ereer | Source: erereअजमेर। राजस्थान के अजमेर से जेल की सुरक्षा व्यवस्था को लेकर हैरान करने वाला मामला सामने आया है। अजमेर सेंट्रल जेल में बंद तीन कैदियों का एक ऐसे व्यक्ति से वीडियो कॉल पर बातचीत करने का वीडियो सामने आया है, जिस पर वर्ष 1992 के चर्चित अजमेर ब्लैकमेल कांड में 100 से अधिक स्कूल और कॉलेज छात्राओं के साथ सामूहिक दुष्कर्म तथा उन्हें ब्लैकमेल करने के मामले में आरोपी होने का उल्लेख है। सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि वीडियो कॉल कथित तौर पर जेलर सद्दाम हुसैन के मोबाइल फोन के जरिए उनके कार्यालय से कराई गई।

वायरल वीडियो सामने आते ही जेल प्रशासन में मचा हड़कंप

मामले का वीडियो सामने आने और वायरल होने के बाद जेल प्रशासन में हड़कंप मच गया। वीडियो में तीन कैदी जेलर के कार्यालय में बैठकर मोबाइल फोन के जरिए एक व्यक्ति से वीडियो कॉल पर बातचीत करते दिखाई दे रहे हैं। मामले की जानकारी वरिष्ठ अधिकारियों तक पहुंचने के बाद अजमेर सेंट्रल जेल के जेलर सद्दाम हुसैन के खिलाफ तत्काल कार्रवाई की गई।

राजस्थान के डीजी जेल अशोक राठौड़ ने मामले को गंभीरता से लेते हुए जेलर सद्दाम हुसैन को तत्काल प्रभाव से निलंबित करने का आदेश जारी किया। अधिकारियों के अनुसार, जेल परिसर में प्रतिबंधित तरीके से मोबाइल फोन के इस्तेमाल और कैदियों को जेल से बाहर मौजूद व्यक्ति से संपर्क कराने के आरोपों को गंभीरता से लिया गया है।

आखिर किससे कराई गई कैदियों की वीडियो कॉल?

सामने आए वीडियो के अनुसार, अजमेर सेंट्रल जेल में बंद तारिक चिश्ती, उसके बेटे तौसीफ चिश्ती उर्फ चिंकी और भतीजे फख्र जमाली ने नफीस चिश्ती से वीडियो कॉल पर बातचीत की। नफीस चिश्ती का नाम वर्ष 1992 के अजमेर ब्लैकमेल कांड से जुड़े मामले में सामने आया था।

तीनों कैदियों को वर्ष 2014 में एक व्यक्ति पर हमले के मामले में पिछले साल सात-सात वर्ष की जेल की सजा सुनाई गई थी। वीडियो सामने आने के बाद अब यह जांच का विषय बन गया है कि जेल के भीतर कैदियों को मोबाइल फोन किस तरह उपलब्ध हुआ और जेलर के कार्यालय से वीडियो कॉल कराने की परिस्थितियां क्या थीं।

100 से ज्यादा छात्राओं से जुड़े चर्चित मामले का आरोपी है नफीस चिश्ती

नफीस चिश्ती का नाम अजमेर के वर्ष 1992 के चर्चित ब्लैकमेल कांड से जुड़ा रहा है। इस मामले में 100 से अधिक स्कूल और कॉलेज छात्राओं के साथ सामूहिक दुष्कर्म और उनकी आपत्तिजनक तस्वीरों के जरिए ब्लैकमेल किए जाने के आरोप सामने आए थे। इस मामले ने उस समय पूरे देश में व्यापक चर्चा पैदा की थी।

मामले से जुड़े विवरण के अनुसार, लड़कियों की आपत्तिजनक तस्वीरें खींचकर उन्हें ब्लैकमेल किया जाता था। आरोप है कि तस्वीरों के आधार पर पीड़ित छात्राओं की परिचित अन्य लड़कियों को भी बुलाया जाता और उन्हें कथित तौर पर इसी तरह के जाल में फंसाया जाता था। इस मामले में कई छात्राओं के साथ सामूहिक दुष्कर्म किए जाने के आरोप लगे थे।

आपत्तिजनक तस्वीरों के जरिए बनाया जाता था दबाव

1992 के इस चर्चित मामले में आपत्तिजनक तस्वीरों को ब्लैकमेल का माध्यम बनाए जाने की बात सामने आई थी। बदनामी और सामाजिक दबाव के डर से कई पीड़ित छात्राओं के आत्महत्या करने की बात भी मामले के विवरण में सामने आई थी। पुलिस ने लंबे समय तक जांच और कार्रवाई के बाद इस मामले से जुड़े आरोपियों तक पहुंच बनाई थी।

यह मामला उस दौर के सबसे चर्चित अपराध मामलों में शामिल रहा, क्योंकि इसमें बड़ी संख्या में छात्राओं के शोषण और ब्लैकमेल किए जाने के आरोप सामने आए थे। मामले की गंभीरता को देखते हुए इसकी जांच और कानूनी कार्रवाई लंबे समय तक चर्चा में रही।

हाई कोर्ट ने नफीस चिश्ती की उम्रकैद की सजा पर लगाई थी रोक

सामने आई जानकारी के अनुसार, राजस्थान हाई कोर्ट ने पिछले वर्ष नफीस चिश्ती को मिली उम्रकैद की सजा पर रोक लगा दी थी। इसके साथ ही मामले में तीन अन्य आरोपियों को भी जमानत दी गई थी। ऐसे में अब अजमेर सेंट्रल जेल में बंद कैदियों की नफीस चिश्ती से वीडियो कॉल की घटना ने जेल प्रशासन की कार्यप्रणाली और सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।

हालांकि, इस वीडियो कॉल की पूरी परिस्थितियों और इसमें शामिल लोगों की भूमिका को लेकर विभागीय जांच जारी है। जांच पूरी होने के बाद ही यह स्पष्ट हो सकेगा कि जेल के नियमों का उल्लंघन किस स्तर पर हुआ और इसके लिए कौन-कौन जिम्मेदार है।

जेलर पर क्यों हुई कार्रवाई?

