तमिलनाडु की राजनीति में चार विधायकों के इस्तीफे ने एक नए संवैधानिक और राजनीतिक विवाद को जन्म दे दिया है। मद्रास हाईकोर्ट ने AIADMK के चार विधायकों का इस्तीफा स्वीकार करने के विधानसभा अध्यक्ष के फैसले पर सवाल उठाते हुए नोटिस जारी किया है। अदालत अब यह जांच करेगी कि क्या इस्तीफे वास्तव में स्वैच्छिक थे या फिर दल-बदल कानून के तहत संभावित अयोग्यता से बचने के लिए अपनाई गई राजनीतिक रणनीति का हिस्सा थे। इस मामले ने न केवल तमिलनाडु की राजनीति में हलचल मचा दी है, बल्कि स्पीकर की संवैधानिक जिम्मेदारियों और दल-बदल विरोधी कानून की प्रभावशीलता पर भी बहस छेड़ दी है।चार इस्तीफों पर HC सख्त | फोटो: chatGPT (AI)

चार इस्तीफों पर HC सख्त | फोटो: chatGPT (AI)

विश्वास मत से शुरू हुआ पूरा विवाद

इस पूरे घटनाक्रम की शुरुआत 13 मई 2026 को हुए विश्वास मत से हुई, जब AIADMK के 25 विधायकों ने पार्टी व्हिप की अनदेखी करते हुए सत्तारूढ़ तमिलगा वेत्री कझगम (TVK) के पक्ष में मतदान किया। पार्टी नेतृत्व ने इसे गंभीर अनुशासनहीनता मानते हुए सभी विधायकों के खिलाफ कार्रवाई शुरू कर दी। बाद में 21 विधायकों ने पार्टी से माफी मांग ली और उन्हें राहत मिल गई, लेकिन चार विधायकों ने अलग रास्ता चुना। इन विधायकों ने मई के अंतिम सप्ताह में अपने इस्तीफे सौंप दिए, जिन्हें विधानसभा अध्यक्ष ने स्वीकार कर लिया। AIADMK का आरोप है कि यह फैसला ऐसे समय लिया गया जब उनके खिलाफ दल-बदल कानून के तहत कार्रवाई लंबित थी।

इस्तीफों के तुरंत बाद TVK में शामिल होने से बढ़ा संदेह

मामले का सबसे विवादित पहलू यह है कि इस्तीफा देने के तुरंत बाद चारों विधायक सत्तारूढ़ TVK में शामिल हो गए। AIADMK का कहना है कि यह महज संयोग नहीं हो सकता और इससे यह संदेह पैदा होता है कि इस्तीफे पहले से तय राजनीतिक समझौते का हिस्सा थे। पार्टी ने अदालत में दावा किया कि विधायकों को राजनीतिक लाभ और संभावित पदों का आश्वासन दिया गया हो सकता है। यही वजह है कि याचिकाकर्ताओं ने स्पीकर के फैसले की निष्पक्षता पर सवाल उठाते हुए कहा है कि इस्तीफों की परिस्थितियों की गहन जांच किए बिना उन्हें स्वीकार करना संविधान की भावना के खिलाफ है।

संविधान और दल-बदल कानून की कसौटी पर स्पीकर का फैसला

याचिका में संविधान के अनुच्छेद 190(3)(b) का हवाला देते हुए कहा गया है कि विधानसभा अध्यक्ष का दायित्व केवल इस्तीफा प्राप्त करना नहीं, बल्कि यह सुनिश्चित करना भी है कि वह स्वेच्छा से और वास्तविक रूप से दिया गया हो। याचिकाकर्ताओं का आरोप है कि अध्यक्ष ने इस संवैधानिक जिम्मेदारी का पूरी तरह पालन नहीं किया। राजनीतिक विशेषज्ञों का मानना है कि यदि किसी विधायक के खिलाफ दल-बदल कानून के तहत कार्रवाई लंबित हो और वह अचानक इस्तीफा देकर दूसरी पार्टी में शामिल हो जाए, तो मामले की विस्तृत जांच आवश्यक हो जाती है। यही कारण है कि यह मामला अब केवल चार सीटों का नहीं, बल्कि संविधान और लोकतांत्रिक मर्यादाओं की परीक्षा बन गया है।

सरकार का बचाव और 29 जून की अहम सुनवाई

तमिलनाडु सरकार ने अदालत में इन सभी आरोपों को खारिज करते हुए कहा है कि इस्तीफे के पीछे की राजनीतिक मंशा से ज्यादा महत्वपूर्ण यह है कि वे स्वेच्छा से दिए गए थे। महाधिवक्ता विजय नारायण ने अदालत को बताया कि चारों विधायक व्यक्तिगत रूप से विधानसभा अध्यक्ष के सामने उपस्थित हुए और उन्होंने स्वयं अपने इस्तीफे सौंपे थे। सरकार का तर्क है कि ऐसे में अध्यक्ष के पास इस्तीफे स्वीकार करने का पर्याप्त आधार था। अब 29 जून को होने वाली सुनवाई में मद्रास हाईकोर्ट यह तय करेगा कि स्पीकर द्वारा अपनाई गई प्रक्रिया संविधान और कानून के अनुरूप थी या नहीं। इस फैसले पर न केवल इन चार पूर्व विधायकों का राजनीतिक भविष्य निर्भर करेगा, बल्कि यह भी तय हो सकता है कि भविष्य में दल-बदल और इस्तीफों से जुड़े मामलों में संवैधानिक संस्थाओं की भूमिका किस तरह परिभाषित होगी।