पटना। बिहार में सरकारी स्कूलों की तस्वीर बदलने के दावे लगातार किए जा रहे हैं। नए भवन, स्मार्ट कक्षाओं और बेहतर शैक्षणिक सुविधाओं की योजनाओं की चर्चा होती रहती है, लेकिन राज्य के कई जिलों में जमीनी स्थिति अब भी बेहद अलग दिखाई दे रही है। पत्रकारों की टीम ने सहरसा, पश्चिम चंपारण, बेगूसराय, मुजफ्फरपुर और कैमूर के कई सरकारी स्कूलों का दौरा किया, जहां बच्चों को बुनियादी सुविधाओं की कमी के बीच पढ़ाई करते पाया गया। कहीं स्कूल झोपड़ी में चल रहा है, कहीं बच्चे पेड़ के नीचे बैठकर पढ़ रहे हैं और कहीं जर्जर टिन शेड में कई कक्षाओं के विद्यार्थियों को एक साथ पढ़ाया जा रहा है।
सहरसा में झोपड़ी के भीतर चल रही पहली से पांचवीं तक की पढ़ाई
सहरसा जिले के सोनबरसा प्रखंड के मैना पट्टी गांव स्थित प्राथमिक विद्यालय की स्थिति सरकारी स्कूलों की बुनियादी व्यवस्था पर सवाल खड़े करती है। यहां पहली से पांचवीं कक्षा तक की पढ़ाई एक झोपड़ी में होती है। विद्यालय में कुल 55 बच्चों का नामांकन है और पांच शिक्षक तैनात हैं। बच्चों के बैठने के लिए स्कूल में केवल नौ बेंच उपलब्ध हैं।
विद्यालय में शौचालय और पुस्तकालय की सुविधा नहीं है। पीने के पानी की भी उचित व्यवस्था नहीं है। प्रधानाध्यापिका कुमारी रंजन के अनुसार, शिक्षकों को अपने घर से पानी लाकर स्कूल में रखना पड़ता है। बारिश के दौरान झोपड़ी की छत से पानी टपकने लगता है, जिससे कई बार पढ़ाई रोकनी पड़ती है। शिक्षकों के बैठने के लिए भी अलग कमरा उपलब्ध नहीं है।
वर्षों से भवन का इंतजार, बच्चे पेड़ के नीचे पढ़ने को मजबूर
सोनबरसा प्रखंड के ही झिटकिया गांव स्थित प्राथमिक विद्यालय की स्थिति भी कुछ ऐसी ही है। यह विद्यालय वर्ष 2007 में शुरू हुआ था, लेकिन करीब दो दशक बीतने के बाद भी स्कूल को अपना स्थायी भवन नहीं मिल सका है। यहां पहली और दूसरी कक्षा के बच्चों की पढ़ाई पेड़ के नीचे होती है, जबकि तीसरी से पांचवीं तक की कक्षाएं स्थानीय निवासी काशी बाबू की जमीन पर बने अस्थायी ढांचे में चलती हैं।
विद्यालय में 91 बच्चों का नामांकन है और चार शिक्षक तैनात हैं। शिक्षक रीता देवी के अनुसार, भवन निर्माण के लिए कई बार आवेदन दिए गए और अधिकारियों ने निरीक्षण भी किया, लेकिन अभी तक स्थायी व्यवस्था नहीं हो सकी है। विद्यालय के हैंडपंप के पानी में आयरन की मात्रा अधिक होने के कारण उसे पीने योग्य नहीं माना जाता। प्रधानाध्यापक का कार्यालय भी एक छोटे स्टोर रूम में संचालित होता है। बारिश के मौसम में पढ़ाई सबसे अधिक प्रभावित होती है।
पश्चिम चंपारण में 14 साल से भवन का इंतजार, ग्रामीणों ने बनवाया टिन शेड
पश्चिम चंपारण के देवरिया तरुअनवा पंचायत स्थित कुनई लक्ष्मीपुर राजकीय प्राथमिक विद्यालय भी लंबे समय से भवन की समस्या से जूझ रहा है। बताया गया कि विद्यालय पिछले 14 वर्षों से नए भवन का इंतजार कर रहा है। पुराना भवन जर्जर होने के बाद गांव के एक व्यक्ति ने स्कूल के लिए जमीन दान की, लेकिन इसके बावजूद नया भवन नहीं बन सका।
आखिरकार ग्रामीणों ने चंदा जुटाकर चार कमरों वाला टिन शेड तैयार कराया। अब दूसरी से पांचवीं तक की कक्षाएं इसी टिन शेड में संचालित होती हैं, जबकि पहली कक्षा के बच्चों को पेड़ के नीचे पढ़ाया जाता है। स्कूल में 106 बच्चे और छह शिक्षक हैं। विद्यालय में रसोईघर नहीं होने के कारण मध्याह्न भोजन की व्यवस्था के लिए बच्चों को करीब एक किलोमीटर दूर जाना पड़ता है। गर्मी के मौसम में टिन शेड अत्यधिक गर्म हो जाता है और बारिश के दौरान पढ़ाई बाधित होती है।
बेगूसराय में एक कमरे और बरामदे में सिमटा पूरा स्कूल
बेगूसराय के मटिहानी प्रखंड स्थित नवसृजित प्राथमिक विद्यालय, धोबी टोल में 112 बच्चों की पढ़ाई एक सामुदायिक भवन के एक कमरे और एक बरामदे में चल रही है। पहली और दूसरी कक्षा बरामदे में संचालित होती है, जबकि तीसरी, चौथी और पांचवीं कक्षा के बच्चों को एक ही कमरे में बैठाया जाता है।
