ere | Source: ererप्रयागराज। सावन और कांवड़ यात्रा के दौरान उत्तर प्रदेश में कांवड़ यात्रा मार्गों पर मांस की दुकानों को बंद रखने की व्यवस्था एक बार फिर अदालत पहुंची, लेकिन इलाहाबाद हाई कोर्ट ने इसे चुनौती देने वाली याचिका को खारिज कर दिया। अमरोहा निवासी और अधिवक्ता नासिर फारूक ने चिकन-मटन की दुकानों को बंद कराने के लिए जारी प्रशासनिक नोटिस के खिलाफ जनहित याचिका दाखिल की थी। अदालत ने सुनवाई के बाद याचिका को जनहित के बजाय प्रचार पाने के उद्देश्य से दाखिल की गई याचिका बताया।

मामले की सुनवाई इलाहाबाद हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश अरुण भंसाली और न्यायमूर्ति क्षितिज शैलेन्द्र की खंडपीठ ने की। याचिकाकर्ता की ओर से कांवड़ यात्रा के दौरान मांस की दुकानों को बंद रखने के प्रशासनिक निर्देशों पर सवाल उठाए गए थे। वहीं, राज्य सरकार की ओर से अपर मुख्य स्थायी अधिवक्ता रामानंद पांडेय ने याचिका का विरोध किया।

दुकानदारों की आजीविका और कारोबार के अधिकार का दिया गया हवाला

नासिर फारूक की ओर से दाखिल याचिका में कहा गया था कि सावन और कांवड़ यात्रा के दौरान चिकन-मटन की दुकानों को बंद कराने के लिए प्रशासन की ओर से नोटिस जारी किए गए। याचिका में इस बात पर भी आपत्ति जताई गई कि संबंधित नोटिस पर तारीख नहीं थी।

याचिकाकर्ता का तर्क था कि इस तरह की कार्रवाई का सीधा असर दुकानदारों और वहां काम करने वाले लोगों की रोजी-रोटी पर पड़ता है। याचिका में दावा किया गया कि इस व्यवस्था से बड़ी संख्या में लोगों की आजीविका प्रभावित हो रही है। इसी आधार पर प्रशासनिक नोटिस को रद्द करने की मांग की गई थी।

संविधान के अनुच्छेद 19(1)(g) का भी उठाया गया सवाल

मामले में कारोबार करने के संवैधानिक अधिकार का मुद्दा भी सामने आया। संविधान का अनुच्छेद 19(1)(g) नागरिकों को कोई पेशा अपनाने, कारोबार करने या व्यवसाय करने की स्वतंत्रता देता है। हालांकि यह अधिकार पूर्ण और असीमित नहीं है।

संविधान के अनुच्छेद 19(6) के तहत राज्य उचित कानूनी प्रतिबंध लगा सकता है। ऐसे में किसी व्यवसाय पर लगाया गया प्रतिबंध किस आधार पर लगाया गया है, उसका उद्देश्य क्या है और उसकी सीमा तथा अवधि कितनी है, ये सभी प्रश्न न्यायिक समीक्षा के दायरे में आ सकते हैं। इसी संवैधानिक संतुलन को लेकर इस मामले में भी सवाल उठाए गए थे।

हाई कोर्ट ने याचिका की मंशा पर ही उठा दिया सवाल

मामले में पहले हाई कोर्ट की ओर से संबंधित अधिकारियों को नोटिस जारी कर स्पष्टीकरण मांगा गया था। अधिकारियों से जवाब मिलने के बाद शुक्रवार को मामले की दोबारा सुनवाई हुई। दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद अदालत ने याचिका की प्रकृति और उसके उद्देश्य पर टिप्पणी की।

हाई कोर्ट ने कहा कि याचिका जनहित के बजाय प्रचार पाने के उद्देश्य से दायर की गई प्रतीत होती है। अदालत ने यह भी ध्यान में रखा कि याचिकाकर्ता स्वयं अधिवक्ता है। कोर्ट ने उसकी ओर से दाखिल याचिका को वास्तविक जनहित से जुड़ी याचिका के बजाय ‘पब्लिसिटी इंटरेस्ट’ से प्रेरित माना।

कोर्ट ने आखिरकार याचिका कर दी खारिज

दोनों पक्षों को सुनने और मामले से जुड़े तथ्यों पर विचार करने के बाद इलाहाबाद हाई कोर्ट ने कांवड़ यात्रा मार्ग पर चिकन-मटन की दुकानों को बंद करने के लिए जारी नोटिस के खिलाफ दाखिल याचिका को खारिज कर दिया।

