नई दिल्ली। हत्या के एक मामले में जमानत पर जेल से बाहर आए आरोपी के सोशल मीडिया वीडियो ने ऐसा विवाद खड़ा किया कि मामला सुप्रीम कोर्ट तक पहुंच गया। आरोपी ने वीडियो में कथित तौर पर कहा था कि देश में पैसा और प्रभाव हो तो कुछ भी हासिल किया जा सकता है। शिकायतकर्ता ने इसी बयान को आधार बनाकर उसकी जमानत रद्द करने की मांग की। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने इस दलील को स्वीकार नहीं किया और पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट से मिली जमानत में हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया।
जमानत मिलने के बाद वीडियो से शुरू हुआ विवाद
मामला तब चर्चा में आया जब आरोपी को पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट से जमानत मिलने के बाद उसने सोशल मीडिया पर एक वीडियो साझा किया। शिकायतकर्ता की ओर से कहा गया कि वीडियो में आरोपी का बयान इस बात की ओर इशारा करता है कि उसने पैसे और प्रभाव के सहारे जमानत हासिल की है। इसी आधार पर सुप्रीम कोर्ट में जमानत रद्द करने की मांग वाली याचिका दाखिल की गई।
सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने हालांकि आरोपी के वीडियो को जमानत रद्द करने के लिए पर्याप्त आधार नहीं माना। अदालत ने सुनवाई के दौरान कहा कि जेल से बाहर आने के बाद किसी व्यक्ति का अपनी आजादी का जश्न मनाना अपने आप में गलत नहीं है।
‘अगर पैसा होता तो जेल क्यों जाता?’
सुनवाई के दौरान पीठ ने आरोपी के कथित बयान और उसके जेल में रहने की अवधि के संदर्भ में सवाल उठाया। अदालत ने कहा कि आरोपी के बयान से यह साबित नहीं होता कि उसने पैसे या प्रभाव का इस्तेमाल करके जमानत हासिल की।
पीठ ने यह भी टिप्पणी की कि यदि आरोपी के पास इतना पैसा और प्रभाव पहले से होता कि वह जमानत खरीद सकता, तो वह इतने लंबे समय तक जेल में क्यों रहता। अदालत ने यह भी कहा कि वकीलों को अपनी सेवाओं के लिए फीस देनी पड़ती है।
पांचवीं कोशिश में मिली थी हाई कोर्ट से जमानत
आरोपी ने जमानत पाने के लिए पहले निचली अदालत का रुख किया था, लेकिन उसकी याचिका खारिज हो गई। इसके बाद उसने पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट में जमानत के लिए आवेदन किए। शुरुआती चार प्रयासों में उसे राहत नहीं मिली।
लगातार याचिकाएं खारिज होने के बाद आखिरकार 23 अप्रैल 2026 को हाई कोर्ट ने उसकी पांचवीं जमानत याचिका स्वीकार कर ली। इसके बाद आरोपी जेल से बाहर आया और कथित तौर पर सोशल मीडिया पर वह वीडियो पोस्ट किया, जिसे बाद में शिकायतकर्ता ने सुप्रीम कोर्ट में जमानत रद्द कराने का आधार बनाया।
जमीन विवाद से शुरू हुआ था पूरा मामला
यह मामला हरियाणा के बेरला गांव से जुड़ा है। जानकारी के अनुसार आरोपी और उसके पड़ोसी के बीच जमीन को लेकर विवाद चल रहा था। दोनों पक्ष एक जमीन पर अपना दावा कर रहे थे। विवाद उस समय बढ़ गया जब दूसरे पक्ष की ओर से वहां टिन शेड लगाने की कोशिश की गई।
अभियोजन पक्ष के अनुसार इसी दौरान झगड़ा हुआ। आरोप है कि आरोपी ने एक महिला के सिर पर डंडे से वार किया, जिससे उसे चोट लगी। महिला के पति पर भी कथित तौर पर कुल्हाड़ी से हमला किए जाने का आरोप लगाया गया था। बाद में उस व्यक्ति की मौत हो गई।
अक्टूबर 2022 में हुई थी गिरफ्तारी
मामले में आरोपी को अक्टूबर 2022 में गिरफ्तार किया गया था। वह करीब साढ़े तीन साल तक जेल में रहा। वर्ष 2024 में सेशन कोर्ट ने उसकी जमानत याचिका खारिज कर दी थी। इसके बाद उसने हाई कोर्ट में राहत पाने की कोशिश की, लेकिन चार बार उसकी याचिकाएं खारिज हुईं।
पांचवीं याचिका पर हाई कोर्ट ने उसे जमानत दे दी। हाई कोर्ट के आदेश में मामले से जुड़े साक्ष्यों और पोस्टमार्टम रिपोर्ट का भी उल्लेख किया गया था।
पोस्टमार्टम रिपोर्ट और बरामद हथियार पर हाई कोर्ट की टिप्पणी
हाई कोर्ट ने अपने आदेश में कहा था कि आरोपी के खिलाफ लगाए गए आरोप पोस्टमार्टम रिपोर्ट में सामने आए तथ्यों से मेल नहीं खाते। अदालत के अनुसार मृतक के शरीर पर धारदार हथियार से चोट के निशान नहीं मिले थे।
मामले में मौके से भी कुल्हाड़ी की बजाय डंडा मिलने की बात सामने आई थी। इन परिस्थितियों को देखते हुए हाई कोर्ट ने आरोपी को जमानत देने का फैसला किया था।
साढ़े तीन साल जेल में रहने और सुनवाई की रफ्तार का भी मुद्दा
सुप्रीम कोर्ट के सामने यह तथ्य भी रखा गया कि आरोपी लंबे समय से जेल में था और मामले में आठ गवाहों की गवाही पूरी हो चुकी थी। अदालत ने संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत त्वरित सुनवाई के अधिकार से जुड़े पहलू को भी ध्यान में रखा।
इसका अर्थ यह है कि लंबे समय तक मुकदमे की प्रक्रिया चलने और आरोपी के लगातार हिरासत में रहने की स्थिति को भी अदालत ने जमानत के सवाल पर विचार करते समय महत्व दिया।
सुप्रीम कोर्ट ने हाई कोर्ट के आदेश में दखल नहीं दिया
मामले की सुनवाई जस्टिस विक्रम नाथ, जस्टिस ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह और जस्टिस संदीप मेहता की पीठ ने की। शिकायतकर्ता की ओर से आरोपी के सोशल मीडिया वीडियो को जमानत रद्द करने का आधार बताया गया था।
हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने माना कि वीडियो में कही गई बात से यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि आरोपी ने पैसे या प्रभाव का इस्तेमाल करके जमानत हासिल की। अदालत ने पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट के जमानत आदेश में हस्तक्षेप करने से इनकार करते हुए चुनौती देने वाली याचिका खारिज कर दी।
सोशल मीडिया बयान और जमानत के कानूनी आधार अलग
इस मामले में अदालत की टिप्पणी का एक महत्वपूर्ण पहलू यह रहा कि किसी आरोपी की ओर से जमानत मिलने के बाद कही गई बात और जमानत देने के न्यायिक आधार को अलग-अलग देखा गया। केवल सोशल मीडिया पर किया गया कथित दावा अपने आप में यह साबित नहीं करता कि जमानत किसी अनुचित तरीके से हासिल की गई थी।
सुप्रीम कोर्ट ने उपलब्ध परिस्थितियों के आधार पर हाई कोर्ट के फैसले को बरकरार रखा और जमानत रद्द करने की मांग को स्वीकार नहीं किया।