वायरल वीडियो में जेलर सद्दाम हुसैन के अपने कार्यालय में मौजूद होने और मोबाइल फोन के जरिए बातचीत किए जाने का दृश्य दिखाई देता है। आरोप है कि उनकी मौजूदगी में कैदियों को मोबाइल फोन के माध्यम से जेल से बाहर मौजूद व्यक्ति से वीडियो कॉल पर बात करने का अवसर मिला।

डीजी जेल अशोक राठौड़ ने इसी मामले को गंभीर मानते हुए जेलर के निलंबन का आदेश दिया। जेल प्रशासन की ओर से मामले में विभागीय जांच भी शुरू कर दी गई है। जांच का उद्देश्य यह पता लगाना है कि प्रतिबंधित सामग्री या मोबाइल सुविधा कैदियों तक कैसे पहुंची और जेल नियमों का उल्लंघन किन परिस्थितियों में हुआ।

एक कैदी को दूसरी जेल भेजा गया

मामले में कार्रवाई को आगे बढ़ाते हुए कैदी सयैद तौसीफ चिश्ती को अजमेर सेंट्रल जेल से भरतपुर सेंट्रल जेल स्थानांतरित कर दिया गया है। जेल प्रशासन की ओर से इस मामले को केवल अनुशासनहीनता तक सीमित नहीं रखा गया है, बल्कि संबंधित परिस्थितियों की विस्तृत जांच की जा रही है।

इसके अलावा अजमेर के सिविल लाइन पुलिस थाने में भी इस मामले को लेकर एफआईआर दर्ज कराई गई है। पुलिस और जेल विभाग की जांच के बाद घटना से जुड़े अन्य तथ्यों के सामने आने की उम्मीद है।

जेल की सुरक्षा पर उठे गंभीर सवाल

अजमेर सेंट्रल जेल से सामने आया यह मामला इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि जेल परिसर में मोबाइल फोन और बाहरी व्यक्तियों से संपर्क को लेकर कड़े नियम लागू होते हैं। ऐसे में यदि कैदियों को जेलर के कार्यालय से वीडियो कॉल की सुविधा मिली, तो यह जेल की आंतरिक सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े करता है।

वायरल वीडियो के बाद अब जांच एजेंसियों के सामने यह पता लगाने की चुनौती है कि वीडियो कॉल की अनुमति किस परिस्थिति में मिली, मोबाइल फोन का इस्तेमाल कैसे हुआ और इस पूरी घटना में अन्य किसी व्यक्ति की भूमिका थी या नहीं। विभागीय जांच और एफआईआर के माध्यम से इन सवालों के जवाब तलाशे जा रहे हैं।

1992 के अजमेर ब्लैकमेल कांड ने देश को झकझोर दिया था

वर्ष 1992 में सामने आया अजमेर ब्लैकमेल कांड छात्राओं के यौन शोषण और ब्लैकमेल से जुड़ा बेहद चर्चित मामला था। आरोपों के अनुसार, छात्राओं की आपत्तिजनक तस्वीरों का इस्तेमाल उन्हें डराने और दबाव में रखने के लिए किया जाता था। इसके बाद तस्वीरों के माध्यम से अन्य छात्राओं को भी कथित तौर पर जाल में फंसाया जाता था।

मामले के सामने आने के बाद पुलिस ने जांच शुरू की और आरोपियों तक पहुंचने के लिए व्यापक स्तर पर कार्रवाई की। इस प्रकरण ने उस समय समाज और प्रशासन के सामने महिलाओं और छात्राओं की सुरक्षा तथा अपराध के बाद पीड़ितों पर पड़ने वाले सामाजिक दबाव को लेकर गंभीर सवाल खड़े किए थे।

अब जांच से सामने आएंगे वीडियो कॉल के पीछे के तथ्य

अजमेर सेंट्रल जेल में हुई इस वीडियो कॉल की घटना के बाद जेलर का निलंबन, एक कैदी का दूसरी जेल में स्थानांतरण और एफआईआर दर्ज होने जैसी कार्रवाई की गई है। इसके साथ ही विभागीय जांच भी जारी है।

फिलहाल पूरे मामले में वायरल वीडियो और सामने आए आरोपों के आधार पर कार्रवाई शुरू की गई है। जांच पूरी होने के बाद ही घटना की पूरी परिस्थितियां और जिम्मेदार लोगों की भूमिका स्पष्ट हो सकेगी। अजमेर सेंट्रल जेल से सामने आया यह मामला जेलों में मोबाइल फोन के इस्तेमाल, कैदियों की निगरानी और सुरक्षा व्यवस्था को लेकर गंभीर सवाल जरूर खड़े करता है।