लेखक: असगर अली अंसारी
भारत की संसद को लोकतंत्र का सर्वोच्च मंदिर कहा जाता है। यहां देश के भविष्य से जुड़े फैसले लिए जाते हैं और जनता की आवाज को कानून का रूप दिया जाता है। इसलिए यह अपेक्षा की जाती है कि संसद में होने वाली हर बहस मर्यादित, तथ्यपूर्ण और लोकतांत्रिक मूल्यों के अनुरूप हो। लेकिन हाल के वर्षों में संसद की कार्यवाही जिस दिशा में बढ़ती दिखाई दे रही है, वह चिंता का विषय है। वैचारिक बहस की जगह कई बार व्यक्तिगत आरोप-प्रत्यारोप और अमर्यादित भाषा ने ले ली है। यह बदलाव केवल संसद की गरिमा को ही प्रभावित नहीं करता, बल्कि समाज और लोकतांत्रिक संस्कृति पर भी गहरा असर डालता है।
संसद की गरिमा पर उठते सवाल
लोकसभा और राज्यसभा देश की सर्वोच्च लोकतांत्रिक संस्थाएं हैं, जहां सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच स्वस्थ बहस लोकतंत्र की मजबूती का प्रतीक मानी जाती है। लेकिन जब बहस के दौरान व्यक्तिगत टिप्पणियां, कटाक्ष और असंसदीय भाषा का प्रयोग बढ़ने लगे, तो यह संसद की गरिमा पर सवाल खड़े करता है। लोकतंत्र में मतभेद होना स्वाभाविक है, लेकिन उन मतभेदों को व्यक्त करने का तरीका भी लोकतांत्रिक और मर्यादित होना चाहिए। संसद में बैठने वाले जनप्रतिनिधि पूरे देश के लिए उदाहरण होते हैं और उनकी भाषा भी उसी स्तर की होनी चाहिए।
समाज और नई पीढ़ी पर पड़ता है सीधा असर
राजनीति का प्रभाव केवल संसद तक सीमित नहीं रहता। नेता जिस भाषा और व्यवहार का इस्तेमाल करते हैं, वही धीरे-धीरे समाज में भी दिखाई देने लगता है। आज सोशल मीडिया पर राजनीतिक मतभेद अक्सर गाली-गलौज और व्यक्तिगत हमलों में बदल जाते हैं। कई बार जाति, धर्म और समुदाय के आधार पर भी अभद्र टिप्पणियां देखने को मिलती हैं। जब देश के सर्वोच्च मंच पर भाषा की मर्यादा कमजोर पड़ती है, तो समाज में भी संवाद की संस्कृति प्रभावित होती है। सबसे ज्यादा असर नई पीढ़ी पर पड़ता है, जो सार्वजनिक जीवन में नेताओं को अपना आदर्श मानती है।
लोकतंत्र बचाना है तो संवाद की संस्कृति लौटानी होगी
लोकतंत्र केवल चुनाव जीतने का नाम नहीं है, बल्कि असहमति के बीच सम्मान बनाए रखने की व्यवस्था भी है। राजनीतिक दलों को यह समझना होगा कि जनता उनसे मुद्दों पर बहस और समाधान की उम्मीद करती है, न कि व्यक्तिगत कटाक्ष और अपमानजनक भाषा की। चुनाव आयोग, संसद और अन्य संवैधानिक संस्थाओं को भी संसदीय मर्यादा बनाए रखने के लिए प्रभावी कदम उठाने चाहिए। यदि भारत के लोकतंत्र को और मजबूत बनाना है, तो राजनीति में शालीनता, संयम और सम्मान की संस्कृति को फिर से स्थापित करना होगा। विचारों की लड़ाई लोकतंत्र की ताकत है, लेकिन गाली-गलौज कभी भी लोकतंत्र की पहचान नहीं हो सकती।
