erere | Source: erererनई दिल्ली। दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण समुद्री व्यापारिक मार्गों पर इन दिनों एक नई बहस छिड़ गई है। फारस की खाड़ी के प्रवेश द्वार होर्मुज जलडमरूमध्य से लेकर लाल सागर के मुहाने बाब अल-मंडेब तक अब 'टोल टैक्स' को लेकर विवाद गहराता दिखाई दे रहा है। ईरान ने होर्मुज से गुजरने वाले जहाजों से नेविगेशन, सुरक्षा और पर्यावरणीय सेवाओं के नाम पर शुल्क लेने की घोषणा की है, जबकि ईरान समर्थित हूती समूह लाल सागर के रणनीतिक मार्ग बाब अल-मंडेब से गुजरने वाले जहाजों पर भी टोल व्यवस्था लागू करने पर विचार कर रहे हैं। इन घटनाक्रमों ने वैश्विक समुद्री व्यापार, ऊर्जा आपूर्ति और अंतरराष्ट्रीय कानून को लेकर कई नए सवाल खड़े कर दिए हैं।

दुनिया के अधिकांश देशों का आयात-निर्यात समुद्री मार्गों के जरिए होता है। कच्चे तेल, प्राकृतिक गैस, खाद्यान्न, मशीनरी, कंटेनर कार्गो और अन्य आवश्यक वस्तुओं की आपूर्ति के लिए होर्मुज, बाब अल-मंडेब, मलक्का और जिब्राल्टर जैसे समुद्री मार्गों की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण है। यदि इन मार्गों पर किसी भी प्रकार की बाधा या अतिरिक्त शुल्क लगाया जाता है तो उसका सीधा असर वैश्विक व्यापार, ऊर्जा बाजार और कई देशों की अर्थव्यवस्था पर पड़ सकता है। यही वजह है कि ईरान और हूती समूहों के हालिया कदमों ने पूरी दुनिया का ध्यान अपनी ओर आकर्षित किया है।

विशेषज्ञों के अनुसार होर्मुज जलडमरूमध्य दुनिया के सबसे व्यस्त समुद्री मार्गों में शामिल है। खाड़ी क्षेत्र से होने वाले अधिकांश तेल निर्यात का रास्ता इसी जलमार्ग से होकर गुजरता है। दूसरी ओर बाब अल-मंडेब लाल सागर को अदन की खाड़ी और हिंद महासागर से जोड़ता है। यह मार्ग एशिया, यूरोप और अफ्रीका के बीच समुद्री व्यापार की महत्वपूर्ण कड़ी माना जाता है। ऐसे में यदि इन मार्गों पर किसी प्रकार का शुल्क लागू होता है या आवाजाही प्रभावित होती है तो उसका प्रभाव केवल क्षेत्रीय नहीं बल्कि वैश्विक स्तर पर महसूस किया जाएगा।

इसी बीच यह सवाल भी उठने लगा है कि क्या कोई देश या संगठन अंतरराष्ट्रीय समुद्री मार्गों से गुजरने वाले जहाजों से अपनी इच्छा के अनुसार शुल्क वसूल सकता है? क्या अंतरराष्ट्रीय कानून इसकी अनुमति देता है? समुद्री मार्गों का संचालन किन नियमों के तहत होता है और विभिन्न देशों के अधिकारों की सीमा क्या है? इन प्रश्नों के उत्तर समझने के लिए समुद्री कानूनों के इतिहास और अंतरराष्ट्रीय समझौतों को जानना आवश्यक है।

समुद्री सीमाओं को लेकर सदियों पुराना है विवाद

संयुक्त राष्ट्र के अनुसार समुद्री सीमाओं और समुद्री मार्गों पर अधिकार को लेकर विवाद कोई नई बात नहीं है। जहाजों के आविष्कार के साथ ही समुद्री नियंत्रण को लेकर देशों के बीच मतभेद शुरू हो गए थे। माना जाता है कि प्राचीन मिस्र के लोगों द्वारा भूमध्य सागर में नौवहन शुरू करने के समय से ही समुद्री अधिकारों को लेकर बहस का सिलसिला चल रहा है।

वर्ष 1493 में क्रिस्टोफर कोलंबस के अमेरिका पहुंचने के एक वर्ष बाद तत्कालीन पोप अलेक्जेंडर षष्ठम (Alexander VI) ने स्पेन और पुर्तगाल के बीच समुद्री क्षेत्रों के विवाद को सुलझाने का प्रयास किया। उन्होंने 'पोप बुल इंटर कैटेरा' नामक आदेश जारी कर अटलांटिक महासागर में एक काल्पनिक रेखा निर्धारित की। इस आदेश के तहत उस रेखा के पश्चिम का समुद्री क्षेत्र स्पेन और पूर्व का क्षेत्र पुर्तगाल को सौंपा गया। इसके परिणामस्वरूप प्रशांत महासागर और मैक्सिको की खाड़ी स्पेन के प्रभाव क्षेत्र में आए, जबकि दक्षिण अटलांटिक और हिंद महासागर पुर्तगाल के हिस्से माने गए।

