eree | Source: rereनई दिल्ली। बच्चों की परवरिश के दौरान माता-पिता को कई ऐसी आदतों का सामना करना पड़ता है, जिन्हें संभालना उनके लिए मुश्किल हो जाता है। बच्चा बार-बार सवाल करे, अपनी बात पर अड़ा रहे, माता-पिता की बात को चुनौती दे या तय की गई सीमाओं को परखने की कोशिश करे तो अक्सर इसे जिद, बदतमीजी या अनुशासन की कमी समझ लिया जाता है। लेकिन पेरेंटिंग एक्सपर्ट इशिता बी. सदाना के मुताबिक, हर बार ऐसा व्यवहार नकारात्मक नहीं होता। कुछ परिस्थितियों में यही आदतें बच्चे की मजबूत व्यक्तित्व क्षमता और नेतृत्व के गुणों की ओर भी इशारा कर सकती हैं।

बात-बात पर बहस करता है बच्चा तो तुरंत परेशान न हों

पेरेंटिंग एक्सपर्ट इशिता बी. सदाना के अनुसार, अगर बच्चा छोटी-छोटी बातों पर बहस करता है, अपनी बात रखने की कोशिश करता है और किसी बात को बिना समझे स्वीकार करने के बजाय सवाल करता है, तो माता-पिता को उसके व्यवहार को केवल जिद के नजरिए से नहीं देखना चाहिए।

ऐसे बच्चे अपनी सोच को व्यक्त करने और अपने तर्क के आधार पर बात मनवाने की कोशिश कर सकते हैं। वे कई बार माता-पिता के सामने अपनी बात आत्मविश्वास के साथ रखते हैं। हालांकि, इसका मतलब यह नहीं कि बच्चे की हर जिद को स्वीकार कर लिया जाए। जरूरत इस बात की है कि उसके व्यवहार को समझते हुए उसे सही तरीके से दिशा दी जाए।

सीमाओं को बार-बार परखना भी हो सकता है एक संकेत

एक्सपर्ट ने बच्चों की ऐसी आदतों का भी जिक्र किया है, जिनमें वे बार-बार तय की गई सीमाओं को परखने की कोशिश करते हैं। माता-पिता के लिए यह व्यवहार काफी चुनौतीपूर्ण हो सकता है। उन्हें लगता है कि बच्चा जानबूझकर नियम तोड़ रहा है या उनकी बात नहीं मान रहा है।

लेकिन बच्चों के विकास के दौरान अपने आसपास की सीमाओं को समझने और उन्हें परखने की प्रवृत्ति भी दिखाई दे सकती है। ऐसे समय में माता-पिता का शांत रहना और स्पष्ट नियम तय करना महत्वपूर्ण हो सकता है। बच्चे को यह समझाना जरूरी है कि अपनी बात रखने की स्वतंत्रता के साथ जिम्मेदारी और दूसरों की सीमाओं का सम्मान भी जरूरी है।

जिद को सिर्फ कमजोरी समझना सही नहीं

कई माता-पिता बच्चे के जिद्दी व्यवहार से परेशान होकर उसे बदलने की कोशिश करते हैं। एक्सपर्ट इशिता बी. सदाना का कहना है कि अगर बच्चा अपनी बात को लेकर दृढ़ है और किसी चीज को हासिल करने के लिए लगातार प्रयास करता है, तो इस व्यवहार में दृढ़ता का तत्व भी हो सकता है।

हालांकि, दृढ़ता और जिद के बीच अंतर समझना जरूरी है। बच्चे को अपनी बात पर कायम रहने के साथ यह भी सिखाना चाहिए कि कब अपनी गलती स्वीकार करनी है, कब दूसरे की बात सुननी है और कब परिस्थिति के अनुसार अपना फैसला बदलना उचित है। यही संतुलन उसके व्यक्तित्व को मजबूत बनाने में मदद कर सकता है।

माता-पिता को चुनौती देना हमेशा बुरी बात नहीं

कुछ बच्चे अपने माता-पिता से सवाल करते हैं, उनकी बातों को चुनौती देते हैं और हर निर्देश के पीछे कारण जानना चाहते हैं। ऐसे व्यवहार से घर में बहस की स्थिति बन सकती है और माता-पिता का धैर्य भी जवाब दे सकता है।

