षा के अवसर और सीमित हो गए हैं। माध्यमिक शिक्षा के बाद विश्वविद्यालयों और चिकित्सा प्रशिक्षण संस्थानों तक पहुंच बंद होने से लड़कियों और महिलाओं के सामने आगे पढ़ाई जारी रखने का रास्ता कठिन हो गया है।
दुनिया का एकमात्र देश जहां लड़कियों की उच्च शिक्षा पर रोक
उपलब्ध जानकारी के मुताबिक, अफगानिस्तान फिलहाल दुनिया का एकमात्र ऐसा देश है, जहां लड़कियों और महिलाओं के लिए माध्यमिक तथा उच्च शिक्षा के रास्ते बंद हैं। यह स्थिति अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चिंता का विषय बनी हुई है। शिक्षा को किसी भी समाज के विकास और आत्मनिर्भरता का महत्वपूर्ण आधार माना जाता है। ऐसे में बड़ी संख्या में लड़कियों का स्कूल और विश्वविद्यालयों से दूर रहना उनके भविष्य के साथ-साथ देश की सामाजिक और शैक्षणिक व्यवस्था को भी प्रभावित कर सकता है।
जाकिर नाइक ने तालिबान की पाबंदियों के समर्थन में सुरक्षा और महिला शिक्षकों की कमी का तर्क दिया है, जबकि अफगानिस्तान से जुड़े लोगों ने इसी तर्क पर सवाल खड़े किए हैं। यूनिसेफ के आंकड़े भी बताते हैं कि लाखों लड़कियां माध्यमिक शिक्षा से वंचित हैं। ऐसे में लड़कियों की शिक्षा पर प्रतिबंध और उसके समर्थन में दिए जा रहे बयानों को लेकर विवाद लगातार गहराता दिखाई दे रहा है।