स्थिति की गंभीरता का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि एक ही ब्लैकबोर्ड का इस्तेमाल करते हुए दो शिक्षक अलग-अलग कक्षाओं को पढ़ाते हैं। विद्यालय में बच्चों के बैठने के लिए पर्याप्त बेंच उपलब्ध नहीं हैं। चापाकल और शौचालय की सुविधा भी नहीं है। स्कूल में तैनात पांच महिला शिक्षकों को शौचालय के लिए आसपास के घरों पर निर्भर रहना पड़ता है।
मुजफ्फरपुर में 200 से ज्यादा बच्चों के लिए सिर्फ दो कमरे और जर्जर टिन शेड
मुजफ्फरपुर के भवनविहीन मध्य विद्यालय नई तालीम में पहली से आठवीं कक्षा तक 228 से अधिक बच्चों का नामांकन है। इतने विद्यार्थियों के लिए विद्यालय में केवल दो कमरे और एक जर्जर टिन शेड उपलब्ध है। पहली से पांचवीं तक की कक्षाएं एक कमरे में चलती हैं, जबकि छठी, सातवीं और आठवीं कक्षा के बच्चों को टिन शेड के नीचे पढ़ना पड़ता है।
विद्यालय में पर्याप्त बेंच-डेस्क नहीं होने के कारण बच्चे दरी पर बैठकर पढ़ाई करते हैं। बारिश के दौरान टिन शेड से पानी टपकता है। तेज हवा चलने पर ब्लैकबोर्ड गिरने का खतरा भी बना रहता है। एक साथ कई कक्षाएं संचालित होने के कारण शिक्षकों के लिए सभी विद्यार्थियों पर समान रूप से ध्यान देना मुश्किल हो जाता है।
कैमूर में जर्जर कमरों के बीच चल रही कई कक्षाएं
कैमूर जिले के अखलासपुर प्राथमिक विद्यालय में 99 बच्चों के लिए केवल तीन शिक्षक हैं। विद्यालय में कुल तीन कमरों में से दो जर्जर स्थिति में हैं। शिक्षकों के अनुसार, कुछ समय पहले छत से प्लास्टर गिरने के कारण एक शिक्षक और एक छात्र घायल भी हुए थे।
कमरों की कमी के कारण पहली, दूसरी और तीसरी कक्षा की पढ़ाई बरामदे में होती है। चौथी और पांचवीं कक्षा के विद्यार्थियों को एक ही कमरे में पढ़ाया जाता है। शिक्षकों का कहना है कि ऐसी स्थिति में सभी बच्चों पर समान रूप से ध्यान देना आसान नहीं है।
पांच जिलों की तस्वीर, समस्या लगभग एक जैसी
सहरसा, पश्चिम चंपारण, बेगूसराय, मुजफ्फरपुर और कैमूर के इन स्कूलों की परिस्थितियां अलग-अलग जरूर हैं, लेकिन उनकी मूल समस्याएं लगभग समान हैं। कहीं स्कूल का अपना भवन नहीं है तो कहीं भवन जर्जर हो चुका है। कुछ विद्यालयों में पीने के पानी की सुविधा नहीं है, जबकि कई जगह शौचालय तक उपलब्ध नहीं है। कई स्कूलों में एक ही कमरे में एक से अधिक कक्षाओं का संचालन हो रहा है और बच्चों को जमीन या दरी पर बैठकर पढ़ना पड़ रहा है।
विभाग को कई बार भेजे गए आवेदन, स्थायी समाधान का इंतजार
स्कूलों के शिक्षकों का कहना है कि भवन और अन्य जरूरी सुविधाओं के लिए शिक्षा विभाग तथा जिला प्रशासन को कई बार पत्र और आवेदन भेजे गए हैं। कुछ जगह अधिकारियों ने स्कूलों का निरीक्षण भी किया। इसके बावजूद कई विद्यालयों में अभी तक स्थायी समाधान नहीं हो पाया है।
कुछ गांवों में स्थानीय लोगों ने अपनी जमीन उपलब्ध कराई, जबकि कहीं ग्रामीणों ने आपस में चंदा जुटाकर अस्थायी टिन शेड बनवाया। इसके बावजूद स्थायी भवन और अन्य बुनियादी सुविधाओं का इंतजार जारी है।
भवनविहीन स्कूलों की सूची फिर मांगी गई
दूसरी ओर, पिछले सप्ताह बिहार सरकार की ओर से जिला शिक्षा पदाधिकारियों को फिर से पत्र भेजकर भवनविहीन स्कूलों की सूची मांगे जाने की बात सामने आई है। इसका उद्देश्य ऐसे विद्यालयों के लिए भवन निर्माण की दिशा में आगे की कार्रवाई करना बताया गया है। हालांकि, इन स्कूलों में स्थायी भवन और सुविधाएं कब तक उपलब्ध हो पाएंगी, यह अभी स्पष्ट नहीं है।
सरकारी स्कूलों में शिक्षा की गुणवत्ता सुधारने के लिए केवल पाठ्यक्रम, शिक्षक और परीक्षा व्यवस्था पर ध्यान देना पर्याप्त नहीं है। बच्चों के लिए सुरक्षित भवन, पर्याप्त कक्षाएं, स्वच्छ पेयजल, शौचालय और बैठने की उचित व्यवस्था भी उतनी ही जरूरी है। बिहार के इन जिलों से सामने आई तस्वीर बताती है कि शिक्षा व्यवस्था में सुधार के दावों के साथ-साथ इन बुनियादी जरूरतों को पूरा करना भी बड़ी चुनौती बनी हुई है।
