
बच्चे की सेहत किसी भी तरह के रीति रिवाज से अहम है
पीडियाट्रिशियन डॉ. हनीश बजाज का एक बयान "बच्चे पैदा करना बंद कर दीजिए, जानिए आखिर डॉक्टर ने क्यों कही ये बात... इन दिनों चर्चा में है। उन्होंने कहा, "अगर डॉक्टर की सलाह नहीं माननी है और सिर्फ पुराने रीति-रिवाजों के अनुसार ही बच्चे की परवरिश करनी है, तो बच्चे पैदा करना बंद कर दीजिए। उनका मकसद माता पिता को डराना नहीं, बल्कि नवजात बच्चों की सही देखभाल के प्रति जागरूक करना है।
डॉ. हनीश बजाज का मकसद लोगों को बच्चे पैदा करने से रोकना नहीं, बल्कि उन्हें एक ऐसी हकीकत से रूबरू कराना है, जो आज भी कई भारतीय परिवारों में देखने को मिलती है। उनके मुताबिक, बच्चे के जन्म के बाद कई बार मां और नवजात की जरूरतें सबसे पीछे छूट जाती हैं, और रीति-रिवाज, सामाजिक दबाव और परिवार की पुरानी मान्यताएं सबसे बड़ी प्राथमिकता बन जाती हैं।
डॉक्टर ने ऐसा क्यों कहा?
डॉ. हनीश बजाज का कहना है कि आज भी कई परिवारों में बच्चे के जन्म के बाद डॉक्टर की सलाह से ज्यादा पुराने रीति-रिवाजों को अहमियत दी जाती है। ऐसे में मां और नवजात की सेहत पीछे छूट जाती है। उनका मानना है कि बच्चे की देखभाल हमेशा वैज्ञानिक जानकारी और डॉक्टर की सलाह के अनुसार होनी चाहिए। वहीं कई परिवारों में जन्म के बाद यह तय करने लगते हैं कि बच्चे को क्या खिलाया जाएगा, क्या लगाया जाएगा और उसकी देखभाल कैसे होगी। कई बार इन फैसलों में डॉक्टर की सलाह पीछे छूट जाती है और परंपराएं को सबसे आगे रखा जाता है।
ये गलतियां बच्चे को पहुंचा सकती हैं नुकसान
कई घरों में आज भी नवजात को काजल लगाना, मां का पहला पीला दूध (कोलोस्ट्रम) नहीं पिलाना, बिना डॉक्टर की सलाह के घरेलू नुस्खे अपनाना या गलत तरीके से दूध पिलाना जैसी परंपराएं निभाई जाती हैं। इसके अलावा ज़्यादा तर घरों में कटोरी-चम्मच, कॉटन या दूसरे घरेलू तरीकों से दूध पिलाने की कोशिश की जाती है। बिना डॉक्टर की सलाह के शहद, घुट्टी या घरेलू नुस्खे भी दिए जाते हैं। डॉक्टरों के मुताबिक, इन आदतों से बच्चे में संक्रमण का खतरा बढ़ सकता है और उसके शुरुआती विकास पर भी बुरा असर पड़ सकता है।
बच्चे के जन्म से पहले परिवार से करें यह बात
डॉ. बजाज का कहना है कि माता-पिता बनने की योजना बना रहे लोगों को पहले ही अपने परिवार और रिश्तेदारों से इस बात पर सहमति बना लेनी चाहिए कि बच्चे के जन्म के बाद उसकी देखभाल डॉक्टर की सलाह के मुताबिक ही होगी।अगर कोई परंपरा मां या बच्चे की सेहत के खिलाफ जाती है, तो उसे अपनाने का दबाव नहीं बनाया जाना चाहिए।डॉक्टर मानते हैं कि सभी परंपराएं गलत नहीं होतीं। कई परंपराओं का सामाजिक और सांस्कृतिक महत्व भी है। लेकिन जब बात नवजात और मां की सेहत की हो, तो किसी भी रीति रिवाज से पहले वैज्ञानिक सोच और मेडिकल सलाह को अहमियत देनी चाहिए।
WHO और UNICEF भी देते हैं यही सलाह
विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) और यूनिसेफ के अनुसार, बच्चे के जन्म के पहले एक घंटे के अंदर स्तनपान शुरू कर देना चाहिए। साथ ही मां का पहला पीला दूध यानी कोलोस्ट्रम जरूर पिलाना चाहिए। यह दूध बच्चे की रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाता है और उसे कई तरह के संक्रमणों से बचाने में मदद मिलता है। इसलिए नवजात की देखभाल से जुड़े हर फैसले डॉक्टर की सलाह के मुताबिक ही लेने चाहिए।
