पटना। बिहार के ग्रामीण इलाकों में रहने वाले करोड़ों लोगों के लिए राहत की बड़ी खबर सामने आई है। मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी के नेतृत्व वाली बिहार सरकार ग्रामीण क्षेत्रों में आवासीय मकानों से होल्डिंग टैक्स यानी मकान कर वसूली के प्रस्ताव में बदलाव करने की तैयारी कर रही है। प्रस्तावित संशोधन के बाद गांवों और कस्बों में बने पक्के और अर्धपक्के आवासीय मकानों से होल्डिंग टैक्स नहीं लेने की व्यवस्था की जा सकती है। इससे ग्रामीण इलाकों के लगभग 8 करोड़ से अधिक लोगों को राहत मिलने की संभावना है।
ग्रामीण मकानों पर टैक्स लगाने के फैसले से क्यों बदला रुख
राज्य सरकार ने पंचायती राज संस्थाओं की आमदनी बढ़ाने और उन्हें आर्थिक रूप से मजबूत बनाने के उद्देश्य से ग्रामीण क्षेत्रों में विभिन्न प्रकार के कर और शुल्क वसूलने का प्रावधान किया था। इस प्रस्ताव में आवासीय मकानों से भी कर वसूलने की व्यवस्था शामिल थी। हालांकि, ग्रामीण परिवारों के बीच इस फैसले को लेकर नाराजगी सामने आने के बाद सरकार अब इसमें संशोधन करने की तैयारी कर रही है।
पंचायती राज विभाग ग्रामीण क्षेत्रों में शुल्क वसूली से जुड़े प्रावधानों में बदलाव कर रहा है। संशोधन के बाद ही नए प्रावधानों को लागू किया जाएगा। खास बात यह है कि 15 जुलाई को राज्य कैबिनेट ने ग्रामीण क्षेत्रों में दो दर्जन से अधिक तरह के टैक्स और शुल्क लेने के प्रस्ताव को मंजूरी दी थी, लेकिन अभी तक इसका गजट प्रकाशन नहीं हुआ है। पंचायती राज विभाग की ओर से इस संबंध में अधिसूचना भी जारी नहीं की गई है।
किसानों और गरीब परिवारों को मिल सकती है राहत
आवासीय मकानों से कर वसूली के प्रस्ताव में बदलाव का सबसे सीधा असर ग्रामीण परिवारों पर पड़ने की संभावना है। गांवों में बड़ी संख्या में किसान, मजदूर और आर्थिक रूप से कमजोर परिवार रहते हैं। ऐसे में आवासीय मकानों पर कर लगाए जाने के फैसले को लेकर नाराजगी की स्थिति बनी थी।
सरकार अब इसी प्रावधान में संशोधन करके ग्रामीण परिवारों को राहत देने की तैयारी कर रही है। इसके साथ ही प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत गरीब परिवारों के लिए बनाए गए मकानों से संबंधित सालाना होल्डिंग टैक्स की व्यवस्था को भी हटाने की तैयारी है। पहले इस कर का भुगतान संबंधित विभाग यानी ग्रामीण विकास विभाग की ओर से किए जाने का प्रावधान था।
व्यावसायिक मकानों पर पंचायतें ले सकेंगी कर
ग्रामीण क्षेत्रों में आवासीय मकानों को राहत देने की तैयारी के बावजूद व्यावसायिक गतिविधियों पर कर और शुल्क का प्रावधान जारी रह सकता है। पंचायत क्षेत्रों में व्यावसायिक मकान या अन्य व्यावसायिक निर्माण के लिए आवश्यकतानुसार पंचायतों को कर वसूलने का अधिकार दिया जाएगा।
इसका उद्देश्य यह है कि सामान्य ग्रामीण परिवारों पर आवासीय मकान के लिए अतिरिक्त आर्थिक बोझ न पड़े, जबकि व्यावसायिक गतिविधियों से पंचायतों को राजस्व प्राप्त हो सके। इस व्यवस्था से पंचायतों की आय बढ़ाने के प्रयास को भी आगे बढ़ाया जा सकता है।
पंचायतों की कमाई बढ़ाने के लिए बनाया गया था प्रस्ताव
सरकार ने पंचायतों को आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बनाने के उद्देश्य से ग्रामीण क्षेत्रों में कर और शुल्क लगाने का निर्णय लिया था। इसके पीछे 16वें केंद्रीय वित्त आयोग की उस अनुशंसा का भी उल्लेख किया गया था, जिसमें देशभर की पंचायतों को अपनी आय बढ़ाने और आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बनने के लिए स्थानीय स्तर पर कर लगाने के प्रयास करने की बात कही गई है।
