हॉलीवुड की कई फिल्मों में आपने रोबोट की लड़ाई के कई दृश्य देखे होंगे। भारत में भी कृष 3.0, रा.वन, रोबोट और 2.0 जैसी फिल्मों में इंसानी शक्ल-सूरत वाले रोबोट जबरदस्त एक्शन करते नजर आए हैं। अब फिल्मों में दिखने वाले ऐसे रोबोट वास्तविक युद्ध के मैदान में भी दिखाई देने लगे हैं। कुछ महीने पहले रूस-यूक्रेन युद्ध से रोबोट आर्मी के कुछ वीडियो सामने आए थे। एक वीडियो में रूसी सैनिकों को यूक्रेन के एक हथियारबंद रोबोट के सामने सरेंडर करते हुए भी देखा गया था। यूक्रेन के राष्ट्रपति ने भी इसकी पुष्टि की थी।

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फ्रंटलाइन पर तैनात किए गए दो ह्यूमनॉइड रोबोट

13 अप्रैल को यूक्रेन के राष्ट्रपति वोलोडिमिर जेलेंस्की ने सोशल मीडिया पोस्ट के जरिए बताया था कि रोबोट आर्मी को बड़ी सफलता मिली है और रूसी सैनिकों ने यूक्रेन की रोबोट आर्मी के सामने सरेंडर किया। अब पहली बार दो ह्यूमनॉइड रोबोट को यूक्रेन की युद्ध सीमा (फ्रंटलाइन) पर तैनात किया गया है। फ्रंटलाइन पर तैनात किए गए ये रोबोट बेहद सक्षम बताए जा रहे हैं। मौजूदा स्थिति से यह साफ हो रहा है कि रोबोट आर्मी के दौर में यूक्रेन तेजी से आगे बढ़ रहा है।

ह्यूमनॉइड रोबोट फैंटम Mk1 की खासियत

इस रोबोट का नाम फैंटम Mk1 (Phantom Mk1) है। यह करीब 6 फीट लंबा और लगभग 80 किलोग्राम वजनी है। यह अपने साथ 40 किलोग्राम तक का वजन उठा सकता है। देखने में यह फिल्म स्टार वॉर्स के बैटल ड्रॉइड जैसा दिखाई देता है।

इन रोबोट्स को बनाने वाली अमेरिकी स्टार्टअप कंपनी फाउंडेशन (Foundation) ने अमेरिकी रक्षा मंत्रालय (पेंटागन) के साथ 24 मिलियन डॉलर (करीब 200 करोड़ रुपये) का समझौता किया है। कंपनी अगले कुछ वर्षों में ऐसे हजारों रोबोट तैयार करने की योजना बना रही है। कंपनी के सीईओ संकेत पाठक के अनुसार, इन रोबोट्स को इस तरह डिजाइन किया गया है कि वे गिरने के बाद भी खुद को संभाल सकें, भारी वजन उठा सकें और उन पर पानी या धूल का असर न हो। इनका उपयोग केवल सेना तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि निर्माण (कंस्ट्रक्शन) जैसे भारी उद्योगों में भी किया जा सकेगा।

फैंटम Mk1 के सामने मौजूद चुनौतियां

विशेषज्ञों का मानना है कि यह तकनीक अभी शुरुआती चरण में है और इसे पूरी तरह सफल होने में लगभग एक दशक का समय लग सकता है।

बैटरी लाइफ: फैंटम Mk1 की बैटरी फिलहाल एक घंटे से भी कम समय तक चलती है। हालांकि कंपनी का दावा है कि इसके अगले मॉडल Mk2 में बैटरी बैकअप को बढ़ाकर 6 घंटे तक किया जाएगा।

संतुलन: उबड़-खाबड़ रास्तों और युद्ध के मैदान में दो पैरों पर संतुलन बनाकर चलना काफी चुनौतीपूर्ण है। पहियों वाले रोबोट की तुलना में पैरों पर चलने वाले रोबोट अधिक जटिल होते हैं। साइबर सुरक्षा: ये रोबोट पूरी तरह स्वायत्त नहीं हैं। इन्हें कमांड देने के लिए लगातार संपर्क की आवश्यकता होती है, जिससे इनके हैक होने का खतरा भी बना रहता है।