बिहार के जमुई जिले के सतायन गांव में स्थित एक साधारण सा कुआं इन दिनों लोगों की आस्था का बड़ा केंद्र बन गया है। दावा किया जा रहा है कि इस कुएं की मिट्टी शरीर पर लगाने और इसके पानी से स्नान करने से दाद, खाज, खुजली समेत कई चर्म रोगों में राहत मिलती है। सोशल मीडिया पर वायरल हुए वीडियो के बाद यहां हर सप्ताह हजारों लोग पहुंच रहे हैं। हालांकि इन दावों की अब तक कोई वैज्ञानिक पुष्टि नहीं हुई है।

आस्था ने बढ़ाई भीड़, दूर-दूर से पहुंच रहे लोग

जमुई सदर प्रखंड के सतायन गांव स्थित प्लस टू हाई स्कूल परिसर का यह कुआं पिछले कुछ महीनों से चर्चा का विषय बना हुआ है। स्थानीय मान्यताओं और सोशल मीडिया पर वायरल खबरों के कारण यहां लोगों की भीड़ लगातार बढ़ रही है। बिहार के विभिन्न जिलों के अलावा उत्तर प्रदेश और पश्चिम बंगाल से भी लोग यहां पहुंच रहे हैं। सप्ताहांत में कुएं के आसपास मेले जैसा माहौल देखने को मिलता है, जहां हजारों लोग स्नान कर अपनी त्वचा संबंधी समस्याओं से राहत की उम्मीद करते हैं।

मिट्टी लगाकर स्नान करने की अनोखी परंपरा

कुएं पर आने वाले श्रद्धालु पहले शरीर पर यहां की मिट्टी लगाते हैं और कुछ समय बाद कुएं के पानी से स्नान करते हैं। लोगों का विश्वास है कि ऐसा करने से चर्म रोगों में लाभ मिलता है। कई श्रद्धालुओं का दावा है कि लंबे समय तक इलाज कराने के बावजूद उन्हें राहत नहीं मिली थी, लेकिन यहां आने के बाद उनकी परेशानी कम हुई। हालांकि इन दावों की पुष्टि किसी चिकित्सा या वैज्ञानिक संस्था ने नहीं की है।

वैज्ञानिक जांच के बिना दावों पर सवाल

कुएं की बढ़ती लोकप्रियता के बीच सबसे बड़ा सवाल यह है कि आखिर इसके पानी और मिट्टी में ऐसा क्या है। अब तक न तो कुएं के पानी की लैब जांच हुई है और न ही मिट्टी के गुणों का कोई वैज्ञानिक अध्ययन सामने आया है। विशेषज्ञों का मानना है कि किसी भी उपचार को प्रभावी मानने से पहले उसके पीछे वैज्ञानिक प्रमाण होना जरूरी है। ऐसे में फिलहाल इस कुएं से जुड़े दावों को आस्था और व्यक्तिगत अनुभवों तक ही सीमित माना जा सकता है।

डॉक्टरों की सलाह और स्थानीय अर्थव्यवस्था को फायदा

स्वास्थ्य विशेषज्ञ लोगों को किसी भी त्वचा रोग की स्थिति में योग्य चिकित्सक से सलाह लेने की सलाह दे रहे हैं। डॉक्टरों के अनुसार बिना जांच किसी भी मिट्टी या पानी का उपयोग कुछ मामलों में संक्रमण का खतरा बढ़ा सकता है। दूसरी ओर, इस कुएं की लोकप्रियता से स्थानीय लोगों को आर्थिक लाभ भी मिलने लगा है। स्नान के लिए बाल्टी उपलब्ध कराने, कपड़े साफ कराने और पूजा सामग्री बेचने जैसी गतिविधियों से कई परिवारों की आय बढ़ी है। ऐसे में यह कुआं अब केवल आस्था का केंद्र नहीं, बल्कि गांव की स्थानीय अर्थव्यवस्था का भी महत्वपूर्ण हिस्सा बनता जा रहा है।