भारत में ओरल कैंसर सबसे ज्यादा पुरुषों में होता है. हर साल लगभग एक लाख ओरल कैंसर के मामले सामने आ जाते हैं. इनमें से अधिकांश की जान चली जाती है. ओरल कैंसर के लिए अब तक सबसे अच्छा इलाज कीमोथेरेपी को माना जाता है. हालांकि कीमोथेरेपी में कैंसर कोशिकाओं के साथ-साथ हेल्दी कोशिकाएं भी प्रभावित हो जाती हैं।लेकिन अच्छी ख़बर ये हैं कि प्रतिष्ठित भारतीय संस्थान इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ साइंस, बेंगलुरु के वैज्ञानिकों ने इसका जबर्दस्त तोड़ निकाल लिया है. वैज्ञानिकों ने अल्ट्रासाउंड से निकलने वाले वेव से ही कैंसर कोशिकाओं को मारने में सफलता प्राप्त की है. यानी अल्ट्रासाउंड की मशीन से ही कैंसर कोशिकाओं को मार दिया जाएगा.

Source : News18
कैंसर का इलाज अब लो-फ्रीक्वेंसी अल्ट्रासाउंडके ध्वनि तरंगों
आईआईएससी के वैज्ञानिकों ने अपनी रिसर्च में पाया कि लो-फ्रीक्वेंसी अल्ट्रासाउंड ओरल कैंसर की कोशिकाओं को सटीकता से नष्ट कर सकता है और हेल्दी कोशिकाओं को काफी हद तक सुरक्षित रखता है। वैज्ञानिकों का मानना है कि भविष्य में यह तकनीक लाखों मरीजों के लिए कम तकलीफ वाला और अधिक सुरक्षित इलाज साबित हो सकती है।
अल्ट्रासाउंड मशीनें सामान्यतः 2 मेगाहर्ट्ज से 18 मेगाहर्ट्ज या उससे अधिक फ्रीक्वेंसी पर काम करती हैं। एक मेगाहर्ट्ज का अर्थ है कि ध्वनि तरंगें एक सेकंड में 10 लाख बार कंपन करती हैं। ये तरंगें शरीर के अंदर जाकर टिश्यू से टकराकर वापस लौटती हैं। इसी सिद्धांत का उपयोग करते हुए वैज्ञानिकों ने कैंसर कोशिकाओं पर प्रभावी हमला किया।
ट्यूमर के नमूने पर सफल रहा परीक्षा
यह अध्ययन आईआईएससी के वैज्ञानिकों ने एमएस रामैया मेडिकल कॉलेज एंड हॉस्पिटल्स के डॉक्टरों के साथ मिलकर किया है. इसमें ओरल कैंसर से पीड़ित मरीजों में से ट्यूमर के नमूनों को ले लिया गया. उसके बाद इन नमूनों पर लो फ्रीक्वेंसी वाले अल्ट्रासाउंड से आघात कराया गया. फिर इसका परीक्षण किया गया. इसमें मरीजों से सीधे लिए गए ट्यूमर के नमूनों का उपयोग किया गया जिससे आगे की प्रक्रिया बेहद आसान हो गई. आमतौर पर लैब में इस तरह की कोशिकाएं चूहों से बनाई जाती है. इसका फायदा यह हुआ कि शोधकर्ताओं को भारतीय मरीजों में पाए जाने वाले कैंसर की विविधता को बेहतर ढंग से समझने और उसका आकलन करने में मदद मिली. शोधकर्ताओं ने पाया कि ओरल कैंसर की कोशिकाएं अल्ट्रासाउंड से उत्पन्न मध्यम स्तर के यांत्रिक दबाव के प्रति बेहद संवेदनशील होती हैं. ऐसा इसलिए है क्योंकि इन कैंसर कोशिकाओं में ट्रोपोमायोसिन 2.1 नामक प्रोटीन का स्तर सामान्य से कम होता है. जब इन कोशिकाओं को लो-फ्रीक्वेंसी अल्ट्रासाउंड के संपर्क में लाया गया, तो कैंसर कोशिकाएं चुनिंदा रूप से नष्ट हो गईं. दूसरी ओर मुंह की हेल्दी एपिथीलियल कोशिकाएं काफी हद तक सुरक्षित रहीं.
ओरल कैंसर के इलाज का नया विकल्प भविष्य में बन सकती है तकनीक
अध्ययन के सह-लेखक और IISc के बायोइंजीनियरिंग विभाग के सहायक प्रोफेसर अजय तिजोरे ने कहा कि इस शोध की सबसे बड़ी खासियत यह है कि अल्ट्रासाउंड आधारित मैकेनोस्टिम्यूलेशन कैंसर कोशिकाओं की यांत्रिक कमजोरी का फायदा उठाकर उन्हें चुनिंदा तरीके से निशाना बना सकता है। इस तकनीक में दवाओं की बजाय मध्यम स्तर के मैकेनिकल प्रेशर का उपयोग किया जाता है, जिससे कैंसर कोशिकाएं दोबारा ठीक नहीं हो पातीं और नष्ट हो जाती हैं। अध्ययन में यह भी पाया गया कि लो-फ्रीक्वेंसी अल्ट्रासाउंड कैंसर कोशिकाओं के आसपास के टिश्यू में फैलने और घुसपैठ करने की क्षमता को भी काफी हद तक कम कर देता है।
अध्ययन की लेखिका और आईआईएससी की पीएचडी शोधार्थी रश्मिता लुहा ने कहा हमें सबसे ज्यादा हैरानी इस बात से हुई कि अलग-अलग मरीजों और कैंसर के विभिन्न चरणों से प्राप्त कैंसर कोशिकाओं में अल्ट्रासाउंड का प्रभाव लगभग एक जैसा था. सभी कैंसर कोशिकाएं अल्ट्रासाउंड के प्रति बेहद संवेदनशील थीं जबकि सामान्य कोशिकाओं पर इसका असर बहुत कम पड़ा. चूंकि अल्ट्रासाउंड तकनीक पहले से ही चिकित्सा क्षेत्र में व्यापक रूप से इस्तेमाल की जाती है और यह एक आसान प्रक्रिया है, इसलिए शोधकर्ताओं का मानना है कि यह खोज भविष्य में ओरल कैंसर के इलाज के लिए मील का पत्थर साबित हो सकता है.
