erere | Source: ererनई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश जस्टिस उज्ज्वल भुयान ने छात्रों के विरोध-प्रदर्शन, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और लोकतांत्रिक अधिकारों को लेकर महत्वपूर्ण टिप्पणी की है। भोपाल में आयोजित एक कार्यक्रम को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा कि देश में अलग-अलग विचार रखने और शांतिपूर्ण तरीके से अपनी बात रखने की सार्वजनिक जगह लगातार कम होती जा रही है। उन्होंने कहा कि विश्वविद्यालय परिसरों में विरोध-प्रदर्शन करने वाले छात्रों को गिरफ्तार कर लिया जाता है और कई मामलों में उन्हें 30 से 40 दिनों तक जमानत भी नहीं मिलती, जिसके कारण उन्हें पढ़ाई और भविष्य दोनों स्तरों पर कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है।

भोपाल के कार्यक्रम में रखी अपनी बात

मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, जस्टिस उज्ज्वल भुयान भोपाल स्थित नेशनल लॉ इंस्टीट्यूट यूनिवर्सिटी (एनएलआईयू) में आयोजित पांचवें जस्टिस जी.पी. सिंह मेमोरियल व्याख्यान में बोल रहे थे। इस दौरान उन्होंने लोकतंत्र में असहमति के महत्व, नागरिक स्वतंत्रता और शांतिपूर्ण प्रदर्शन के अधिकार पर विस्तार से अपनी बात रखी।

उन्होंने कहा कि वह देश में हाल के घटनाक्रमों पर प्रत्यक्ष टिप्पणी नहीं करना चाहते, लेकिन यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगी कि भारत में अलग-अलग विचार रखने के लिए सार्वजनिक स्थान लगातार सीमित होते जा रहे हैं।

'शांतिपूर्ण प्रदर्शन नागरिकों का मौलिक अधिकार'

जस्टिस भुयान ने अपने संबोधन में कहा कि शांतिपूर्ण ढंग से अपनी बात रखना और विरोध दर्ज कराना नागरिकों की बुनियादी स्वतंत्रता का हिस्सा है। उन्होंने कहा कि लोकतंत्र की वास्तविक शक्ति बहस, संवाद और असहमति में निहित होती है।

उन्होंने कहा कि आज कई ऐसी गतिविधियों को भी आपराधिक स्वरूप दिया जा रहा है, जो सामान्य नागरिक अधिकारों के दायरे में आती हैं। उनके अनुसार पर्यावरण को होने वाले नुकसान के खिलाफ आवाज उठाने वाले लोगों के साथ भी कई बार ऐसा व्यवहार किया जाता है, मानो उन्होंने कोई अपराध किया हो।

छात्रों की गिरफ्तारी और जमानत पर जताई चिंता

जस्टिस भुयान ने विश्वविद्यालय परिसरों में होने वाले छात्र आंदोलनों का उल्लेख करते हुए कहा कि कई बार विरोध-प्रदर्शन करने वाले छात्रों को गिरफ्तार कर लिया जाता है। उन्होंने कहा कि ऐसे छात्रों को 30 से 40 दिनों तक जमानत नहीं मिलती, उन्हें शैक्षणिक संस्थानों से निलंबित भी कर दिया जाता है और उसके बाद उन्हें न्यायालयों का रुख करना पड़ता है, जिसमें लंबा समय लग जाता है।

उन्होंने कहा कि इस पूरी प्रक्रिया का असर छात्रों की शिक्षा, करियर और भविष्य पर पड़ता है। इसलिए नागरिकों के शांतिपूर्ण प्रदर्शन और अपनी राय व्यक्त करने के अधिकार की रक्षा करना लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए आवश्यक है।

'असहमति ही लोकतंत्र का सार है'

अपने संबोधन के दौरान जस्टिस भुयान ने कहा कि लोकतंत्र केवल चुनाव तक सीमित नहीं होता, बल्कि उसमें विभिन्न विचारों के लिए समान सम्मान और खुली चर्चा का वातावरण भी जरूरी होता है। उन्होंने कहा कि बहस और असहमति ही लोकतंत्र का वास्तविक सार है और इन्हें लोकतांत्रिक व्यवस्था की मजबूती के रूप में देखा जाना चाहिए।

गाजा-फिलिस्तीन प्रदर्शन के मामले का भी किया उल्लेख

अपने व्याख्यान के दौरान जस्टिस उज्ज्वल भुयान ने बॉम्बे हाई कोर्ट के उस आदेश का भी उल्लेख किया, जिसमें गाजा और फिलिस्तीन के समर्थन में प्रस्तावित प्रदर्शन की अनुमति नहीं दी गई थी। रिपोर्टों के अनुसार, उस मामले में न्यायालय ने सीपीआई (एम) की याचिका खारिज करते हुए कहा था कि देश में कई अन्य मुद्दे भी हैं और लोगों को अपने देश के लिए भी काम करना चाहिए।

इस संदर्भ में जस्टिस भुयान ने कहा कि भारत ने आधिकारिक रूप से फिलिस्तीन को मान्यता दी हुई है और उसका दूतावास भी भारत में मौजूद है। उन्होंने इसी संदर्भ में अपनी टिप्पणी रखते हुए इस विषय पर विचार व्यक्त किए।

लोकतांत्रिक मूल्यों पर फिर शुरू हुई चर्चा

जस्टिस उज्ज्वल भुयान की यह टिप्पणी सामने आने के बाद अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, शांतिपूर्ण प्रदर्शन के अधिकार और लोकतांत्रिक मूल्यों को लेकर नई चर्चा शुरू हो गई है। विश्वविद्यालय परिसरों में छात्र आंदोलनों, नागरिक अधिकारों और सार्वजनिक असहमति के मुद्दे पर उनकी टिप्पणियों को व्यापक रूप से देखा जा रहा है।