वित्त आयोग की अनुशंसा के अनुसार ग्रामीण इलाकों में प्रत्येक घर से सालाना औसतन 1,200 रुपये तक की वसूली के जरिए पंचायतों की आय बढ़ाने का प्रयास किया जा सकता है। बिहार सरकार ने इसी व्यापक उद्देश्य के तहत ग्रामीण क्षेत्रों में विभिन्न करों और शुल्कों का प्रस्ताव तैयार किया था।
पक्के और अर्धपक्के मकानों के लिए था कितना टैक्स
पहले तैयार किए गए प्रस्ताव में आवासीय मकानों की श्रेणी के अनुसार अलग-अलग वार्षिक कर की दर निर्धारित की गई थी। पक्के मकान के लिए सालाना 100 रुपये और अर्धपक्के मकान के लिए 50 रुपये कर का प्रावधान था। कच्चे मकानों से कोई कर नहीं लेने की व्यवस्था रखी गई थी।
प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत बनाए गए मकानों के लिए सालाना 25 रुपये होल्डिंग टैक्स का प्रावधान था। इसका भुगतान ग्रामीण विकास विभाग की ओर से किए जाने की व्यवस्था प्रस्तावित थी।
इसके अलावा प्रत्येक घर से सफाई शुल्क के रूप में 30 रुपये प्रतिमाह और जलापूर्ति शुल्क के रूप में भी 30 रुपये प्रतिमाह लेने का प्रावधान रखा गया था।
कारोबार और संस्थानों पर भी था शुल्क
ग्रामीण क्षेत्रों में व्यावसायिक, औद्योगिक और संस्थागत इस्तेमाल वाले भवनों पर भी कर लगाने का प्रस्ताव था। इसके तहत भवन के उपयोग और श्रेणी के अनुसार सालाना 100 रुपये से लेकर 5,000 रुपये तक कर लगाया जाना था। इसके साथ ही पेशा शुल्क लेने का भी प्रावधान था।
दो टन प्रति घंटा से अधिक क्षमता वाली चावल मिलों पर भी कर लगाने की व्यवस्था प्रस्तावित की गई थी। इसके अलावा सिनेमा हॉल, विवाह भवन, होटल, पेट्रोल पंप और रसोई गैस एजेंसी पर सालाना 5,000 रुपये शुल्क लेने का प्रावधान किया गया था। हालांकि, संशोधन के बाद इन शुल्कों की दरों में भी कमी किए जाने की संभावना बताई गई है।
अन्य गतिविधियों पर भी शुल्क का प्रस्ताव
प्रस्तावित कर व्यवस्था में ग्रामीण क्षेत्रों की अन्य आर्थिक गतिविधियों को भी शामिल किया गया था। मेले में बिक्री होने पर पशुओं के लिए भी शुल्क लेने का प्रावधान रखा गया था। इसके अलावा ईंट की चिमनी, पेट्रोल पंप और रसोई गैस एजेंसी जैसी व्यावसायिक गतिविधियों के लिए भी शुल्क निर्धारित किया गया था।
सरकार की प्रस्तावित व्यवस्था का व्यापक उद्देश्य पंचायतों की आय के स्रोत बढ़ाना था, ताकि स्थानीय निकाय अपने स्तर पर विकास और नागरिक सुविधाओं से जुड़े खर्चों के लिए अधिक संसाधन जुटा सकें।
अभी लागू नहीं हुआ है नया कर प्रावधान
इस पूरे मामले में महत्वपूर्ण बात यह है कि ग्रामीण आवासीय मकानों से कर वसूली का प्रस्ताव अभी अंतिम रूप से लागू नहीं हुआ है। 15 जुलाई को राज्य कैबिनेट से प्रस्ताव को मंजूरी मिलने के बावजूद अभी तक गजट प्रकाशित नहीं किया गया है और पंचायती राज विभाग की ओर से अधिसूचना जारी नहीं हुई है।
अब सरकार संशोधन के जरिए आवासीय मकानों से होल्डिंग टैक्स वसूली के प्रावधान को बदलने की तैयारी कर रही है। संशोधित व्यवस्था लागू होने के बाद ही यह स्पष्ट होगा कि ग्रामीण क्षेत्रों में कौन-कौन से कर और शुल्क किस दर से वसूले जाएंगे।
बिहार के ग्रामीण इलाकों में क्यों महत्वपूर्ण है यह फैसला
बिहार की बड़ी आबादी ग्रामीण क्षेत्रों में रहती है। ऐसे में ग्रामीण परिवारों के आवासीय मकानों पर कर का सीधा असर बड़ी संख्या में लोगों पर पड़ सकता था। खासकर किसान, मजदूर और कम आय वाले परिवारों के लिए मकान से जुड़े अतिरिक्त शुल्क का मुद्दा महत्वपूर्ण माना जा रहा था।
सरकार के प्रस्तावित संशोधन से एक तरफ ग्रामीण परिवारों को राहत देने की कोशिश होगी, वहीं दूसरी तरफ व्यावसायिक गतिविधियों से पंचायतों के राजस्व को बढ़ाने का रास्ता खुला रहेगा। इस तरह सरकार पंचायतों की आर्थिक स्थिति मजबूत करने और सामान्य ग्रामीण परिवारों पर अतिरिक्त बोझ कम करने के बीच संतुलन बनाने की कोशिश कर रही है।