लेकिन अगर बच्चा सम्मानजनक तरीके से सवाल पूछ रहा है और अपनी सोच व्यक्त करना चाहता है, तो उसे पूरी तरह दबाने के बजाय बातचीत के जरिए समझाना अधिक उपयोगी हो सकता है। बच्चे में सवाल पूछने की आदत उसकी जिज्ञासा और स्वतंत्र सोच से भी जुड़ी हो सकती है।

अपनी बात मनवाने की कोशिश में दिखता है आत्मविश्वास

एक्सपर्ट के मुताबिक, यदि बच्चा आत्मविश्वास के साथ अपनी बात माता-पिता के सामने रखता है और उन्हें अपनी राय समझाने की कोशिश करता है, तो यह उसके आत्मविश्वास का संकेत हो सकता है। ऐसे बच्चे भविष्य में सार्वजनिक रूप से अपनी बात रखने में सहज हो सकते हैं।

इसी वजह से बच्चों की ऐसी प्रवृत्तियों को पूरी तरह खत्म करने के बजाय उन्हें सही दिशा देना जरूरी है। बच्चे को यह सिखाया जा सकता है कि अपनी राय मजबूती से रखना अच्छी बात है, लेकिन दूसरे व्यक्ति की राय सुनना और उसका सम्मान करना भी उतना ही महत्वपूर्ण है।

बच्चे की ‘स्पिरिट’ तोड़ने के बजाय सही दिशा दें

इशिता बी. सदाना ने माता-पिता से बच्चों की ऐसी व्यक्तित्व विशेषताओं को समझने की अपील की है। उनका कहना है कि अगर बच्चा आत्मविश्वास से अपनी बात रखता है, सीमाओं को परखता है, जिद करता है या माता-पिता को चुनौती देता है तो हर बार उसे केवल समस्या के रूप में नहीं देखना चाहिए।

माता-पिता की भूमिका बच्चे की ऊर्जा और आत्मविश्वास को दबाने की बजाय उसे सकारात्मक दिशा देने की हो सकती है। यदि बच्चा अपनी बात रखने के साथ दूसरों की भावनाओं और नियमों को समझना सीखता है, तो उसका व्यक्तित्व अधिक संतुलित तरीके से विकसित हो सकता है।

क्या हर जिद्दी बच्चा लीडर बनता है?

यह समझना भी जरूरी है कि इन आदतों का होना अपने आप में यह गारंटी नहीं है कि बच्चा भविष्य में नेता ही बनेगा। नेतृत्व क्षमता कई अलग-अलग गुणों के मेल से विकसित होती है। आत्मविश्वास, निर्णय लेने की क्षमता, जिम्मेदारी, दूसरों की बात सुनना, समस्या का समाधान करना और सही समय पर सही फैसला लेना जैसे गुण भी महत्वपूर्ण होते हैं।

इसलिए किसी बच्चे के बहस करने या जिद करने को सीधे नेतृत्व क्षमता का प्रमाण मानने के बजाय उसके पूरे व्यवहार और विकास को समझना जरूरी है। एक्सपर्ट का मुख्य जोर इस बात पर है कि माता-पिता बच्चे के व्यक्तित्व में मौजूद सकारात्मक गुणों को पहचानें और उन्हें स्वस्थ तरीके से विकसित होने का अवसर दें।

पेरेंटिंग मुश्किल है, लेकिन नजरिया बदलने से आसान हो सकती है

बच्चों की परवरिश निश्चित रूप से चुनौतीपूर्ण हो सकती है। हर बच्चा अलग स्वभाव और व्यक्तित्व के साथ बड़ा होता है। ऐसे में एक ही तरीका हर बच्चे पर समान रूप से लागू नहीं किया जा सकता। माता-पिता को बच्चे के व्यवहार को समझने के साथ उसकी जरूरतों और व्यक्तित्व के अनुसार प्रतिक्रिया देने की कोशिश करनी चाहिए।

इशिता बी. सदाना के अनुसार, माता-पिता अगर बच्चे की मुश्किल आदतों को थोड़ा अलग नजरिए से देखने की कोशिश करें तो कई बार उन व्यवहारों के पीछे छिपे सकारात्मक पहलुओं को समझ सकते हैं। उनका कहना है कि पेरेंटिंग कठिन हो सकती है, लेकिन इसे केवल परेशानी के तौर पर देखने के बजाय सीखने और बच्चे को समझने की प्रक्रिया के रूप में भी देखा जा सकता है।