इस फैसले के साथ कांवड़ यात्रा मार्ग पर मांस की दुकानों को बंद रखने के प्रशासनिक निर्णय को चुनौती देने वाली यह याचिका समाप्त हो गई। अदालत की टिप्पणी का मुख्य केंद्र याचिका की कथित जनहित प्रकृति और उसके पीछे की मंशा रही।

राज्य सरकार ने किया याचिका का विरोध

सुनवाई के दौरान उत्तर प्रदेश सरकार की ओर से अपर मुख्य स्थायी अधिवक्ता रामानंद पांडेय ने याचिका का विरोध किया। राज्य सरकार ने अदालत के सामने अपना पक्ष रखा और याचिका को स्वीकार किए जाने का विरोध किया।

इसके बाद खंडपीठ ने याचिकाकर्ता और राज्य सरकार की दलीलों पर विचार किया। अदालत ने मामले को जनहित की कसौटी पर परखा और अंततः याचिका को खारिज करने का फैसला सुनाया।

कांवड़ यात्रा और मांस की दुकानों का विवाद नया नहीं

कांवड़ यात्रा मार्गों पर मांस और चिकन की दुकानों को बंद रखने का मुद्दा पहली बार अदालत तक नहीं पहुंचा है। इससे पहले भी उत्तर प्रदेश में इस व्यवस्था को लेकर कानूनी चुनौती सामने आ चुकी है।

जुलाई 2024 में वाराणसी नगर निगम की ओर से कांवड़ मार्ग पर मांस और पोल्ट्री की दुकानों को बंद करने के निर्देश का मामला भी इलाहाबाद हाई कोर्ट पहुंचा था। उस मामले में राष्ट्रीय लोकतांत्रिक पार्टी के मोहम्मद सुहैल की ओर से जनहित याचिका दाखिल की गई थी।

रिपोर्टों के अनुसार, उस समय वाराणसी के कांवड़ मार्ग पर करीब 96 मांस की दुकानें प्रभावित होने की बात सामने आई थी। इससे स्पष्ट है कि कांवड़ यात्रा के दौरान मांस की दुकानों को लेकर प्रशासनिक फैसले और कारोबार के अधिकार के बीच संतुलन का मुद्दा पहले भी कानूनी बहस का हिस्सा रहा है।

कांवड़ यात्रा के दौरान प्रशासनिक व्यवस्था का मुद्दा

सावन के महीने में कांवड़ यात्रा उत्तर प्रदेश के कई हिस्सों से होकर गुजरती है। यात्रा के दौरान बड़ी संख्या में श्रद्धालु विभिन्न मार्गों से गुजरते हैं। इसी अवधि में यात्रा मार्गों पर व्यवस्थाओं को लेकर स्थानीय प्रशासन की ओर से अलग-अलग कदम उठाए जाते हैं।

मांस की दुकानों को बंद रखने के प्रशासनिक निर्देशों का एक पक्ष यात्रा मार्गों की व्यवस्था से जुड़ा है, जबकि दूसरी ओर दुकानदारों और कर्मचारियों की आजीविका तथा व्यवसाय करने के अधिकार का सवाल उठता है। इसी वजह से इस तरह के प्रशासनिक फैसले कई बार राजनीतिक, सामाजिक और कानूनी चर्चा का विषय बनते रहे हैं।

इस मामले में हाई कोर्ट की टिप्पणी क्यों अहम है?

इस मामले में अदालत का फैसला इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि याचिकाकर्ता ने प्रशासनिक नोटिस को चुनौती देने के साथ कारोबार और आजीविका प्रभावित होने का मुद्दा उठाया था। इसके बावजूद अदालत ने याचिका को जनहित की कसौटी पर स्वीकार नहीं किया और उसकी मंशा पर टिप्पणी करते हुए इसे प्रचार पाने के उद्देश्य से दाखिल बताया।

अदालत के इस रुख से यह स्पष्ट है कि किसी याचिका में सार्वजनिक हित का दावा किया जाना अपने आप में पर्याप्त नहीं है। अदालत याचिका की प्रकृति, तथ्यों और उसके पीछे के उद्देश्य पर भी विचार कर सकती है।

आगे की बहस में क्या मुद्दे बने रहेंगे?

कांवड़ यात्रा मार्गों पर मांस की दुकानों को बंद रखने जैसे मामलों में कारोबार की स्वतंत्रता, आजीविका, प्रशासनिक अधिकार, सार्वजनिक व्यवस्था और धार्मिक आयोजनों के दौरान लागू की जाने वाली व्यवस्थाओं के बीच संतुलन का सवाल महत्वपूर्ण बना रहता है।

हालांकि, मौजूदा मामले में इलाहाबाद हाई कोर्ट ने नासिर फारूक की याचिका को खारिज कर दिया है और अदालत ने इसे जनहित के बजाय प्रचार पाने के उद्देश्य से दाखिल की गई याचिका माना है।