इसके बाद वर्ष 1494 में स्पेन और पुर्तगाल के बीच टॉर्डेसिलस संधि हुई, जिसमें इस सीमा रेखा को और पश्चिम की ओर खिसका दिया गया। हालांकि उस समय यह समझौता दोनों देशों के बीच समाधान माना गया, लेकिन समुद्री सीमाओं को लेकर विवाद समाप्त नहीं हुए। समय के साथ नई समुद्री शक्तियां उभरती गईं और समुद्री क्षेत्रों पर अधिकार को लेकर संघर्ष लगातार बढ़ता गया।

ईरान, अमेरिका और होर्मुज जलडमरूमध्य का बढ़ता विवाद

वर्तमान समय में होर्मुज जलडमरूमध्य एक बार फिर अंतरराष्ट्रीय राजनीति का केंद्र बन गया है। अमेरिका और इजरायल के साथ जारी तनाव के बीच ईरान लगातार इस रणनीतिक समुद्री मार्ग पर अपने अधिकार का दावा करता रहा है। ईरान ने पहले भी उन जहाजों पर मिसाइल और ड्रोन हमले किए हैं, जिनके बारे में उसका आरोप था कि उन्होंने उसकी अनुमति के बिना समुद्री मार्ग का उपयोग किया।

अब ईरान ने घोषणा की है कि होर्मुज जलडमरूमध्य से गुजरने वाले जहाजों से नेविगेशन, सुरक्षा और पर्यावरणीय सेवाओं के बदले शुल्क लिया जाएगा। यह प्रस्ताव अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बहस का विषय बन गया है क्योंकि होर्मुज से होकर दुनिया के ऊर्जा व्यापार का बड़ा हिस्सा गुजरता है।

ओमान ने रखा वैकल्पिक प्रस्ताव

रॉयटर्स की रिपोर्ट के अनुसार एक पश्चिमी राजनयिक और एक अन्य सूत्र ने बताया कि ओमान, जो होर्मुज जलडमरूमध्य से जुड़ा दूसरा तटीय देश है, ने ईरान के सामने एक वैकल्पिक प्रस्ताव रखा है। इस प्रस्ताव को पश्चिम एशिया के कई अन्य देशों का भी समर्थन प्राप्त बताया गया है।

इस योजना के तहत होर्मुज जलडमरूमध्य का संयुक्त प्रबंधन किया जा सकता है और इसके उपयोग के लिए स्वैच्छिक शुल्क लेने की व्यवस्था विकसित की जा सकती है। प्रस्ताव का उद्देश्य समुद्री व्यापार में संभावित व्यवधान को रोकना और सभी देशों के लिए सुरक्षित तथा निर्बाध नौवहन सुनिश्चित करना बताया गया है।

अमेरिका ने जताई कड़ी आपत्ति

ईरान की प्रस्तावित शुल्क व्यवस्था पर अमेरिका ने स्पष्ट आपत्ति दर्ज कराई है। एक अमेरिकी अधिकारी ने कहा कि वाशिंगटन किसी भी स्थिति में ईरान को होर्मुज जलडमरूमध्य पर टोल या अन्य शुल्क लगाकर नियंत्रण स्थापित करने की अनुमति नहीं देगा। अधिकारी ने दोहराया कि यह एक अंतरराष्ट्रीय समुद्री मार्ग है और यहां से सभी देशों के जहाजों की निर्बाध आवाजाही सुनिश्चित रहनी चाहिए।

इसी बीच ईरान समर्थित हूती समूह भी लाल सागर के प्रवेश द्वार बाब अल-मंडेब से गुजरने वाले जहाजों के लिए टोल व्यवस्था पर विचार कर रहे हैं। यदि ऐसा होता है तो वैश्विक समुद्री व्यापार के सामने एक और बड़ी चुनौती खड़ी हो सकती है।

कैसे बने अंतरराष्ट्रीय समुद्री कानून?

समुद्री सीमाओं और जलमार्गों को लेकर आज जो अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था दिखाई देती है, वह एक दिन में तैयार नहीं हुई। इसके पीछे कई सदियों का इतिहास, अनेक विवाद और विभिन्न देशों के बीच हुए समझौते शामिल हैं। समय के साथ समुद्री सुरक्षा, व्यापार, प्राकृतिक संसाधनों और नौवहन की बढ़ती जरूरतों ने ऐसे नियमों की आवश्यकता पैदा की, जिनके आधार पर दुनिया के समुद्री मार्गों का संचालन किया जा सके।